मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

जन -गण -मन त्रिवेणी हो !

वही देश का मालिक हो ,जिस हाथ कुदाली छेनी हो !
जो बात सभी के हित की हो,वो बात जुबांसे कहनी हो !!
सच्ची सामाजिक समरसता हो, न ऊंच नीच की श्रेणी हो !
अभिव्यक्ति की आजादी हो ,कहीं न फासीवाद नसैनी हो!!
धर्मनिरपेक्षता समाजवाद लोकतंत्र गंगा जमुना त्रिवेणी हो !
न कोई नंगा भूंखा शोषित हो, न जाति पांत  की बैनी हो !!
मूल्य आधारित शासन हो,सलाह मेहनतकशों से लेनी हो !
समझ जिन्हें हो भले बुरे की,राष्ट्र की सत्ता उनको देनी हो !!
श्रीराम तिवारी

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

  1. बुरा बक्त किसी को बतलाकर नहीं आता।
  2. किया गया कुछ भी अपना बेकार नहीं जाता।।
  3. दूध के फट जाने पर दुखी होते हैं कुछ नादान,
  4. शायद  बापरों को रसगुल्ला बनाना नहीं आता।
  5. खुदा क्यों देता रहता खुदाई उनको इतनी सारी ,
  6. जिनको अपने सिवा कुछ और नजर नहीं आता।
  7. माना कि अभी बहारों का असर है फिजाओं में,
  8. फिर भी उन्हें गुलों से यारी निभाना नहीं आता।
  9. वेशक किसी से कोई गिला शिकवा न हो बंधूवर,
  10. लेकिन रूठों को मनाना तुम्हें बिल्कुल नहीं आता ।।
  11. खुदा की रहमत से बुलंदियों पर मुकाम है तुम्हारा ,
  12. लेकिन धरती पर पाँव ज़माना तुम्हें नहीं आता।
  13. क्या खाक करोगे उत्थान सृजन विकास मान्यवर,
  14. तुम्हें तो खेतों की सोंधी सुगंध में मजा नहीं आता।

  15. श्रीराम तिवारी

शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

  1. धुल धुँआँ धुंध बयोम में बारूदी गंध घुली ,
  2. ऐंसी दीवाली तो सिर्फ शोहदों को सुहावै  है !
  3. रोजी के जुगाड़ की फ़िकर लागी जिनको।
  4. उत्सव उमंग उन्हें क्या खाक हुलसावै है?
  5. ख़ुशी मौज मस्ती चंद अमीरों की मुठ्ठियों में ,
  6. अडानी अंबानी  घर लक्ष्मी धन बरसावै है।
  7. कहाँ पै जलाएं,दिये अनिकेत अनगिन ,
  8. हिस्से में जिनको सिर्फ अमावश ही आवै है?
  9. श्रीराम तिवारी

बुधवार, 20 सितंबर 2017

शब्द शक्ति आराधना !

     {१}
तीज त्यौहार के दिनों मैं माता ,निर्धन जन कुछ समझ न पाता।
महँगा ईंधन सब्जी दुर्लभ आटा,शासक को कुछ समझ न आता ।।
दाल तेल चावल शक़्कर में मंत्री अफसर ,जनता का दुःख दाई है।
मेहनतकश जनता पै भारी माता ,यह सिस्टम साला हरजाई है।।
भूँख  कुपोषण लाचारी में माँ ,दिन भी होते हैं कुछ लम्बे लम्बे।
संघर्षों की ज्योति जले माँ ,जय जय अम्बे जय जगदम्बे।।

 [२]
मंत्री नेता अफसर बाबू ,इनपर नहीं किसी का काबू।
भले बुढ़ापा आ जाए पर,इनकी तृष्णा कभी न जाबू।।
नित नित नए चुनावी फंडे,बदल बदलकर झंडे डंडे।
राजनीती हरजाई इतनी, कि नहीं देखती संडे मंडे।।
अंधे पीसें कुत्ते खायें ,ये रीति सदा से चलि आई है।
कोटि कोटि जनता पै भारी, शासक की बरियाई है।।
भारत की धरती पर अम्बे ,जाति धर्म के हाथ हैं लम्बे ।
संघर्षों की ज्योति जले माँ ,जय जय अंबे जयजगदम्बे।।

