शनिवार, 17 दिसंबर 2016

विध्वंशक अक्ल कहाँ पाई है ?



तुम्हारे उजबक फैसलों से ,आवाम घबराई है।

और खुद तुम्हारे चेहरे पर ही घबराहट छाई है।।

 गरीबों को यकीन नहीं तुम पर,हे अम्बानी मित्र  !

 वादाखिलाफी की क्या तुमने कोई कसम खायी है?

 तुम अपने ही घर में आग लगाकर  ताप रहे हो ,

पूंछ सकते हैं कि विध्वंशक अक्ल कहाँ पाई है ?

 बड़े परिश्रमी, साहसी, देशभक्त स्वाभिमानी हो,

 लेकिन तुम्हारे धतकर्मों से अमीरोंकी बन आई है।

 जर्जर है मुल्क और सदियों से बीमार भी लेकिन,

 ये कैसा इलाज कर रहे हो कि जान पै बन आई है।

 मझधार में डूबती कस्ती ,तुम्हें नोटबंदी की पडी है ,

रेल दुर्घटनाओं का चीत्कार, सुनो दुहाई है दुहाई है।

 रोजगार नहीं ,घर नहीं ,आजीविका नहीं जिनके पास,

 उन्हें ऐंड्रायड फोन एटीम कैशलेश सब हवा हवाई है

 श्रीराम तिवारी




मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

वैज्ञानिक अनुसंधान बहुत हैं।


 हर शख्स को जांचने -परखने के संसाधन  बहुत हैं।

 तूफ़ान में  दिए को भी जलाये रखने के ठिये बहुत हैं।। 

 है जहाँ पर पतनशील अधोगामी भृष्ट शासन व्यवस्था  , 

  पूँजीवादी लोकतंत्र में जनाक्रोश  के बहाने  बहुत हैं।

  सदियाँ गुजर गयीं मानव सभ्यता  को संवारने में,

  नैतिक मूल्यों  को सुरक्षित बचाने के कारण बहुत हैं।

  अमानवीय सिस्टम को ध्वस्त करने के अनेक तरीके हैं ,

  बदतर हालत से निपटने के वैज्ञानिक अनुसंधान बहुत हैं।

  रूप आकार नाक नक़्शे की ही शल्यक्रिया क्यों की जाए  ?    

   शोषण उत्पीड़न अन्याय अत्याचार के ठिकाने  बहुत हैं।

  श्रीराम तिवारी

सोमवार, 12 दिसंबर 2016


 फूल थे, रंग थे ,लम्हों की सबाहत हम थे ,

ऐंसे जिन्दा थे कि जीने की अलामत हम थे ,

अब तो खुद अपनी जरूरत भी नहीं है हमको ,

वो  दिन भी थे कि कभी उनकी जरूरत हम थे।


[एतबार साजिद की कलम से ]

गुरुवार, 24 नवंबर 2016


हर एक स्याह रात के बाद फिर नई सुबह आती है।

घर के आँगन में कोई पेड़ हो तो गौरैया गाती है।।

तितलियाँ फुदकती हैं पतझड़ गुजर जाने के बाद भी.

चहकती चिड़िया भी सुमधुर भोर का राग सुनाती है।

कूँकती है कोयल जब कभी झूमते अमुआ की डाल पर,

किसी चिर बिरहन के कलेजे पर मानों खंजर चलाती है।

गौरैया ,तितली, चिड़िया, कोयल की कूँक और नई सुबह,

नियति के सम्पूर्ण अस्तित्व को आँगन में उतार लाती है।

तपती धरती सूखे खेत सूखे बाग़ बगीचे आसमा में बादल,

 देखदेखकर भूँखे किसान की थकान भी काफूर हो जाती है।

उसके पेट में अन्न हो और गुजारे लायक संसाधन,

तो गौरैया, तितली और कोयल उसे भी सुहाती है।

 देश -प्रदेश में सुशासन और न्यायप्रिय सिस्टम हो ,

 शोषण विहीन व्यवस्था हो तो जिंदगी कहलाती है। 

  अपनी निजी सनक को सियासत का नाम न दे कोई ,

   ये सियासत ही तो  लोकतंत्र को सुर्खरू बनाती है।  

सोमवार, 21 नवंबर 2016

क्या बाकई मेंरा देश आगे बढ़ रहा है?


  मेरा देश ,,मेरा देश ,,मेरा देश ,,,आगे बढ़ रहा है ,,,,,गरीब की रसोई से धुंआँ हट रहा है ! भारत संचार निगम लिमिटेड के किसी अधिकारी  को जब मोबाइल पर रिंग करो तो अक्सर यह देशभक्तिपूर्ण  टोन सुनाई देती है।

 देश के वर्तमान हालात को देखकर उन्हें अब यह टोन रिकार्ड कर लेना चाहिए :.........


पटरियां उखड़ रहीं हैं ,डिब्बे पलट रहे हैं।

रेल दुर्घटनाओं में लोग बेतहाशा मर रहे हैं।।

नोटबंदी के कारण  देश में मची है किल्लत ,

आबाल-बृद्ध नर-नारी कुछ बेमौत मर रहे हैं।

 बदमाश चोट्टे अपना कालाधन दिन दहाड़े ,

  पिछले दरवाजे से बाकायदा सफेद कर रहे हैं।

डालर और विश्व की करेंसी ऊपर चढ़ रही है,

मगर भारतीय  रूपये के क्यों दाम घट रहे  हैं।

सीमाओं पर जवानों का लहू  सस्ता बह रहा है  ,

और केवल सत्ताधारी नेताओं के भाव बढ़ रहे हैं।

 कौन कहता है  गरीबकी रसोईसे धुँआँ घट रहा है,

 हकीकत में तो गरीब की रसोई में चूहे मचल रहे हैं।

  यदि  बाकई मेंरा देश आगे बढ़ रहा है तो क्यों ,

  अंतर्राष्टीय सूचकांक में हम   नीचे  गिर रहे हैं।

  ये नोटबंदी  ये जुमले ये  चोंचले पाखण्ड है सब ,

  देश जड़वत है केवल  नेताओं की  तेवर बदल रहे हैं।


   श्रीराम तिवारी

 

रविवार, 20 नवंबर 2016

अचानक आधी रात के बाद। [poem by shriram tiwari]

मैं जनता हूँ हर कोई कामना पूरी नहीं होती, खुदा से दरख्वास्त के बाद।

फिर भी खुवाहिश है कि 'इंकलाब' आजाये, कभी किसी आधी रात के बाद।।

इस सिस्टम में कराह सुनता हूँ स्वप्न में भी जब, कभी किसी मजलूम की,

 मुठ्ठियाँ  भिंच जातीं हैं ,पैर से ठोकर मारता हूँ ,दीवार को आधी रात के बाद।


कुछ लोग लड़ते हुए कुछ  बिना लड़े ही 'शहीद' हो जाते हैं  सीमाओं पर ,

 राष्ट्र का सनातन शत्रु भी सीमाओं पर घात लगाये बैठा है आधी रात के बाद।

कभी- कभी संसद भंग की गयी अतीत में और स्थिगित किया गया संविधान,

थोप  दिया गया  देश पर जबरन स्याह आपातकाल आधी रात के बाद।

कभी सुनाया गया हुक्म 'नोटबंदी' का याने मौद्रिक सर्जिकल स्ट्राइक का,

देश के नवेले रहनुमाओं ने कर दिया ऎलान अचानक आधी रात के बाद।

जाने क्यों  इस देश की रेलगाडियाँ अभिशप्त हैं और उतर जातीं हैं पटरी से ,

मर जाते हैं एक साथ सैकड़ों नर -नारी आबाल बृद्ध  आधी रात के बाद।

जंगे आजादी का चुटकी भर प्रसाद भी नसीब नहीं हुआ  मेहनतकशों को, 

 जिनके पूर्वजों की कुर्बानियों से मिली थी यह आजादी आधी रात के बाद।

  श्रीराम तिवारी

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

असुरक्षित है आज ,वतन पर छाया संकट।। [Shriram Tiwari]



