बुलंदियों पर है मुकाम उनका, फिर भी मुस्कराना नहीं आता।
दुनिया भर की खुशियाँ नसीब हैं. बस खिलखिलाना नहीं आता।
न जाने क्यों देता है खुदा उन्हें खुदाई और प्रभु इनको प्रभुता ,
जिन्हें अपनी आभासी छवि के अलावा कुछ और नजर नहीं आता।
वक्त और सियासत ने बख्स दी उनको शख्सियत कुछ ऐंसी कि
श्मशान की लपटें और सूखे खेतों का धुआँ उन्हें नजर नहीं आता।
माना कि मौसमें बहार आई है उनके जीवन की बगिया महक उठी ,
लेकिन काली स्याह रातों के अँधेरे पर रौब ज़माना उन्हें नहीं आता।
उनके दावे पर एतवार कौन करे की शबे-रात के हमसफर होंगे ?
उन्हें तो शायद अपने ही रूठे हुओं को मनाना नहीं आता।
श्रीराम तिवारी

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