आतंकी उन्माद का , बड़ा भयंकर शोर ।
मजहब के पाखण्ड की ,हवा चली घनघोर ।।
राजनीति के मार्ग पर ,निहित स्वार्थकी भीड़।
लोकतंत्र ने रच दिए , नए नारों की नीड़ ।।
जात-पाँत की रैलियाँ ,भाषण बोल कबोल ।
वोट जुगाडू खेल हैं ,बाजें नीरस ढोल ।।
पक्ष-विपक्ष प्रमादवश ,कोई नहीं गम्भीर।
एक दूजे पर छोड़ते ,बातों के शमशीर।।
भारत के जनतंत्र को ,लगा भयानक रोग।
लोकतंत्र को खा गए ,घटिया शातिर लोग।।
नयी आर्थिक नीति ने , देश किया कंगाल।
काजू-किशमिश हो गयी ,देशी अरहर दाल।।
रुपया खाकर बैंक का ,माल्या हुआ फरार।
नेता संसद में करें ,फोकट की तकरार।।
एशियन टाइगर मस्त हैं ,लातीनी खुशहाल।
अखिल विश्व बाजार में ,भारत क्यों बदहाल ।।
अच्छे दिन इनके हुए ,नेता-ठग दलाल ।
मुठ्ठी भर धनवान भये ,बाकी सब कंगाल।।
जात- वर्ण आधार पर , आरक्षण की नीति।
बढ़ी बिकट असमानता ,पूंजीवाद की प्रीत ।।
आवारा पूँजी कुटिल , व्याप रही सब ओर।
इसीलिये भयमुक्त हैं ,चोर मुनाफाखोर।।
बढ़ते व्यय के बजट की ,कुविचारित यह नीति ।
ऋण पर ऋण लेते रहो ,गाओ ख़ुशी के गीत ।।
रातों-रात ही हो गए ,राष्ट्र रत्न नीलाम।
औने -पौने बिक गए ,बीमा -टेलीकॉम।।
लोकतंत्र की पीठ पर ,लदा माफिया आज ।
ऊपर से नीचे तलक , भृष्ट कमीशन काज ।।
वित्त निवेशकों के लिए ,तोड़ दिए तटबंध।
आनन-फानन कर चले ,जन विरुद्ध अनुबंध।।
पूँजी मिले विदेश से ,और तकनीक तत्काल।
देश विरोधी संधियां, अब जी का जंजाल।।
अण्णा तब अनशन किया ,लोकपाल के भेद ।
यूपीए का कर दिया ,सत्ता से उच्छेद।।
एनडीए के राज में , भई भ्रुष्टन की धूम ।
अब अण्णा जी मौन है, बुद्धि से महरूम ।।
श्रीराम तिवारी

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