 अमर शहीदों के ह्रदय ,होगा दुखद मलाल।

 देश की सत्ता में घुसे  ,रिश्वतखोर  दलाल।।

 रिश्वतखोर दलाल ,स्वार्थी  कपटी  लम्पट।

 असुरक्षित है आज ,वतन पर छाया संकट।।

 नागफाँस जातीय ,नस्ल मजहब का जहर।

 पीकर नहीं हो सकता , कोई भी राष्ट्र अमर।।

                  श्रीराम तिवारी

रविवार, 9 अक्टूबर 2016

राजनीति और सत्ता ,जैसे लोकतंत्र की पाहूनी है। [shriram tiwari]


 इस दौर की असली सूरत बेहद डरावनी है।

 भले ही वेशभूषा आकर्षक और लुभावनी है।।


 एटॉमिक हथियारोंके जखीरे यथावत कायम हैं ,

 गौर से देखो लगता है कि सारा जग छावनी है।


 शासन-प्रशासन ,पुलिस -प्रहरी उनके लिए हैं ,

 राजनीति और राज्य सत्ता ,जिनकी पाहूनी है।


 सूचना - संचार क्रांति की असीम अनुकम्पा से,

 गलाकाट स्पर्धा अलगाव का दौर दुखदायनी है।


                   श्रीराम तिवारी


 

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

अँधेरे के खिलाफ लड़ने के लिए,,,!


निर्बल निरीह निर्बोध को निगलने के लिए,

 इन्सानियत के दुश्मन हरदम तैयार रहते हैं ,

 जब मचता है चारों ओर हाहाकार -चीत्कार,

 स्याह रातों में सदा शैतान किरदार रहते हैं ,

जंग जरुरी हो जब काली ताकतों के खिलाफ,

 लड़ने के लिए केवल  'शहीद' तैयार रहते हैं ,

खुदा  ईश्वर  गॉड मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारा ,

ये तो अपनी दुकान चलाने को तैयार रहते हैं।

धर्म-मजहब कभी कमजोरों का साथ नहीं देते ,

ताकतवर लोग ही इसे इश्तेमाल करते रहते हैं।

 अज्ञानता और अँधेरे के खिलाफ लड़ने के लिए,

 दीपक जुगनू चाँद सितारे  सूरज तैयार रहते हैं ,

श्रीराम तिवारी





 

शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

अनमोल त्रयी सूत्र ,,,,,,,![shriram tiwari]


 समय ,मृत्यु और ईश्वर -मानवीय चेतना के मुँहताज हैं ।

 पदार्थ ,चेतना और विचार ये तीनों जगत के सरताज हैं।।


 वक्त मौत और ग्राहक -किसी का इन्तजार नहीं करते।

 कर्ज ,फर्ज और मर्ज -समझदार लोग नहीं भूला करते ।।


 माँ बाप जवानी - जीवन में किसीको दुबारा नहीं मिलते ।  

 कम खाने , गम खाने,  नम जाने से असमय नहीं मरते । 


सोमवार, 29 अगस्त 2016

परिंदे नजर को आसमानी रख।-[gazal by -shriram tiwari]


परिंदे हौसला कायम रख ,उड़ान जारी रख,

हर इक निगाह तुझ पर है ,ध्यान ज्ञानी रख।

बुलंदियाँ  तेरी  हिम्मत  को  आजमाएँगीं,

परों में जान रख, नजर को आसमानी रख।

 परिंदे कई उड़े पहले , भटककर राह भूले ,

 लौटकर आये नहीं, याद उनकी निशानी रख।

 दहक़ता आसमाँ ,बादल घनेरे, अँधेरा घुप्प ,

 कौंधतीं  बिजलियाँ चमकें ,पुरुषत्व पानी रख।

 भेदकर धुंध के उस पार ,विहंगावलोकन कर ,

 सितारों से भी आगे जाना है ,तूँ रवानी रख ।


  श्रीराम तिवारी




रविवार, 28 अगस्त 2016

हम जब कंक्रीट की दीवाल में  कील ठोकते हैं तो पहली बार में कील अक्सर मुड़ जाया करती है। कभी कभी दूसरी बार में  भी सफल नहीं हो पाते। लेकिन तीसरी या चौथी बार कील ठोकने में हम सफल हो जाते हैं।पहली एक-दो कीलों के मुड़ जाने या खराब हो जाने  का मतलब यह नहीं कि वह प्रयास अकारथ गया। हमें हमेशा याद रखना चहिये कि उन्ही पहले वाले प्रयासों के कारण अंतिम प्रयास में सफलता मिला करती है। पहले प्रयास द्वारा बनाई गयी गहराई ही बाद के प्रयासों के सफल परिणाम का कारण बनती है।

इसी तरह भृष्ट सिस्टम अथवा  अनैतिक -अनाचार के पोखरों के खिलाफ किया जाने वाला कोई भी संघर्ष बेकार नहीं जाता। क्योकि सत्य परेशां हो सकता है ,पराजित नहीं। भारत की संघर्षशील जनता द्वारा अंग्रेजों को खदेडने में  १०० साल लग गए। १८५७ की  पहली क्रांति पूर्णतः असफल रही। लेकिन उसी असफल क्रांति के कारण आगे चलकर संघर्ष तेज हुआ और १९४७ को अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए। इसी तरह किसी संस्था भी संस्था विशेष में  पदों पर बैठे भृष्ट पदलोलुप नेताओं को बाहर करने में भी वक्त लगता है। ईमानदार- न्यायप्रिय जनों को शुरूं में भले ही एक दो बार पराजय झलनी पड़े ,किन्तु अंततोगत्वा विजय सत्य की ही होती है। कहावत भी है कि बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ? लेकिन इसके लिए निरन्तर संघर्ष जारी रखना पहली शर्त है। श्रीराम तिवारी

बुधवार, 24 अगस्त 2016

मैं जब वयम हो गया । । - [Shriram Tiwri ]

 ऊषा की लालिमा घुली , भोर आगमन हो गया !

  जिंदगी की राह में तभी ,उनसे  मिलन हो गया !!

  दिव्यता अलौकिक हुई  ,अंजुरी में पुष्प थे खिले।
  
  उर्वरा वसुंधरा हो  गई ,दूधिया   गगन  हो गया ।।

  शब्द ओस बिंदु बन गए,  छंद खग कलरव हो गए ।

  जिजीविषा धन्य हो गई ,विचार जब अनंत हो गया।।  

  अर्थपूर्ण मन्त्र सध गए ,कर्म शंखनाद हो  गए ।  

  संघर्ष यज्ञवेदी पर ,स्वार्थ का  हवन हो गया।।

  अहम का वहम न रहा ,जब  मैं -वयम हो गया ।
                                 
  जीवन संग्राम में मेरा ,खुद से मिलन हो गया।।

  जिंदगी की राह में तभी ,उनसे मिलन हो गया।,,,,,,,,,,,,!

