शनिवार, 11 जून 2016

अमर शहीद आहें भर पूँछें ,क्या यह वतन हमारा है? [ A poem by -Shriram Tiwari ]


  नए  दौर  के  नए  ठगों ने ,नव उदार चोला पहना ।

 भारत देश की नीति बन गई ,शोषण को सहते रहना ।।

 सार्वजनिक सम्पत्ति  खाकर , निजी क्षेत्र बौराया है ।

 मीरजाफरों- जयचंदों का ,कठिन दौर फिर आया है ।।

 'सबको शिक्षा सबको काम दो ',मंद हुआ यह नारा है ।

 राष्ट्र निर्माण में फिर भी जुटा है ,वंचित सर्वहारा है ।।

 'भारत माता की जय' तो केवल ,भारत ही का नारा है।

 मेहनतकश जनता का नारा ,'सारा जहाँ हमारा है'।।

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स्वतंत्रता के भीषण रण में ,आशाओं के दीप जले ।

धर्मनिपेक्षता समाजवाद के ,लोकतंत्र के नीड पले ।।

जाति पाँति भाषा-मजहब ,ये शैतान के भाई सगे  ।

राजनीति की क्यारी में कुछ ,खरपतवार बबूल उगे।।

गिद्ध बाज चमगादड़ डोलें ,बोलें चमन हमारा है ।

इसीलिये तो आधा भारत , भूँख प्यास का मारा है ।।

मेहनतकश जनता का यौवन ,खटता मारा-मारा है ।

अमर शहीद आहें भर पूँछें ,क्या यह वतन हमारा है।।

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चोर -उचक्कों के कब्जे में ,जग उत्पादन  सारा है।

नहीं चेतना जन गण मन में ,न इंकलाब का नारा है ।।

कठिन दौर है मेहनतकश का ,नेता हैं नादान देश के।  

जो भी सत्ता पा जाते हैं ,कारण बनते गृहक्लेश के ।।

 राजनीति का नव घनचक्कर, वैश्वीकरण मुनाफा खोरी।

 आतंकवाद भी करता रहता ,राष्ट्रवाद से सीनाजोरी  ।।

 सभ्यताओं के वैमनस्य ने ,हिंस्र भाव को जन्म दिया ।  

 रिश्वतखोर दल्लों  ने उनको ,हथियारों से लैश किया ।। 

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 सत्ता की गुमनाम हस्तियाँ ,उड़ा रहीं हैं मौज मस्तियाँ । 

लोकतंत्र की सकल शक्तियाँ ,वसा रहीं बदनाम बस्तियाँ ।।

 विश्व मंच पर काबिज है अब ,काली पूँजी आवारा है।

 ललचाये इस नागिन को जो , एफडीआई का मारा है ।।

 सिस्टम खंडित हर स्तर पर , मण्डित भृष्ट पौबारा है।

 बागड़  व्यस्त खेत चरने में ,किसका बचा सहारा है।।

 ऊँट पटांग नीतियां जिनकी , वो शासक वेचारा है।

आबाल बृद्ध आहें भर पूँछें ,क्या यह वतन हमारा है।।

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लोकतंत्र में धनतंत्रों के ,गीत सुनाई देते हैं।




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