रविवार, 8 मई 2016

जबसे हवाओं का रुख बदलने लगा है,,,! [poem by Shriram Tiwari ]


 जो भी चाहा वो नहीं मिला फिर भी कोई कोई गम नहीं ।

 बिना किसी वैशाखी के चल सके  यह भी तो कम नहीं।। 

 कदम जो भी आगे बढे और अनजानी राहों पर तन्हा चले ,

  कई बार ठोकरें खाईं और जीते भी  ये कुछ कम  तो नहीं ।

  संकल्पों की ऊँची उड़ानों  पर बज्रपात  हुआ बार-बार किन्तु  ,

  हौसले  बुलंद रख्खे और हार नहीं मानी यह भी  कुछ कम नहीं ।

   बक्त ने जो चाहा कराया और जमाने ने खूब  कहर बरपाया ,

   जीने की जद्दोजहद में इंसानियत नहीं भूले यह कुछ कम नहीं ।

    जबसे हवाओं का रुख बदलने लगा है, मन कुछ डरने लगा है ,

    हर वक्त चौकन्ना हूँ कि आस्तीन में कहीं कोई साँप तो नहीं।


                   श्रीराम तिवारी

 

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