                     श्रीराम तिवारी

  
पुरवा हुम -हुम करे ,पछुवा गुन -गुन करे ,

  ढलती जाए शिशिर की जवानी हो।


  बीतें पतझड़ के दौर ,झूमें आमों में बौर ,

  कूँकी  कुंजन में कोयलिया कारी हो।


  उपवन खिलने लगे ,मन मचलने लगे ,

  ऋतु फागुन की आई सुहानी हो।


  करे धरती  श्रृंगार ,दिन वासंती चार,

   अली करने लगे मनमानी हो।


  फलें -फूलें दिगंत ,गाता  आये वसंत ,

  हर सवेरा नया और संध्या सुहानी हो।


               श्रीराम तिवारी

सोमवार, 15 अगस्त 2016

मेरा देश महान।




 पूरव का मानवीय दर्शन अध्यात्म ज्ञान ,पश्चिम का भौतिक विज्ञान।

 दोनों के द्वंद से नहीं संवाद से ही होगा ,  मानवमात्र का कल्याण।।

 पथ प्रदर्शक है शहीदों की शहादत ,नीति निर्देशक हमारा संविधान।

 अपने हिस्से की आहुति दें सभी ,तो निश्चय ही बनेगा  मेरा देश महान।।


  देश में सवा सौ करोड़ की आबादी ,खेलों पर अरबों रुपयों की बर्बादी।

  खेल संघों में घुसे नेता अफसर चोर,  खिलाड़ी मचाते फोकट का शोर ।।

  ये अपने घर में ही हैं सिर्फ बातों के शेर , रियो ओलम्पिक में हो गए  ढेर।

   भारत के सभासद अफसर मंत्री नादान ,केवल नीता अम्बानी बलवान ।।

   हम हैं दुनिया में लोकतंत्र और आबादी में  हीरो ,रियो में पदक मिले  जीरो।  

 

 

रविवार, 14 अगस्त 2016

अमर शहीदों को नमन

   भगतसिंह आजाद पुकारे जागो-जागो वीरो जागो।

  आजादी है ध्येय हमारा ,पीठ दिखाकर न तुम भागो।।

   बांधो कफ़न शीश पर साथी ,रिपु रण में होगी आसानी।

   स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर ,हंसते हंसते दो कुर्बानी।।

  पुरुष सिंह थे वे हुतात्मा ,जिनने मर मिटने की ठानी।

  आओ शीश नवाएं उनको ,जो थे क्रांति वीर बलिदानी।।

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

कविता -असली बारहमासा -[ रचनाकार -श्रीराम तिवारी ]

                  [१]
 
  चैत्र  गावै  चेतुवा  वैशाख गावै वनियाँ ,

  जेठ गावै रोहिणी अगनि बरसावै है।

  भवन सुलभ जिन्हें शीतल वातानुकूल ,

  बृष को तरनि तेज उन्हें न सतावै है।।

  नंगे पाँव कृषक भूँखा -प्यासा मजदूर ,

  पसीना बहाये थोड़ी छाँव को ललावै है।

 अंधड़ चलत इत झोपड़े उड़त जात ,

 बंगले से धुन उत डिस्को की आवै है।।


             [२]

 बोअनी की वेला में देर करे मानसून ,

निर्धन किसान मन शोक उपजावै है।

बंगालकी खाड़ीसे न आगे आवैं इंद्रदेव ,

वानियाँ वक्काल दाम दुगने बढ़ावै है।।

वक्त पै बरस जावें  अषढ़ा के बदरा ,

तो दादुरों की धुन पै  धरनि हरषावै है।

कारी घटा घिरआये,खेतों में बरस जाए,

सारँग की धुन सुन सारंग ही गावै है।।

               [३]

वन बाग़ खेत मैढ़ ,चारों ओर हरियाली ,

उदभिज  -गगन  अमिय झलकावै है।

पिहुं -पिहुं बोले पापी पेड़ों पै पपीहरा ,

चिर -बिरहन -मन उमंग जगावै है।।

जलधि मिलन चलीं इतराती सरिताएँ ,

गजगामिनी मानों  पिय घर जावै  है।

झूम-झूम  बरसें  सावन -सरस  घन ,

झूलने पै गोरी मेघ मल्हार गावै है।।

           [४]

 गीली -सीली लकड़ी का चूल्हा नहीं सुलगत ,

 गहर -गहर  बरसात  गहरावै है।

 एलपीजी सुविधा या सोलर इनर्जी का ,

 गाँव की गरीबनी दरस नहीं पावै है।।

 गरीबी में गीला आटा, सुरसा सी महँगाई ,

 श्रमिक गुजारे लायक मजूरी न पावै है।

 बाढ़ में ही बह गए टूटे-फूटे ठीकरे ,

डूब रही झोपड़ी पै  मौत मँडरावै है।

अभिजात्य कोठियों में परजीवी वनिता ,

भादों गोरी सेज सजन संग गावै  है।।

                 [५]

  1. धुल धुँआँ धुंध बयोम में बारूदी गंध घुली ,
  2. ऐंसी दीवाली तो सिर्फ शोहदों को सुहावै  है !
  3. रोजी के जुगाड़ की फ़िकर लागी जिनको।
  4. उत्सव उमंग उन्हें क्या खाक हुलसावै है?
  5. ख़ुशी मौज मस्ती चंद अमीरों की मुठ्ठियों में ,
  6. अडानी अंबानी  घर लक्ष्मी धन बरसावै है।
  7. कहाँ पै जलाएं,दिये अनिकेत अनगिन ,
  8. हिस्से में जिनको सिर्फ अमावश ही आवै है?


[६]

सरसों के फूल सजी धरा बनी दुलहन ,

अलसी के फूल करें अगहन से बात है ।

उड़ि उड़ि झुण्ड गगन पखेरूवा अनगिन ,

सुंदर मानसके हंसों की गति दिन रात है।।

बाजरा -ज्वार की गबोट खिली हरी भरी ,

रबी की फसल भी उगत चली आत है।

कहीं पै सिचाई होवै कहीं पै निराई होवै ,

साँझ ढले कहीं पै धौरी गैया रंभात है।।


  [७]


प्रातःही पसर गये धुंध धूल ओसकण,
पता ही न चले कब दिन ढल जावे है।
पूस की ये ठंडी रातें झोपड़ी में काटे जो,
खेत पै किसान को शीत लहर सतावे है।
कटी फटी गुदड़ी और घास फूस छप्पर ,
आशंका तुषार की नित जिया घबरावे है।
भूतकाल भविष्य या वर्तमान हर क्षण,
हर मौसम केवल सर्वहारा को सतावे है।
गर्म ऊनी वस्त्र और वातानकूलित कोठियाँ ,
लक्जरी लाइफ भॄस्ट बुर्जुआ ही पावे है।

   [८]

