घर से तो निकले थे खुशियाँ जुटाने ,उदास वीराने में क्यों आ गए हम।
होगा कबीलों में जंगल का क़ानून ,उसी के मुहाने पर क्यों आ गए हम ।।
कारवाँ हकालते हैं सत्ता के प्यादे , ज़माने की गर्दिश में क्यों आ गए हम ।
फर्क ही नहीं जहाँ नीति -अनीति का , खरामा- खरामा उधर आ गए हम।।
लग रही दाँव पर जिधर पांचाली , दुष्ट दुर्योधन के दरबार में आ गए हम ।...
चर्चा नहीं जन संघर्ष -क्रांति की ,ऐंसी बेजान महफ़िल में क्यों आ गए हम।।
निकले थे अपनी विपदा सुनाने , छल-छन्द के बाजार में आ गए हम ।
छकाते रहे जिस अज्ञान छाया को ,उसी की परीधि में खुद आ गए हम ।।
जो कारवाँ संवारते रहे जिंदगी भर ,उसी के निशाने पै खुद आ गए हम ।
अर्थ ही नहीं जहाँ नीति -अनीति का, बदनाम बस्ती में फिर आ गए हम।।
लगती है जहाँ दाँव पर पांचाली , उस धृतराष्ट्र के राज में आ गए हम।
होगा कबीलों में जंगल का क़ानून ,उसी के मुहाने पर क्यों आ गए हम ।।
कारवाँ हकालते हैं सत्ता के प्यादे , ज़माने की गर्दिश में क्यों आ गए हम ।
फर्क ही नहीं जहाँ नीति -अनीति का , खरामा- खरामा उधर आ गए हम।।
लग रही दाँव पर जिधर पांचाली , दुष्ट दुर्योधन के दरबार में आ गए हम ।...
चर्चा नहीं जन संघर्ष -क्रांति की ,ऐंसी बेजान महफ़िल में क्यों आ गए हम।।
निकले थे अपनी विपदा सुनाने , छल-छन्द के बाजार में आ गए हम ।
छकाते रहे जिस अज्ञान छाया को ,उसी की परीधि में खुद आ गए हम ।।
जो कारवाँ संवारते रहे जिंदगी भर ,उसी के निशाने पै खुद आ गए हम ।
अर्थ ही नहीं जहाँ नीति -अनीति का, बदनाम बस्ती में फिर आ गए हम।।
लगती है जहाँ दाँव पर पांचाली , उस धृतराष्ट्र के राज में आ गए हम।
उफ़ नहीं करते जहाँ द्रोण भीष्म कृप ,उस नापाक महफ़िल में आ गए हम।।
चले थे जमाने को सत्पथ दिखाने ,गुरुडम से भरपूर खुद भरमा गए हम।
दुनिया है गोल या कि इंसा की फितरत ,जहाँ से चले थे वहीँ आ गए हम।
श्रीराम तिवारी
चले थे जमाने को सत्पथ दिखाने ,गुरुडम से भरपूर खुद भरमा गए हम।
दुनिया है गोल या कि इंसा की फितरत ,जहाँ से चले थे वहीँ आ गए हम।
श्रीराम तिवारी

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें