[१]
चैत्र गावै चेतुवा वैशाख गावै वनियाँ ,
जेठ गावै रोहिणी अगनि बरसावै है।
भवन सुलभ जिन्हें शीतल वातानुकूल ,
बृष को तरनि तेज उन्हें न सतावै है।।
नंगे पाँव कृषक भूँखा -प्यासा मजदूर ,
पसीना बहाये थोड़ी छाँव को ललावै है।
अंधड़ चलत इत झोपड़े उड़त जात ,
बंगले से धुन उत डिस्को की आवै है।।
[२]
बोअनी की वेला में देर करे मानसून ,
निर्धन किसान मन शोक उपजावै है।
बंगालकी खाड़ीसे न आगे आवैं इंद्रदेव ,
वानियाँ वक्काल दाम दुगने बढ़ावै है।।
वक्त पै बरस जावें अषढ़ा के बदरा ,
तो दादुरों की धुन पै धरनि हरषावै है।
कारी घटा घिरआये,खेतों में बरस जाए,
सारँग की धुन सुन सारंग ही गावै है।।
[३]
वन बाग़ खेत मैढ़ ,चारों ओर हरियाली ,
उदभिज -गगन अमिय झलकावै है।
पिहुं -पिहुं बोले पापी पेड़ों पै पपीहरा ,
चिर -बिरहन -मन उमंग जगावै है।।
जलधि मिलन चलीं इतराती सरिताएँ ,
गजगामिनी मानों पिय घर जावै है।
झूम-झूम बरसें सावन -सरस घन ,
झूलने पै गोरी मेघ मल्हार गावै है।।
[४]
गीली -सीली लकड़ी का चूल्हा नहीं सुलगत ,
गहर -गहर बरसात गहरावै है।
एलपीजी सुविधा या सोलर इनर्जी का ,
गाँव की गरीबनी दरस नहीं पावै है।।
गरीबी में गीला आटा, सुरसा सी महँगाई ,
श्रमिक गुजारे लायक मजूरी न पावै है।
बाढ़ में ही बह गए टूटे-फूटे ठीकरे ,
डूब रही झोपड़ी पै मौत मँडरावै है।
अभिजात्य कोठियों में परजीवी वनिता ,
भादों गोरी सेज सजन संग गावै है।।
[५]
[६]
सरसों के फूल सजी धरा बनी दुलहन ,
अलसी के फूल करें अगहन से बात है ।
उड़ि उड़ि झुण्ड गगन पखेरूवा अनगिन ,
सुंदर मानसके हंसों की गति दिन रात है।।
बाजरा -ज्वार की गबोट खिली हरी भरी ,
रबी की फसल भी उगत चली आत है।
कहीं पै सिचाई होवै कहीं पै निराई होवै ,
साँझ ढले कहीं पै धौरी गैया रंभात है।।
[७]
प्रातःही पसर गये धुंध धूल ओसकण,
पता ही न चले कब दिन ढल जावे है।
पूस की ये ठंडी रातें झोपड़ी में काटे जो,
खेत पै किसान को शीत लहर सतावे है।
कटी फटी गुदड़ी और घास फूस छप्पर ,
आशंका तुषार की नित जिया घबरावे है।
भूतकाल भविष्य या वर्तमान हर क्षण,
हर मौसम केवल सर्वहारा को सतावे है।
गर्म ऊनी वस्त्र और वातानकूलित कोठियाँ ,
लक्जरी लाइफ भॄस्ट बुर्जुआ ही पावे है।
[८]
हेमन्त आगमन आतिथ्य ललचाये जब ,
माघ मकर संक्रांति दौड़ी चली आवै है।
फाल्गुन के संग आईं गेहुंओं में बालियाँ ,
अमुआ की डार बौर अगनि लगावै है।
चम्पा कचनार बेला सेमल पलाश फूले ,
पतझड़ तन मन अगनि लगावै है।
मादकता गंध लिए महुए के फूल झरें ,
अली संग कोयल वसन्त को बुलावै है।
[९]
रिश्वतखोर साला भृष्ट बाबू अफसर ,
राष्ट्र भृष्ट तंत्र कल पुर्जा बन जावै है।
सोना चाँदी ओढ़े नोटों की माला पहनें ,
गुलछर्रे उड़ावै और नेता कहलावै है।
अधर्म अनीति की काली कमाई खाये ,
सत्ता का सुख भी उन्हें ही दुलरावै है।
गरीब की मनेगी कब ईद दीवाली होली ,
कवि श्रीराम यक्ष प्रश्न दुहरावै है।
चैत्र गावै चेतुवा वैशाख गावै वनियाँ ,
जेठ गावै रोहिणी अगनि बरसावै है।
भवन सुलभ जिन्हें शीतल वातानुकूल ,
बृष को तरनि तेज उन्हें न सतावै है।।
नंगे पाँव कृषक भूँखा -प्यासा मजदूर ,