हेमन्त आगमन आतिथ्य ललचाये जब ,

माघ मकर संक्रांति दौड़ी चली आवै है।

फाल्गुन के संग आईं गेहुंओं में बालियाँ ,

अमुआ की डार  बौर अगनि लगावै  है।

 चम्पा कचनार बेला सेमल पलाश फूले ,

 पतझड़ तन मन अगनि लगावै  है।

 मादकता गंध लिए महुए के फूल झरें ,

 अली संग कोयल वसन्त को बुलावै है।

   [९]

  रिश्वतखोर साला भृष्ट बाबू अफसर ,

  राष्ट्र भृष्ट तंत्र कल पुर्जा बन जावै है।

  सोना चाँदी ओढ़े नोटों की माला पहनें ,

  गुलछर्रे उड़ावै और नेता कहलावै है।

 अधर्म अनीति की काली कमाई खाये ,

 सत्ता का सुख भी उन्हें  ही दुलरावै है।

 गरीब की मनेगी  कब ईद दीवाली होली ,

 कवि श्रीराम यक्ष प्रश्न दुहरावै है।




















मंगलवार, 26 जुलाई 2016

सलमान के भाग बड़े सजनी ,,,,,,,[poem-by Shriram Tiwari]


कानून की आँखों पर पट्टी और बंद कान हैं।

हत्यारा बेक़सूर सावित ,बजरंगी भाईजान हैं।।

बाल भी बांका नहीं हुआ उस दबंग हत्यारे का।

क्योंकि निर्लज्ज नंगे के ,सदा नौ ग्रह बलवान हैं।।

दुनियाँ में कहाँ ऐंसा सबका नसीब है साथियो?

क्या न्याय के पहरुए  ऐंसे सब पै मेहरवान हैं ??

चिंकारों का कत्ल हो या फुटपाथियों की मौत।

ये तो हरी इच्छा प्रबल और भावी बलवान हैं।।

रुपया -रुतवा साधन शोहरत  ईश्वर से बड़े है ।

वह गधा पहलवान, जिस पर खुदा मेहरवान हैं।।

-:श्रीराम तिवारी :-

सोमवार, 25 जुलाई 2016

दम्भ -पाखंड की जद में फिर आ गए हम !


निकले थे घर से जिसकी बारात लेकर , उसी के जनाजे में क्यों आ गए हम !
चढ़े थे शिखर पर जो विश्वास् लेकर , निराशा की खाई में क्यों आ गिरे हम !!

गाज जो गिराते हैं नाजुक दरख्तों पै , उन्ही की पनाहों में क्यों  जा गिरे हम !
फर्क ही नहीं जहाँ नीति -अनीति का ,संगदिल महफ़िल में खुद आ गए हम !!
खींचते है चीर गंगा जमुनी तहजीव का ,वे तेवर दुशासन के खुद ला रहे हम !
लगती रही  जिधर दावँ पर पांचाली ,शकुनि के जुआ घर में फिर आ गए हम  !!
कर सकते नहीं कद्र अपने  वतन की , दम्भ -पाखंड की जद में  आ गए हम !
 है - खूनी भयानक बर्बर अँधेरी ,उस वामी  के मुहाने पर  फिर आ गए हम ! !

श्रीराम तिवारी

गुरुवार, 30 जून 2016

गुरुडम में गच्चा खुद ही खा गए हम। [ A Poem by Shriram tiwari ]

घर से तो निकले थे खुशियाँ जुटाने ,उदास वीराने में क्यों आ गए हम।
होगा कबीलों में जंगल का क़ानून ,उसी के मुहाने पर क्यों आ गए हम ।।
कारवाँ हकालते हैं सत्ता के प्यादे , ज़माने की गर्दिश में क्यों आ गए हम ।
फर्क ही नहीं जहाँ नीति -अनीति का , खरामा- खरामा उधर आ गए हम।।
लग रही दाँव पर जिधर पांचाली , दुष्ट दुर्योधन के दरबार में आ गए हम ।...
चर्चा नहीं जन संघर्ष -क्रांति की ,ऐंसी बेजान महफ़िल में क्यों आ गए हम।।


निकले थे अपनी विपदा सुनाने , छल-छन्द के बाजार में आ गए हम ।
छकाते रहे जिस अज्ञान छाया को ,उसी की परीधि में खुद आ गए हम ।।
जो कारवाँ संवारते रहे जिंदगी भर ,उसी के निशाने पै खुद आ गए हम । 
अर्थ ही नहीं जहाँ नीति -अनीति का, बदनाम बस्ती में फिर आ गए हम।।   
लगती है जहाँ  दाँव पर पांचाली , उस धृतराष्ट्र के राज में आ गए हम।
उफ़ नहीं करते जहाँ द्रोण भीष्म कृप ,उस नापाक महफ़िल में  आ गए हम।।
चले थे जमाने को सत्पथ दिखाने ,गुरुडम से  भरपूर खुद भरमा गए हम।
दुनिया है गोल या कि इंसा की फितरत ,जहाँ से चले थे वहीँ आ गए हम।

श्रीराम तिवारी

शनिवार, 11 जून 2016

अमर शहीद आहें भर पूँछें ,क्या यह वतन हमारा है? [ A poem by -Shriram Tiwari ]


  नए  दौर  के  नए  ठगों ने ,नव उदार चोला पहना ।

 भारत देश की नीति बन गई ,शोषण को सहते रहना ।।

 सार्वजनिक सम्पत्ति  खाकर , निजी क्षेत्र बौराया है ।

 मीरजाफरों- जयचंदों का ,कठिन दौर फिर आया है ।।

 'सबको शिक्षा सबको काम दो ',मंद हुआ यह नारा है ।

 राष्ट्र निर्माण में फिर भी जुटा है ,वंचित सर्वहारा है ।।

 'भारत माता की जय' तो केवल ,भारत ही का नारा है।

 मेहनतकश जनता का नारा ,'सारा जहाँ हमारा है'।।

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स्वतंत्रता के भीषण रण में ,आशाओं के दीप जले ।

धर्मनिपेक्षता समाजवाद के ,लोकतंत्र के नीड पले ।।

जाति पाँति भाषा-मजहब ,ये शैतान के भाई सगे  ।

राजनीति की क्यारी में कुछ ,खरपतवार बबूल उगे।।

गिद्ध बाज चमगादड़ डोलें ,बोलें चमन हमारा है ।

इसीलिये तो आधा भारत , भूँख प्यास का मारा है ।।

मेहनतकश जनता का यौवन ,खटता मारा-मारा है ।

अमर शहीद आहें भर पूँछें ,क्या यह वतन हमारा है।।

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चोर -उचक्कों के कब्जे में ,जग उत्पादन  सारा है।

नहीं चेतना जन गण मन में ,न इंकलाब का नारा है ।।

कठिन दौर है मेहनतकश का ,नेता हैं नादान देश के।  

जो भी सत्ता पा जाते हैं ,कारण बनते गृहक्लेश के ।।

 राजनीति का नव घनचक्कर, वैश्वीकरण मुनाफा खोरी।

 आतंकवाद भी करता रहता ,राष्ट्रवाद से सीनाजोरी  ।।

 सभ्यताओं के वैमनस्य ने ,हिंस्र भाव को जन्म दिया ।  

 रिश्वतखोर दल्लों  ने उनको ,हथियारों से लैश किया ।। 

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 सत्ता की गुमनाम हस्तियाँ ,उड़ा रहीं हैं मौज मस्तियाँ । 