===+======+=====
   [३]
महँगी  बिजली महँगा पानी ,खाद बीज की आनाकानी।
नहीं ठिकाना कृषि किसानका,भौंचक हैं सब ज्ञानी ध्यानी।।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों में जमकर, नफरत उनने फैलाई है।
गांव शहर और गली गली में.साम्प्रदायिकता ही छाई हैा।।
घोर बबाल है गौ हत्या का,धर्मांध भीड़ की कारस्तानी।
त्यौहारों पर होती अक्सर ,मजहब धरम की खींचातानी।।
वोट की खातिर अहम की शातिर खुद ही कराते नेता दंगे।
संघर्षों की ज्योति जले माँ जय जय अम्बे जय जगदम्बे।।



              श्रीराम तिवारी
 




शनिवार, 16 सितंबर 2017

जुदाई गीत -श्रीराम तिवारी

  1. जरा दिल को तसल्ली दो,आरत सुनो मेरी।
    रोको रवानी को,तुम्हें जल्दी भी क्या ऐंसी।।
    लगी दिल की बुझालें हम, तबतुम चले जाना।
    गम अपना सुना दें हम ,तब तुम चले जाना।।
  2. ...
  3. अरे चोट दिल में लगी, तुमसे बिछुड़ने की।
    एक सूरत बसी दिल में,हरदम सलोनी सी।।
    प्रीत अनमोल कैसी है,ए हमने अब जाना।
    गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।।
  4. इतना ही था मिलन,आई वेला जुदा होने ।
    होश उड़े हैं मेरे ,अंत मेरा खुदा जाने ।।
    मैं जरा होश मैं आऊं ,तब तुम चले जाना।
    गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।।
  5. मन हल्का तो होने दो, हम गम के मारे हैं।
    हमको न भुला देना ,सदा हम तुम्हारे हैं।।
    नफरतों के दौर में ,यारी को निभा जाना।
    गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।।
  6. हमें गम जुदाई का,देकर के तुम चल दिए।
    पलकोंमें बसाकर तुम्हें,वक्त ने छल किये।।
    तुम बिन कैसे जियें, जरा ये तो बता जाना।
    गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।।
  7. ये आदत पुरानी है ,गमें चोट खाने की।
    जबजब जागे नसीब,आये बेला रुलाने की।।
    तुमने पीर पराई को,कुछ देखा सुना जाना।
    गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।।
  8. खूब चाहा तुम्हें हमने, हमको न भुला देना।
    ग़मों को हमारे तुम ,अपना न बना लेना ।।
    दिल का जख्म भर दे, दवा ऐंसी दे जाना।
    गम अपना सुना दें हम तब तुम चले जाना।।
  9. जुदाई गीत -श्रीराम तिवारी (मेरी पुस्तक अनामिका से)

रविवार, 3 सितंबर 2017

सबक नहीं सीखते ठोकरें खाने के बाद।


गोली असर करती है बंदूक से निकल जाने के बाद।
गाली असर करती है जुबाँ से निकल जाने के बाद।।
मेहंदी असर करती है हथेलियों से पिस जाने के बाद।
चंदन खुसबू देता है पत्थर पै खूब पिस जाने के बाद।।
संत होने का ढोंग करता है पाखंडी जेल जाने के बाद।
फ़ना हो जाता इंसान भ्रस्ट मंत्री अफसर होने के बाद।।
छाछ भी फूँककर पीते हैं गर्म दूध से जल जानेके बाद।
किन्तु मूर्खजन सबक नहीं सीखते ठोकरें खाने के बाद।।
लोग उन्हें ही क्यों चुनते हैं जो ठगते हैं चुने जाने के बाद।
आदमी आदमी का शोषण करता आदमी होने के बाद।।

 श्रीराम तिवारी

शनिवार, 2 सितंबर 2017

बच नहीं पाओगे !

  1. हंसोगे अगर तो हँसेगी साथ दुनिया
    रोओगे तो रहोगे निपट अकेले मनमार!
    खुशी है ऐसी शै जो हम ढूंढते हैं बाहर ,
    और गमों के भर रखें हैं भीतर भण्डार!
  2. ठहाका लगाओ तो आसमां गूँज उठेगा ,
    आह भरो तो पाओगे हर शख्स मौन है !
    हर्ष उल्लासों की प्रतिध्वनियां मन पसंद,
    मौन-मंद सिसकी तुम्हारी सुनता कौन है ?
  3. खुशियां अगर बांटो तो लोग आएंगे तेरे दर,
    दिखाओगे अपने गम, तो सब भाग जायेंगे !
    हिस्सा आपके सुख में सभी बंटाना चाहेंगे ,
    चाहते हुये भी दूसरे दु:ख नहीं बांट पायेंगे !
  4. सुखके दिनों में तो सब ही बन जाते मीत ,
    दुःख में कोई साथ दे ढूँडते रह जाओगे !
    जब तक है मौज खैरियत पूंछते रहेंगे सब,
    गर्दिश में ईद के चाँद देखते रह जाओगे !
  5. यदि तुम कभी दावत दोगे तो भीड़ जुटेगी,
    किंतु फाकें में साथ देनें कोई नही आ्येगा !
    ज़िन्दगी में सब साथ देंगे,अगर सफल रहो,
    मरते हुये किसी के कोई काम नहीं आयेगा !
  1. श्रीराम तिवारी


