गुरुवार, 24 नवंबर 2016


हर एक स्याह रात के बाद फिर नई सुबह आती है।

घर के आँगन में कोई पेड़ हो तो गौरैया गाती है।।

तितलियाँ फुदकती हैं पतझड़ गुजर जाने के बाद भी.

चहकती चिड़िया भी सुमधुर भोर का राग सुनाती है।

कूँकती है कोयल जब कभी झूमते अमुआ की डाल पर,

किसी चिर बिरहन के कलेजे पर मानों खंजर चलाती है।

गौरैया ,तितली, चिड़िया, कोयल की कूँक और नई सुबह,

नियति के सम्पूर्ण अस्तित्व को आँगन में उतार लाती है।

तपती धरती सूखे खेत सूखे बाग़ बगीचे आसमा में बादल,

 देखदेखकर भूँखे किसान की थकान भी काफूर हो जाती है।

उसके पेट में अन्न हो और गुजारे लायक संसाधन,

तो गौरैया, तितली और कोयल उसे भी सुहाती है।

 देश -प्रदेश में सुशासन और न्यायप्रिय सिस्टम हो ,

 शोषण विहीन व्यवस्था हो तो जिंदगी कहलाती है। 

  अपनी निजी सनक को सियासत का नाम न दे कोई ,

   ये सियासत ही तो  लोकतंत्र को सुर्खरू बनाती है।  

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