लोकतंत्र की सकल शक्तियाँ ,वसा रहीं बदनाम बस्तियाँ ।।

 विश्व मंच पर काबिज है अब ,काली पूँजी आवारा है।

 ललचाये इस नागिन को जो , एफडीआई का मारा है ।।

 सिस्टम खंडित हर स्तर पर , मण्डित भृष्ट पौबारा है।

 बागड़  व्यस्त खेत चरने में ,किसका बचा सहारा है।।

 ऊँट पटांग नीतियां जिनकी , वो शासक वेचारा है।

आबाल बृद्ध आहें भर पूँछें ,क्या यह वतन हमारा है।।

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लोकतंत्र में धनतंत्रों के ,गीत सुनाई देते हैं।




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शुक्रवार, 10 जून 2016

तीन बेर खातीं वे ,,,,,ते वे तीन बेर खातीं हैं।

जब प्याज के भाव आसमान पर होते हैं ,तो सत्ता  जमीन सूंघने लगती हैं ।
अब प्याज सड़कों पर वेभाव पडी है ,और सत्ता के पाँव जमीं पर नहीं हैं।।

इन पंक्तियों को लिखते ही मुझे अचानक कविवर 'भूषण ' याद आ गए। मुझे लगता है कि ' साहित्य समाज का दर्पण 'नहीं होता बल्कि वह 'देश काल परिस्थिति और सभ्यताओं के उत्थान-पतन का आइना हुआ करता है। यही वजह है कि सामन्त युगीन रचनाएं तो सर्वकालिक और कालजयी प्रतीत होती हैं और वर्तमान वैज्ञानिक अनुसन्धान आधारित रचना कर्म नित्य नाशवान  महसूस होता है। शायद इसीलिये वर्तमान तीव्रगामी -परिवर्तनशील -द्वन्दात्मक दौर में , सार्वभौम सत्य को निरुपित करते हुए , कालजयी रचनाओं का सृजन अतयन्त दुरूह  हो चला है। जबकि अतीत के सामन्तयुगींन अथवा पुरातन साहित्यिक परिवेश में ,खास तौर से हिन्दी साहित्य  में रीतिकालीन कवियों के सृजन ने सर्वकालिक नीति बोध ,मानवीय सौंदर्य बोध और मानव जीवन  की  बिडंबनाओं को भी कालजयी रचनाओं में पिरोया है। कविवर भूषण का एक मशहूर कवित्त -छन्द है ,जो कि अक्सर  हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों को 'यमक' अलंकार समझाने के बतौर उदाहरण - प्रस्तुत किया जाता है।

''ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाने वारी ,ते वे ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहातीं हैं।
विजन डुलातीं वे ,,,,,,,,,,,,, ,,,,,,,,,,,,,,,,  ते वे विजन डुलातीं हैं।।
तीन बेर  खातीं  वे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,ते वे तीन बेर खातीं  हैं।  ''

चूँकि कविवर  भूषण भी बिहारी या केशवदास जैसे  दरवारी और चारण कवि ही थे। इसलिए उन्हें उनके आका -सामन्तों के युध्दों और उनकी 'प्रियतमाओं ' के नख-शिख सौंदर्य वर्णन से ही फुरसत नहीं मिली। अतः महँगाई  के बारे में ,किसानों -मजूरों के बारे में ,दालों के बारे में ,सब्जियों या प्याज के बारे में उन्होंने कुछ भी नहीं लिखा। फिर भी कविवर भूषण का उक्त कालजयी छन्द लोक व्यवहार में अब भी व्यवहृत देखा जा सकता है। मध्यप्रदेश में इस साल प्याज की बम्फर फसल ने किसानों को बर्बाद कर दिया है।  मंडी में एक रुपया किलो भाव में भी खरीददार नहीं मिल रहे हैं। प्याज को लेकर जो मारामारी मची है उससे कवि भूषण का उक्त छप्यय् छन्द  पुनः याद आ रहा है। आप भी गौर फरमाएं :-

श्रीराम तिवारी ;-


मंगलवार, 24 मई 2016

जीवन यापन संघर्षों में यदि इंसानियत न भूल पाए । [A poem by :-Shriram Tiwari ]



    बल पौरुष और सत्ता यदि किसी कमजोर के काम आये ।

    जवानी यदि  देश की सीमाओं पर बल-पौरुष दिखलाये ।।

    मानव सत्य-न्याय का सिंहनाद करे क्रांति के गीत गाए। 

    कृषकाय युवा  खेतों में यदि अपना श्रम स्वेद बहाए ।।

    जीवन यापन संघर्षों में यदि  इंसानियत न भूल पाए ।

   लोभ-लालच की भृष्ट व्यवस्था का पुर्जा न बन जाए ।।

   'जनवादी कवि' इसको ही मानव अनुशासन कहते हैं ।

   योगीजन  शायद इसको शरीर अनुशासन कहते हैं।।

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  जिस धीरोदात्त चरित्र सिंहनाद से अन्यायी थर्राते हैं।

  अमृतवाणी समरसता की शब्द क्रांति दूत बन जाते हैं ।।

  वो सिंहनाद जिससे कि  हर युग में नव मानव ढलते हैं  ।

  जन महानाद  संगीत कला साहित्य सृजन करते हैं।।

  'सत्यम शिवम् सुंदरम' भी जब इंकलाब बन जाते  हैं ।

  'जनवादी कवि 'उसको ही जनक्रांति सुशासन कहते हैं।।

  योगीजन शायद उसको केवल बाचानुशासन कहते हैं ।

एक खास परिवार के भरोसे रहने के कारण कांग्रेस लोकतंत्र से महरूम हो गयी है।

  कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने टवीट किया है कि ''कांग्रेस उस बरगद के बृक्ष की तरह है ,जिसकी छाँव हिन्दू,मुस्लिम ,सिख ,ईसाई सबको बराबर मिलती है ,जबकि भाजपा तो जात -धर्म  देखकर  छाँव देती है। ''

  बहुत सम्भव है कि खुद कांग्रेस समर्थक प्रबुद्ध जन ही मनु अभिषक संघवी से सहमत नहीं होंगे ! इस विमर्श में भाजपा वालों के समर्थन की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती। उन्होंने ऐंसी साम्प्रदायिक घुट्टी पी रखी है कि जिसके असर से उन्हें 'भगवा' रंग के अलावा  'चढ़े न दूजो रंग '! दरसल मनु अभिषेक ने अपने ट्वीट में जो कहा वह तो कांग्रेस के विरोधी अर्से से कहते आ रहे हैं। इसमें नया क्या है ? कांग्रेस रुपी नाव में ही छेद करते हुए सिंघवी यह भूल गए कि भारतीय कांग्रेस  महज एक राजनीतिक पार्टी नहीं बल्कि एक खास विचारधारा का नाम है। खैर कांग्रेस की चिंता जब कांग्रेसियों को नहीं तो हमारे जैसे आलोचकों को क्या पडी कि व्यर्थ शोक संवेदना व्यक्त करते रहें !