पसीना बहाये थोड़ी छाँव को ललावै है।
अंधड़ चलत इत झोपड़े उड़त जात ,
बंगले से धुन उत डिस्को की आवै है।।
[२]
बोअनी की वेला में देर करे मानसून ,
निर्धन किसान मन शोक उपजावै है।
बंगालकी खाड़ीसे न आगे आवैं इंद्रदेव ,
वानियाँ वक्काल दाम दुगने बढ़ावै है।।
वक्त पै बरस जावें अषढ़ा के बदरा ,
तो दादुरों की धुन पै धरनि हरषावै है।
कारी घटा घिरआये,खेतों में बरस जाए,
सारँग की धुन सुन सारंग ही गावै है।।
[३]
वन बाग़ खेत मैढ़ ,चारों ओर हरियाली ,
उदभिज -गगन अमिय झलकावै है।
पिहुं -पिहुं बोले पापी पेड़ों पै पपीहरा ,
चिर -बिरहन -मन उमंग जगावै है।।
जलधि मिलन चलीं इतराती सरिताएँ ,
गजगामिनी मानों पिय घर जावै है।
झूम-झूम बरसें सावन -सरस घन ,
झूलने पै गोरी मेघ मल्हार गावै है।।
[४]
गीली -सीली लकड़ी का चूल्हा नहीं सुलगत ,
गहर -गहर बरसात गहरावै है।
एलपीजी सुविधा या सोलर इनर्जी का ,
गाँव की गरीबनी दरस नहीं पावै है।।
गरीबी में गीला आटा, सुरसा सी महँगाई ,
श्रमिक गुजारे लायक मजूरी न पावै है।
बाढ़ में ही बह गए टूटे-फूटे ठीकरे ,
डूब रही झोपड़ी पै मौत मँडरावै है।
अभिजात्य कोठियों में परजीवी वनिता ,
भादों गोरी सेज सजन संग गावै है।।
[५]
- धुल धुँआँ धुंध बयोम में बारूदी गंध घुली ,
- ऐंसी दीवाली तो सिर्फ शोहदों को सुहावै है !
- रोजी के जुगाड़ की फ़िकर लागी जिनको।
- उत्सव उमंग उन्हें क्या खाक हुलसावै है?
- ख़ुशी मौज मस्ती चंद अमीरों की मुठ्ठियों में ,
- अडानी अंबानी घर लक्ष्मी धन बरसावै है।
- कहाँ पै जलाएं,दिये अनिकेत अनगिन ,
- हिस्से में जिनको सिर्फ अमावश ही आवै है?
[६]
सरसों के फूल सजी धरा बनी दुलहन ,
अलसी के फूल करें अगहन से बात है ।
उड़ि उड़ि झुण्ड गगन पखेरूवा अनगिन ,
सुंदर मानसके हंसों की गति दिन रात है।।
बाजरा -ज्वार की गबोट खिली हरी भरी ,
रबी की फसल भी उगत चली आत है।
कहीं पै सिचाई होवै कहीं पै निराई होवै ,
साँझ ढले कहीं पै धौरी गैया रंभात है।।
[७]
प्रातःही पसर गये धुंध धूल ओसकण,
पता ही न चले कब दिन ढल जावे है।
पूस की ये ठंडी रातें झोपड़ी में काटे जो,
खेत पै किसान को शीत लहर सतावे है।
कटी फटी गुदड़ी और घास फूस छप्पर ,
आशंका तुषार की नित जिया घबरावे है।
भूतकाल भविष्य या वर्तमान हर क्षण,
हर मौसम केवल सर्वहारा को सतावे है।
गर्म ऊनी वस्त्र और वातानकूलित कोठियाँ ,
लक्जरी लाइफ भॄस्ट बुर्जुआ ही पावे है।
[८]
हेमन्त आगमन आतिथ्य ललचाये जब ,
माघ मकर संक्रांति दौड़ी चली आवै है।
फाल्गुन के संग आईं गेहुंओं में बालियाँ ,
अमुआ की डार बौर अगनि लगावै है।
चम्पा कचनार बेला सेमल पलाश फूले ,
पतझड़ तन मन अगनि लगावै है।
मादकता गंध लिए महुए के फूल झरें ,
अली संग कोयल वसन्त को बुलावै है।
[९]
रिश्वतखोर साला भृष्ट बाबू अफसर ,
राष्ट्र भृष्ट तंत्र कल पुर्जा बन जावै है।
सोना चाँदी ओढ़े नोटों की माला पहनें ,
गुलछर्रे उड़ावै और नेता कहलावै है।
अधर्म अनीति की काली कमाई खाये ,
सत्ता का सुख भी उन्हें ही दुलरावै है।
गरीब की मनेगी कब ईद दीवाली होली ,
कवि श्रीराम यक्ष प्रश्न दुहरावै है।

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