शुक्रवार, 10 जून 2016

तीन बेर खातीं वे ,,,,,ते वे तीन बेर खातीं हैं।

जब प्याज के भाव आसमान पर होते हैं ,तो सत्ता  जमीन सूंघने लगती हैं ।
अब प्याज सड़कों पर वेभाव पडी है ,और सत्ता के पाँव जमीं पर नहीं हैं।।

इन पंक्तियों को लिखते ही मुझे अचानक कविवर 'भूषण ' याद आ गए। मुझे लगता है कि ' साहित्य समाज का दर्पण 'नहीं होता बल्कि वह 'देश काल परिस्थिति और सभ्यताओं के उत्थान-पतन का आइना हुआ करता है। यही वजह है कि सामन्त युगीन रचनाएं तो सर्वकालिक और कालजयी प्रतीत होती हैं और वर्तमान वैज्ञानिक अनुसन्धान आधारित रचना कर्म नित्य नाशवान  महसूस होता है। शायद इसीलिये वर्तमान तीव्रगामी -परिवर्तनशील -द्वन्दात्मक दौर में , सार्वभौम सत्य को निरुपित करते हुए , कालजयी रचनाओं का सृजन अतयन्त दुरूह  हो चला है। जबकि अतीत के सामन्तयुगींन अथवा पुरातन साहित्यिक परिवेश में ,खास तौर से हिन्दी साहित्य  में रीतिकालीन कवियों के सृजन ने सर्वकालिक नीति बोध ,मानवीय सौंदर्य बोध और मानव जीवन  की  बिडंबनाओं को भी कालजयी रचनाओं में पिरोया है। कविवर भूषण का एक मशहूर कवित्त -छन्द है ,जो कि अक्सर  हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों को 'यमक' अलंकार समझाने के बतौर उदाहरण - प्रस्तुत किया जाता है।

''ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाने वारी ,ते वे ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहातीं हैं।
विजन डुलातीं वे ,,,,,,,,,,,,, ,,,,,,,,,,,,,,,,  ते वे विजन डुलातीं हैं।।
तीन बेर  खातीं  वे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,ते वे तीन बेर खातीं  हैं।  ''

चूँकि कविवर  भूषण भी बिहारी या केशवदास जैसे  दरवारी और चारण कवि ही थे। इसलिए उन्हें उनके आका -सामन्तों के युध्दों और उनकी 'प्रियतमाओं ' के नख-शिख सौंदर्य वर्णन से ही फुरसत नहीं मिली। अतः महँगाई  के बारे में ,किसानों -मजूरों के बारे में ,दालों के बारे में ,सब्जियों या प्याज के बारे में उन्होंने कुछ भी नहीं लिखा। फिर भी कविवर भूषण का उक्त कालजयी छन्द लोक व्यवहार में अब भी व्यवहृत देखा जा सकता है। मध्यप्रदेश में इस साल प्याज की बम्फर फसल ने किसानों को बर्बाद कर दिया है।  मंडी में एक रुपया किलो भाव में भी खरीददार नहीं मिल रहे हैं। प्याज को लेकर जो मारामारी मची है उससे कवि भूषण का उक्त छप्यय् छन्द  पुनः याद आ रहा है। आप भी गौर फरमाएं :-

श्रीराम तिवारी ;-


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