मंगलवार, 22 अगस्त 2017

गुल अपने खिलाये हुए हैं!


लम्बी लम्बी उड़ानों के हंस,क्रांतिपथ को सजा्ये हुए हैं।
छोड़ यादों का वो कारवां, आज ही होश आये हुए हैं ।।
साथी मिलते गये नए नए ,कुछ अपने भी पराये हुए हैं ।
फलसफा पेश है पुरनज़र को,लक्षय पै ही टिकाये हुए हैं ।।
प्राप्त आनन्द है इस फिजामें,मेघ नभ में भी छाये हुए हैं।
युग युग से जो प्यासे रहे वो ,क्षीर सिंधु में नहाये हुए हैं।।
अपनी चाहत के सब रंग बदरंग,खुद अपने सजाये हुए हैं।
औरों की खता कुछ नहीं है,गुल अपने ही खिलाये हुए हैं।।
जन्मों जन्मों किये धतकरम सब ,क़र्ज़ उसका चढ़ाए हुए हैं।
जख्म जितने भी हैं जिंदगी के, मर्ज़ अपने ही कमाए हुए हैं।।
खुद ही भूले हैं अपने ठिकाने,दोष गैरों पै ही लगाए हुए हैं।
वक्तने हमको ऐंसा कुछ मारा,कि नींद अपनी उड़ाए हुए हैं।।

श्रीराम तिवारी


अपना बाजिब हक चाहता हूँ।

  1. मेहनतकश सर्वहारा किसान मजदूर हूँ मैं,
    हर खासोआम से कुछ कहना चाहता हूँ !
    सदियों से सबकी सुन रहा हूँ मैं खामोश,
    अब पूरी शिद्द्त से कुछ कहना चाहता हूँ!
    वेद पुराण गीता बाइबिल कुरआन जेंदावेस्ता,
    धर्मशास्त्रों के बरक्स कुछ कहना चाहता हूँ!
    ईश्वर अवतारों पीरों पैगंबरों संतों महात्माओं,
    बाबाओं के इतर कुछ और कहना चाहता हूँ!
    समाज सुधारक नहीं हुँ, क्रांतिवीर भी नहीं मैं,
    मनुष्य हूँ सो पूंछ सकते हो कि क्या चाहता हूँ?
    न तख्तो ताज चाहिए ,न जन्नत न स्वर्ग मोक्ष,
    सब्ज बाग छोड़ , वर्तमान को जीना चाहता हूँ ।
    युगो युगों से जो बात बिसारते रहे हैं विद्वतजन,
    वो बात आज सर्मायेदारों से कहना चाहता हूँ।।
    मैं अपने हिस्से की धरती,हवा,पानी,आसमान ,
    सूरज,चाँद,तारों में अपना बाजिब हक चाहता हूँ।
    विराट अस्तित्व में मौजूद अपार सम्पदा के हरएक,
  2. कण पर प्राणीमात्र का बराबर अधिकार चाहता हूँ। 
  3. Shriram Tiwari

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

नई सुबह जरूर आएगी ।


हरएक स्याह रात के बाद ,नयी सुबह आती है।
तलाश है ज़िसकी मुझे वो मौसमे बहार आती है ।।
निहित स्वार्थ से ऊपर उठा यत्किंचित कोई कभी,
तभी धरती पर जिंदगी खुद ब खुद मुस्कराती है।
समष्टि चेतना को देकर नाम रूहानी इबादत जैसा ,
शुभ संवेदनाओं की बगिया महकने लग जाती है ।।  
तान सुरीली हो और कदमताल सधे हों जिंदगी के ,
बज उठेंगे वाद्यवृन्द व्योम में भोर खिलखिलाती है !!
हर एक स्याह रात के बाद,नयी सुबह आती है   !,,,,
Shriram Tiwari


गुरुवार, 17 अगस्त 2017

लुटिया डूबी अर्थतंत्र की,मुल्क फँसा हैरानी में !