मनु अभिषेक सिंघवी  ने शायद हिंदी की  यह  मशहूर कहावत नहीं सुनी  की ''बरगद के पेड़ की छाँव में हरी दूब भी नहीं उगा करती '' अर्थात  किसी विशालकाय व्यक्ति ,वस्तु या गुणधर्म के समक्ष  नया विकल्प पनप नहीं सकता ! कुछ पुरानी चीजें ऐंसी होतीं हैं कि कोई नई चीज कितनी भी चमकदार या उपयोगी क्यों न हो ,किन्तु फिर भी वह  पुरानी के सामने  टिक ही नहीं पाती। राजनीती  में इसका भावार्थ यह भी है कि  कुछ दल या नेता   ऐंसे  भी होते हैं कि उनकी शख्सियत के सामने  नए-नए दल या नेता पानी भरते हैं। इसका चुनावी जीत-हार से कोई लेना-देना नहीं। समाज में इस कहावत का तातपर्य यह है कि दवंग व्यक्ति या  दवंग समाज के नीचे दबे हुए व्यक्ति या समाज का उद्धार  तब तक सम्भव नहीं ,जब तक वे उसके आभा मंडल से मुक्त न हो  जाए ।

 हालाँकि काग्रेस  की उपमा बरगद के पेड़ से  करना एक कड़वा सच है ,किन्तु सिंघवी द्वारा कहा जाना एक बिडंबना है।  यह आत्मघाती गोल करने जैसा कृत्य है।  मनु अभिषेक सिंघवी जैसा आला दर्जे का बकील  यदि  कांगेस को बरगद बताएगा तो कांग्रेस मुक्त भारत की  कामना  करने वालों की तमन्ना पूर्ण होने में संदेह क्या ?  वैसे भी आत्म हत्या करने वाले गरीब किसान ,वेरोजगार युवा ,गरीब छात्र और असामाजिकता से पीड़ित कमजोर वर्ग के नर-नारियों  की नजर में कांग्रेस और भाजपा एक ही सिक्के के दो  पहलु  हैं। लेकिन मेरी नजर में भाजपा और कांग्रेस में  बहुत अंतर् है। भाजपा घोर साम्प्रदायिक दक्षिणपंथी पूँजीवादी  पार्टी  है ,जो मजदूरों ,अल्पसंख्यकों और प्रगतिशील वैज्ञानिकवाद से घ्रणा करती है ,और  अम्बानियों-अडानियों ,माऌयाओं की सेवा में यकीन रखती है।  कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष  उदारवादी पूंजीवादी पार्टी  है। एक खास परिवार के भरोसे  रहने के कारण  वह लोकतंत्र से महरूम हो गयी है।  वैसे कांग्रेस वालों को बिना जोर -जबर्जस्ती  के जो कुछ मिला उसी में संतोष कर लिया करते हैं । उन्होंने ईमानदारी या देशभक्ति का ढोंग भी नहीं किया। देशभक्ति का झूंठा हो हल्ला भी नहीं मचाया। जबकि भाजपा वाले  कंजड़ों की भांति दिन दहाड़े डाके डालने में यकीन करते हैं।  इसका एक उदाहरण तो यही है कि जब  घोषित डिफालटर अडानी को आस्ट्रेलिया में किसी उद्द्य्म के लिए बैंक गारंटी की जरूरत पडी तो एसबीआई चीफ अरुंधति भट्टाचार्य और खुद पीएम भी साथ गए थे। क्या कभी इंदिरा जी राजीव जी या मनमोहन सिंह ने ऐंसा किया ? देश के १०० उद्योगपति ऐंसे हैं जो भारतीय बैंकों के डिफालटर हैं और बैंकों का १० लाख करोड़  रुपया डकार गए हैं ।  कोई  भी लुटेरा पूँजीपति  एक पाई लौटाने को  तैयार नहीं है ,सब विजय माल्या के बही बंधू हैं। जबकि गरीब किसान को हजार-पांच सौ के कारण बैंकों की कुर्की का सामना करना पड़ रहा है ,आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। मोदी सरकार बिना कुछ किये धरे ही अपने  दो साल की काल्पनिक उपलब्धियों के बखान में राष्टीय कोष का अरबों रुपया  विज्ञापनों में बर्बाद कर रही है। दलगत आधार पर साम्प्रदायिकता की भंग के नशे में चूर होकर  हिंदुत्व के ध्रुवीकरण में व्यस्त हैं ,मदमस्त हैं । जबकि मनु अभिषेक सिंघवी,दिग्गी राजा ,थरूर और अन्य दिग्गज कांग्रेसी केवल आत्मघाती गोल दागने में व्यस्त हैं।  कांग्रेस की मौसमी हार से भयभीत लोग भूल रहे हैं कि  कांग्रेस ने स्वाधीनता संग्राम का अमृत फल चखा है उसे  कोई नष्ट नहीं कर सकता , खुद गांधी ,नेहरू,पटेल भी  नहीं ! मोदी जी और संघ परिवार तो  कदापि नहीं ! श्रीराम  तिवारी

रविवार, 22 मई 2016

कौन -कौन तर गए ,कुम्भ के नहाए से ,मीन न तरी जाको गंगा में घर है ,,,[संत कबीर ]


लगभग एक माह तक चला उज्जैन सिंहस्थ  मेला -पर्व समाप्त हो चूका है । कुछ अखवार वाले और न्यूज चैनल वाले  जिन्हे मध्य प्रदेश सरकार ने खूब ठूंस -ठूंसकर खिलाया है,इस सिंहस्थ को ऐतिहासिक रूप से सफल बता रहे हैं।  केवल श्रद्धालु स्नानार्थी ही नहीं ,धर्मांध लाभार्थी ही नहीं  ,साधु -संत -महंत ज्ञानी -ध्यानी ही नहीं ,अपितु इस सिंहस्थ पर्व के तमाम प्रत्यक्ष और परोक्ष  'स्टेक होल्डर्स' भी इस सिंहस्थ मेले का गुणगान करते हुए ,अपना-अपना बोरिया विस्तर बांधकर  लौट चुके हैं । भारत के ज्ञात इतिहास में अब तक शायद ही किसी  राजा ने ,किसी सामन्त ने ,किसी राज्य सरकार ने ,किसी मुख्य्मंत्री ने - कुम्भ-सिंहस्थ के निमित्त इस कदर -अविरल आदरभाव,  समर्पण और आर्थिक वित्त पोषण किया हो ! शिवराज जैसा मन-बचन -कर्म सेराजकीय समर्पण शायद ही किसी  शासक ने  कभी  न्यौछावर किया हो !

