गुरुवार, 11 अगस्त 2016

कविता -असली बारहमासा -[ रचनाकार -श्रीराम तिवारी ]

                  [१]
 
  चैत्र  गावै  चेतुवा  वैशाख गावै वनियाँ ,

  जेठ गावै रोहिणी अगनि बरसावै है।

  भवन सुलभ जिन्हें शीतल वातानुकूल ,

  बृष को तरनि तेज उन्हें न सतावै है।।

  नंगे पाँव कृषक भूँखा -प्यासा मजदूर ,

  पसीना बहाये थोड़ी छाँव को ललावै है।

 अंधड़ चलत इत झोपड़े उड़त जात ,

 बंगले से धुन उत डिस्को की आवै है।।


             [२]

 बोअनी की वेला में देर करे मानसून ,

निर्धन किसान मन शोक उपजावै है।

बंगालकी खाड़ीसे न आगे आवैं इंद्रदेव ,

वानियाँ वक्काल दाम दुगने बढ़ावै है।।

वक्त पै बरस जावें  अषढ़ा के बदरा ,

तो दादुरों की धुन पै  धरनि हरषावै है।

कारी घटा घिरआये,खेतों में बरस जाए,

सारँग की धुन सुन सारंग ही गावै है।।

               [३]

वन बाग़ खेत मैढ़ ,चारों ओर हरियाली ,

उदभिज  -गगन  अमिय झलकावै है।

पिहुं -पिहुं बोले पापी पेड़ों पै पपीहरा ,

चिर -बिरहन -मन उमंग जगावै है।।

जलधि मिलन चलीं इतराती सरिताएँ ,

गजगामिनी मानों  पिय घर जावै  है।

झूम-झूम  बरसें  सावन -सरस  घन ,

झूलने पै गोरी मेघ मल्हार गावै है।।

           [४]

 गीली -सीली लकड़ी का चूल्हा नहीं सुलगत ,

 गहर -गहर  बरसात  गहरावै है।

 एलपीजी सुविधा या सोलर इनर्जी का ,

 गाँव की गरीबनी दरस नहीं पावै है।।

 गरीबी में गीला आटा, सुरसा सी महँगाई ,

 श्रमिक गुजारे लायक मजूरी न पावै है।

 बाढ़ में ही बह गए टूटे-फूटे ठीकरे ,

डूब रही झोपड़ी पै  मौत मँडरावै है।

अभिजात्य कोठियों में परजीवी वनिता ,

भादों गोरी सेज सजन संग गावै  है।।

                 [५]

  1. धुल धुँआँ धुंध बयोम में बारूदी गंध घुली ,
  2. ऐंसी दीवाली तो सिर्फ शोहदों को सुहावै  है !
  3. रोजी के जुगाड़ की फ़िकर लागी जिनको।
  4. उत्सव उमंग उन्हें क्या खाक हुलसावै है?
  5. ख़ुशी मौज मस्ती चंद अमीरों की मुठ्ठियों में ,
  6. अडानी अंबानी  घर लक्ष्मी धन बरसावै है।
  7. कहाँ पै जलाएं,दिये अनिकेत अनगिन ,
  8. हिस्से में जिनको सिर्फ अमावश ही आवै है?


[६]

सरसों के फूल सजी धरा बनी दुलहन ,

अलसी के फूल करें अगहन से बात है ।

उड़ि उड़ि झुण्ड गगन पखेरूवा अनगिन ,

सुंदर मानसके हंसों की गति दिन रात है।।

बाजरा -ज्वार की गबोट खिली हरी भरी ,

रबी की फसल भी उगत चली आत है।

कहीं पै सिचाई होवै कहीं पै निराई होवै ,

साँझ ढले कहीं पै धौरी गैया रंभात है।।


  [७]


प्रातःही पसर गये धुंध धूल ओसकण,
पता ही न चले कब दिन ढल जावे है।
पूस की ये ठंडी रातें झोपड़ी में काटे जो,
खेत पै किसान को शीत लहर सतावे है।
कटी फटी गुदड़ी और घास फूस छप्पर ,
आशंका तुषार की नित जिया घबरावे है।
भूतकाल भविष्य या वर्तमान हर क्षण,
हर मौसम केवल सर्वहारा को सतावे है।
गर्म ऊनी वस्त्र और वातानकूलित कोठियाँ ,
लक्जरी लाइफ भॄस्ट बुर्जुआ ही पावे है।

   [८]

हेमन्त आगमन आतिथ्य ललचाये जब ,

माघ मकर संक्रांति दौड़ी चली आवै है।

फाल्गुन के संग आईं गेहुंओं में बालियाँ ,

अमुआ की डार  बौर अगनि लगावै  है।

 चम्पा कचनार बेला सेमल पलाश फूले ,

 पतझड़ तन मन अगनि लगावै  है।

 मादकता गंध लिए महुए के फूल झरें ,

 अली संग कोयल वसन्त को बुलावै है।

   [९]

  रिश्वतखोर साला भृष्ट बाबू अफसर ,

  राष्ट्र भृष्ट तंत्र कल पुर्जा बन जावै है।

  सोना चाँदी ओढ़े नोटों की माला पहनें ,

  गुलछर्रे उड़ावै और नेता कहलावै है।

 अधर्म अनीति की काली कमाई खाये ,

 सत्ता का सुख भी उन्हें  ही दुलरावै है।

 गरीब की मनेगी  कब ईद दीवाली होली ,

 कवि श्रीराम यक्ष प्रश्न दुहरावै है।




















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