सोमवार, 25 जुलाई 2016

दम्भ -पाखंड की जद में फिर आ गए हम !


निकले थे घर से जिसकी बारात लेकर , उसी के जनाजे में क्यों आ गए हम !
चढ़े थे शिखर पर जो विश्वास् लेकर , निराशा की खाई में क्यों आ गिरे हम !!

गाज जो गिराते हैं नाजुक दरख्तों पै , उन्ही की पनाहों में क्यों  जा गिरे हम !
फर्क ही नहीं जहाँ नीति -अनीति का ,संगदिल महफ़िल में खुद आ गए हम !!
खींचते है चीर गंगा जमुनी तहजीव का ,वे तेवर दुशासन के खुद ला रहे हम !
लगती रही  जिधर दावँ पर पांचाली ,शकुनि के जुआ घर में फिर आ गए हम  !!
कर सकते नहीं कद्र अपने  वतन की , दम्भ -पाखंड की जद में  आ गए हम !
 है - खूनी भयानक बर्बर अँधेरी ,उस वामी  के मुहाने पर  फिर आ गए हम ! !

श्रीराम तिवारी

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