मध्यप्रदेश के मौजूदा मुख्य्मंत्री शिवराज सिंह चौहान  ने सांस्कृतिक , सामाजिक एवं आध्यात्मिक संगम -सिंहस्थ पर्व की सफलता  के निमित्त जो किया है,उसकी मिशाल भारत में  तो क्या दुनिया में भी नहीं मिलेगी।  बहरहाल उनके इस सकाम भक्तिभाव से 'संघ परिवार'  गदगदायमान है। भगवान महाकाल  और  शिप्रा +नर्मदा मैया भी शिवराज पर अवश्य ही प्रशन्न होंगी ! तमाम मठाधीश ,साधु , संत ,महंत,शंकराचार्य ,महामंडलेश्वर , व्यापारी,ठेकेदार,अधिकारी -सभी शिवराज से खुश हैं । पीएम नरेंद्र मोदी जी भी  मध्यप्रदेश के नैनावा ज्ञान कुम्भ में शिवराज जी की तारीफ कर गए -अर्थात ''मोगेम्बो खुश हुआ ''!भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और इन सबके मुकुट मणि सर  संघ संचालक -महानुभाव मोहनराव भागवत ,एवं संघ गणांनाम्  सर्वश्री अनिल माधव दवे,राम माधव, भैया जी जोशी  इत्यादि  भी सिंहस्थ नहाकर शिवराज से  प्रशन्न भए !  इसमें कोई शक नहीं कि भगवान शिव खुद ही शिवराज के मार्ग की समस्त बाधाओं  को  दूर कर अभय दान  देने को लालायित हो रहे होंगे ! आकाशवाणी होने को है कि  हे तात - तुम्हारी सत्ता की  कुर्सी सुरक्षित रहे । न केवल कुर्सी सुरक्षित रहे बल्कि आगामी   चुनाव में  भी शिवराज को अंदर-बाहर  से कोई चुनौती न रहे ! एवमस्तु !  हालांकि  भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव  कैलाश विजयवर्गीय  भी महाकाल के उद्भट उपासक हैं अतएव उनके उदगार कि ' सिंहस्थ की सफलता किसी एक व्यक्ति या सरकार की बदौलत नहीं है बल्कि यह  तो महाकाल की कृपा से ही सम्भव हुआ है ।  कैलाश जी के अमृत रुपी बचनामृत से भाजपा की  राजनीतिक़  हांडी का आंतरिक तापमान ज्ञातव्य हो रहा है। उनके आशय को रहीम कवि  अपने दोहे में पहले ही समझा गए हैं ,,,

अमृत जैसे बचन में ,रहिमन रिस की गाँठ।
 जैसे मिश्री में मिली ,निअर्स बांस की गांठ।।


 खैर यह तो  'मुण्डे -मुण्डे मतरिभिन्ना' वाली कहावत  ही चरितार्थ हुई है ,मुझे तो इस कुम्भ -सिंहस्थ का  अंतिम दृश्य कुछ  यौं जान पड़ता है :-


ख़त्म हुआ जलसा अभी ,संगत उठी जमात।
अब निरीह निर्बल बचे ,तम्बू और कनात।।

इन मजदूरों ने किया ,यह सब बंदोबस्त।
भूंखे-प्यासे  जुटे रहे ,महीनों हालत खस्त। ।

जो बतलाते हैं हमें ,स्वर्ग प्राप्त तरकीब।
 उन  परजीवी धूर्त से ,मेरा  वतन गरीब।।

होटल हो या खेत हो ,फैक्टरी खलिहान।
मुफलिस बच्चों के लिए ,कैसा कुम्भ स्नान। ।

संत कबीर को भी जब कभी इसी तरह के दौर से गुजरना पड़ा होगा तो उन्होंने  निम्नलिखित भजन लिखा मारा !

कौन -कौन तर गए ,कुम्भ के नहाए से ,मीन न तरी जाको गंगा में घर है।
कौन-कौन तर गए भभूति लगाए से ,श्वान ने तरो  जाको घूरे पै  घर है।

कौन -कौन तर गए धूनी  रमाए से ,तिरिया ने तरी जाको  चूल्हे में घर है।
कौन -कौन तर गए ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,तरेंगे वही जिनके ह्रदय में हर है।।



कबीर का यह भजन बचपन में सुना था ,,अब विस्मृत हो चुका  है ,लेकिन कबीर के आशय से पूरी तरह विज्ञ हूँ और उसमें आस्था भी है। यही वजह है कि
६३ साल की उम्र में एक भी कुम्भ नहीं नहाया।  मैं  २८ मई- १९७६ को  ट्रांसफर होकर गाडरवारा से इंदौर  आया था ।  इंदौर आये हुए  पूरे चालीस साल हो गए ! यहाँ से उज्जैन  सिर्फ ५५  किलोमीटर है , और नासिक भी  ज्यादा दूर नहीं है ,किन्तु कभी  कोई कुम्भ -सिंहस्थ स्नान नहीं किए । दरसल इसकी जरूरत ही नहीं समझ पडी ! दोस्तों और सपरिजनों ने  भी बहुत मनाया-फुसलाया   किन्तु दिल है कि मानता नहीं । यद्द्पि मैं कुम्भ मेला , तीर्थटन  नदियों में पर्व स्नान को गलत नहीं मानता। अपितु मानवीय सांस्कृतिक जीवंतता के लिए उपयुक्त साधन  समझता हूँ । किन्तु राज्यसत्ता द्वारा राजकाज छोड़कर केवल  इस तरह के  धार्मिक मेगा इवेंट्स का वित्तपोषण किये जाने का औचित्य मुझे समझ में नहीं आया !  मनुष्य जीवन की शुचिता ,आत्मिक पवित्रता ,कष्ट मुक्ति ,पुण्यलाभ इत्यादि के निमित्त किसी भी व्यक्ति की अहेतुक आध्यात्मिक यात्रा उसका अपना व्यक्तिगत अधिकार है। और उसकी मनोवृत्ति आस्तिक-नास्तिक कुछ भी हो सकती है ,किन्तु  एक गरीब देश या प्रदेश में  केंद्र-राज्य सरकार और शासन-प्रशासन की सम्पूर्ण सामर्थ्य एवं वित्तीय संसाधनों का इस तरह बेजा दुरूपयोग मुझे कतई पसंद नहीं आया  !  श्रीराम तिवारी

सोमवार, 9 मई 2016

उनके दावे पर एतवार कौन करे ? [poem -by Shriram Tiwari]


बुलंदियों पर  है मुकाम उनका, फिर भी मुस्कराना नहीं आता।

दुनिया भर की खुशियाँ नसीब हैं. बस खिलखिलाना नहीं आता।

न जाने  क्यों देता है  खुदा उन्हें  खुदाई और प्रभु इनको प्रभुता ,

जिन्हें अपनी आभासी  छवि के अलावा कुछ और नजर नहीं आता।

 वक्त और सियासत ने  बख्स दी उनको शख्सियत कुछ ऐंसी कि

 श्मशान की लपटें  और सूखे खेतों का धुआँ उन्हें नजर नहीं आता।

 माना कि मौसमें बहार आई है  उनके जीवन की बगिया महक उठी ,

 लेकिन  काली स्याह रातों के अँधेरे पर रौब  ज़माना उन्हें  नहीं आता।

 उनके दावे पर एतवार कौन करे की शबे-रात के हमसफर होंगे  ?

