हर शख्स को जांचने -परखने के संसाधन बहुत हैं।
तूफ़ान में दिए को भी जलाये रखने के ठिये बहुत हैं।।
है जहाँ पर पतनशील अधोगामी भृष्ट शासन व्यवस्था ,
पूँजीवादी लोकतंत्र में जनाक्रोश के बहाने बहुत हैं।
सदियाँ गुजर गयीं मानव सभ्यता को संवारने में,
नैतिक मूल्यों को सुरक्षित बचाने के कारण बहुत हैं।
अमानवीय सिस्टम को ध्वस्त करने के अनेक तरीके हैं ,
बदतर हालत से निपटने के वैज्ञानिक अनुसंधान बहुत हैं।
रूप आकार नाक नक़्शे की ही शल्यक्रिया क्यों की जाए ?
शोषण उत्पीड़न अन्याय अत्याचार के ठिकाने बहुत हैं।
श्रीराम तिवारी

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