जो भी चाहा वो नहीं मिला फिर भी कोई कोई गम नहीं ।
बिना किसी वैशाखी के चल सके यह भी तो कम नहीं।।
कदम जो भी आगे बढे और अनजानी राहों पर तन्हा चले ,
कई बार ठोकरें खाईं और जीते भी ये कुछ कम तो नहीं ।
संकल्पों की ऊँची उड़ानों पर बज्रपात हुआ बार-बार किन्तु ,
हौसले बुलंद रख्खे और हार नहीं मानी यह भी कुछ कम नहीं ।
बक्त ने जो चाहा कराया और जमाने ने खूब कहर बरपाया ,
जीने की जद्दोजहद में इंसानियत नहीं भूले यह कुछ कम नहीं ।
जबसे हवाओं का रुख बदलने लगा है, मन कुछ डरने लगा है ,
हर वक्त चौकन्ना हूँ कि आस्तीन में कहीं कोई साँप तो नहीं।
श्रीराम तिवारी

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