  उन्हें तो  शायद अपने ही रूठे हुओं को मनाना  नहीं  आता।


                   श्रीराम तिवारी

रविवार, 8 मई 2016

जबसे हवाओं का रुख बदलने लगा है,,,! [poem by Shriram Tiwari ]


 जो भी चाहा वो नहीं मिला फिर भी कोई कोई गम नहीं ।

 बिना किसी वैशाखी के चल सके  यह भी तो कम नहीं।। 

 कदम जो भी आगे बढे और अनजानी राहों पर तन्हा चले ,

  कई बार ठोकरें खाईं और जीते भी  ये कुछ कम  तो नहीं ।

  संकल्पों की ऊँची उड़ानों  पर बज्रपात  हुआ बार-बार किन्तु  ,

  हौसले  बुलंद रख्खे और हार नहीं मानी यह भी  कुछ कम नहीं ।

   बक्त ने जो चाहा कराया और जमाने ने खूब  कहर बरपाया ,

   जीने की जद्दोजहद में इंसानियत नहीं भूले यह कुछ कम नहीं ।

    जबसे हवाओं का रुख बदलने लगा है, मन कुछ डरने लगा है ,

    हर वक्त चौकन्ना हूँ कि आस्तीन में कहीं कोई साँप तो नहीं।


                   श्रीराम तिवारी

 

गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

रिस्ता रूहानी हो और जीने को मजबूर करे। श्रीराम तिवारी।

 हरेक रात के बाद ,एक नयी सुबह आती है।

 उम्र का काम है गुजरना ,सो गुजर जाती है।।

 अपनी ख्वाइशों को मोहब्ब्त का नाम न दो ,

 मोहब्बत तो इबादत है जो  सुर्खुरु  बनाती है ।


  जिंदगी ऐंसी हो कि जीने को मजबूर करे।

  राह ऐंसी हो कि  चलने को मजबूर करे।

  खुशबू कभी कम न हो उमङ्ग भरे जीवन की ,

  रिस्ता रूहानी हो और जीने को मजबूर करे।


 ढलती संध्या के श्यामल आहत क्षण में उत्स  

 जीवन नभ में ज्यों विधु कुमकुम छिटका हो।

 धरती अम्बर जगतीतल संग गावें जीवन गान ,

आशाओं के दीप जलें- भले ही जीवन ढलता हो।  



 
:-श्रीराम तिवारी।

                            

बुधवार, 30 मार्च 2016

संघर्षों की सही दिशा है ,भगतसिंह की वाणी में। -[Shriram Tiwari ]





  माल समेटकर भागा माल्या ,बैंक अजब हैरानी में।

  मंद -मंद मुस्कराए मंत्रीवर , भैंस गयी जब पानी में।।

 
  सुरा सुंदरी सब कुछ पाया  , माल्या ने आसानी  में।

  ईपीएफ और वेतन डूबा  ,किंगफिशर है हानी  में।।


  काले धन  वालों की सीरत ,छिपी कपट की बानी में।

  लोकतंत्र के चारों खम्बे ,  सिस्टम  की नादानी में।।


  लुटिया डूबी  अर्थ तंत्र की , सकल बैंक  हैरानी  में।

  निर्धन जन ही रोता रहता  ,कुर्की खींचातानी  में।


  कॉरपोरेट पूँजी की जय-जय , ग्लोबल कारस्तानी में।

  निर्धन -निबल बटे  आपस में ,धर्म -जाति की घानी में।


  संघर्षों की  सही दिशा  तो   ,भगतसिंह  की  वाणी में।

  बलिदानों की गाथा गूंजे , भारत अमर कहानी में  ।।

 
                     श्रीराम तिवारी
 

काजू-किशमिश हो गयी ,देशी अरहर दाल ! [ Dohe- Shriram Tiwari]


आतंकी उन्माद का , बड़ा भयंकर शोर ।

 मजहब के पाखण्ड की ,हवा चली घनघोर ।।


  राजनीति के मार्ग पर ,निहित स्वार्थकी भीड़।

  लोकतंत्र ने रच दिए , नए नारों की नीड़ ।।


   जात-पाँत की रैलियाँ ,भाषण बोल कबोल ।

   वोट जुगाडू खेल हैं ,बाजें नीरस ढोल ।।


  पक्ष-विपक्ष प्रमादवश ,कोई नहीं गम्भीर।

  एक दूजे पर छोड़ते ,बातों के शमशीर।।



  भारत के जनतंत्र को ,लगा भयानक रोग।

  लोकतंत्र को खा  गए ,घटिया शातिर लोग।।


  नयी आर्थिक नीति ने , देश  किया कंगाल।

  काजू-किशमिश हो गयी ,देशी अरहर दाल।।


  रुपया खाकर बैंक का ,माल्या हुआ फरार।

  नेता संसद में करें ,फोकट की तकरार।।


   एशियन टाइगर मस्त हैं ,लातीनी खुशहाल।

  अखिल विश्व बाजार में ,भारत क्यों बदहाल ।।


 अच्छे दिन इनके हुए  ,नेता-ठग दलाल ।

 मुठ्ठी भर धनवान भये ,बाकी सब  कंगाल।।


  जात- वर्ण आधार पर , आरक्षण  की नीति।

   बढ़ी  बिकट असमानता ,पूंजीवाद की प्रीत ।।


   आवारा पूँजी  कुटिल , व्याप रही  सब ओर।

    इसीलिये  भयमुक्त  हैं ,चोर  मुनाफाखोर।।


   बढ़ते व्यय के बजट की ,कुविचारित यह नीति ।

   ऋण पर ऋण लेते रहो ,गाओ ख़ुशी के गीत    ।।


   रातों-रात ही  हो गए ,राष्ट्र रत्न नीलाम।

   औने -पौने बिक गए ,बीमा -टेलीकॉम।।


  लोकतंत्र की पीठ पर ,लदा  माफिया आज ।

  ऊपर से नीचे तलक , भृष्ट  कमीशन काज  ।।


  वित्त निवेशकों के लिए ,तोड़ दिए तटबंध।

  आनन-फानन कर चले ,जन  विरुद्ध अनुबंध।।


  पूँजी मिले विदेश से ,और तकनीक तत्काल।

  देश विरोधी संधियां, अब जी का जंजाल।। 


 अण्णा तब अनशन किया ,लोकपाल के भेद   ।

  यूपीए का  कर दिया ,सत्ता से उच्छेद।।


  एनडीए  के राज में , भई भ्रुष्टन की धूम  ।

  अब अण्णा जी मौन है, बुद्धि से महरूम ।।

   श्रीराम तिवारी

 







 













 


 


















   







रविवार, 20 मार्च 2016

नव पल्लव - नव् सुप्रभात हो - श्रीराम तिवारी



   वही  देश का मालिक हो  , हाथ कुदाली छैनी हो !

   सामाजिक  समरसता हो , लोकतंत्र  की  बेणी  हो !!


   उंच नीच का भेद न हो ,जन  गण  मन  त्रिवेणी हो !

   नर -नारी सब मिलकर बोलें  ,इंकलाब की बेनी हो!!


   मानवता भ्रातत्वभाव की  ,नीति नियति नसेनी हो !

  समझबूझ विज्ञान ज्ञानमय ,साखी शबद रमैनी हो ! !


   जनता खुद  जननायक हो , प्रभुता  चना चवैनी हो !

   अजातशत्रु  हो राष्ट्र सभी  ,क्यों मात किसी को देनी हो !!


    नव पल्लव  - नव् सुप्रभात हो , नव खग कलरव भरणी हो !

    नव मानव नव -नव नीर -क्षीर ,नव केवट नव तरणी  हो !!

        श्रीराम तिवारी 

शनिवार, 5 मार्च 2016



लम्हा-लम्हा सरकती जिंदगी ,को कुछ इस तरह जी लिया।

कुछ से  कृतज्ञता व्यक्त की ,कुछ का एहसान मान लिया।।  श्रीराम तिवारी।।

 

शुक्रवार, 4 मार्च 2016


हिंदी व्याकरण अध्येताओं और हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों के लिए यमक अलंकार का एक आधुनिक उदाहरण :-


नगरनिगम असफल हुई ,जल सप्लाई निदान।

जलकर बिल भरते नहीं ,जलकर ही नादान।।  


प्रस्तोता :-श्रीराम तिवारी