हम जब कंक्रीट की दीवाल में कील ठोकते हैं तो पहली बार में कील अक्सर मुड़ जाया करती है। कभी कभी दूसरी बार में भी सफल नहीं हो पाते। लेकिन तीसरी या चौथी बार कील ठोकने में हम सफल हो जाते हैं।पहली एक-दो कीलों के मुड़ जाने या खराब हो जाने का मतलब यह नहीं कि वह प्रयास अकारथ गया। हमें हमेशा याद रखना चहिये कि उन्ही पहले वाले प्रयासों के कारण अंतिम प्रयास में सफलता मिला करती है। पहले प्रयास द्वारा बनाई गयी गहराई ही बाद के प्रयासों के सफल परिणाम का कारण बनती है।
इसी तरह भृष्ट सिस्टम अथवा अनैतिक -अनाचार के पोखरों के खिलाफ किया जाने वाला कोई भी संघर्ष बेकार नहीं जाता। क्योकि सत्य परेशां हो सकता है ,पराजित नहीं। भारत की संघर्षशील जनता द्वारा अंग्रेजों को खदेडने में १०० साल लग गए। १८५७ की पहली क्रांति पूर्णतः असफल रही। लेकिन उसी असफल क्रांति के कारण आगे चलकर संघर्ष तेज हुआ और १९४७ को अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए। इसी तरह किसी संस्था भी संस्था विशेष में पदों पर बैठे भृष्ट पदलोलुप नेताओं को बाहर करने में भी वक्त लगता है। ईमानदार- न्यायप्रिय जनों को शुरूं में भले ही एक दो बार पराजय झलनी पड़े ,किन्तु अंततोगत्वा विजय सत्य की ही होती है। कहावत भी है कि बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ? लेकिन इसके लिए निरन्तर संघर्ष जारी रखना पहली शर्त है। श्रीराम तिवारी
इसी तरह भृष्ट सिस्टम अथवा अनैतिक -अनाचार के पोखरों के खिलाफ किया जाने वाला कोई भी संघर्ष बेकार नहीं जाता। क्योकि सत्य परेशां हो सकता है ,पराजित नहीं। भारत की संघर्षशील जनता द्वारा अंग्रेजों को खदेडने में १०० साल लग गए। १८५७ की पहली क्रांति पूर्णतः असफल रही। लेकिन उसी असफल क्रांति के कारण आगे चलकर संघर्ष तेज हुआ और १९४७ को अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए। इसी तरह किसी संस्था भी संस्था विशेष में पदों पर बैठे भृष्ट पदलोलुप नेताओं को बाहर करने में भी वक्त लगता है। ईमानदार- न्यायप्रिय जनों को शुरूं में भले ही एक दो बार पराजय झलनी पड़े ,किन्तु अंततोगत्वा विजय सत्य की ही होती है। कहावत भी है कि बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ? लेकिन इसके लिए निरन्तर संघर्ष जारी रखना पहली शर्त है। श्रीराम तिवारी

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