 माल गपागप खा गए चोटटे,कसर नहीं हैवानी में।

 मंद मंद मुस्काए हुक्मराँ, गई भैंस जब पानी में।।

 सुरा सुंदरी पाए सब कुछ ,सत्ता की गुड़ धानी में।

 जनगण मन को मूर्ख बनाते,शासक गण आसानी में।।

 लोकतंत्र के चारों खम्बे, पथ विचलित नादानी में।

 लुटिया डूबी अर्थतंत्र की,मुल्क फँसा हैरानी में।।

 व्यथित किसान छीजते रहते,क़र्ज़ की खींचातानी में।

 कारपोरेट पूँजी की जय जय,होती ऐंचकतानी में।।

 निर्धन निबल लड़ें आपस में,जाति धर्म की घानी में।

 सिस्टम अविरल जुटा हुआ है,काली कारस्तानी में।।

 बलिदानों की गाथा हमने, पढ़ी थी खूब जवानी में।

 संघर्षों की सही दिशा है ,भगतसिंह की वाणी में।।

  श्रीराम तिवारी




शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

हम उसको अवाम के पक्ष में नहीं समझते।

जिंदगी के कुछ काम दुआओं के भरोसे नहीं चलते।
बैटरी चार्ज न हो तो मोबाईल कम्प्यूटर नहीं चलते।।
लिखने के लिए और भी गम हैं जिंदगी के ज़माने में ,
इसलिए हम कसमें वादे प्यार बफा पर नहीं लिखते !!
बड़े पद जातीय सियासत से सुर्खुरू हो रहे इन दिनों , ...
हम इसको लोकतन्त्र के हित में कदापि नही समझते !!
जाने क्यों प्रतिस्परधी दौड़ में उतावला है हर शख्स,
खुशनसीब हैं वे जो इस पचडे में ज़रा भी नहीं फसते !!


:-Shriram Tiwari

बुधवार, 5 जुलाई 2017

नंगे भूंखे को तो -सारा जहाँ हमारा है !


स्वतंत्रता के भीषण रण में ,सपने देख लड़ी आवाम।
आजादी के बाद मिलेगा ,सबको शिक्षा सबको काम।।

 काम के होंगे निश्चित घंटे ,और मेहनत के पूरे दाम।
 आजादी के बरसों बाद भी,मुल्क हुआ सबमें नाकाम।।

  जिन्दा रहने की फितरत में ,जन फिरता मारा मारा है।
  मदहोश शासकों का कुनबा ,अब लूट रहा धन सारा है।।

   कैसा राष्ट्र क्या वतन परस्ती,जब लोकतंत्र बेचारा है।
   नंगे भूंखे इंसानों का तो ,यह सारा जहाँ 'हमारा' है।।

   ======++++++=====

   धूल धुआाँ धुंध से भरा यह, राष्ट्र आँसुओं से गीला है।
   निर्धन ग्रामीणों को देखो, गौर से हरेक चेहरा पीला है।।

   बड़े बड़े नगरों को देखो भौतिक विकास का मारा है।
   भटक रही तरुणाई यहाँ फिर भी सत्ता की पौबारा है।।

  आजादी के दीवानों ने ,तब क्रांति ज्योति जलाई थी। 
  प्रजातंत्र -समाजवाद होगा, कुछ ऐंसी आस जगाई थी।।

   जात पांत भाषा मज़हब की ,सब कटटरता ठुकराई थी।
   आज़ादी के बाद अमन की ,उन सबने राह दिखाई थी।।

   अब भूँखे को रोटी मिल जाए, तो ये वतन हमारा है ।
   वर्ना नंगे भूँखे इंसानों को,यह सारा जहाँ हमारा है।।
 
  ++++++======+=======+++=

आन बान सम्मान देश का प्रतिपल होता क्षरण देश का।
सत्ता में जो डटे  हुए हैं , उन्हें नहीं भय नाम लेश का।।
कारपोरेट कल्चर का मिक्चर, सुपरमुनाफे के निवेश का।
सार्वजनिक उपक्रम को खाकर ,निजीक्षेत्र है भ्र्ष्ट देश का।।
बहुराष्ट्रीय निगमों ने फिर से, भारत जन को ललकारा है।
सुख चैन अमन साझा सबका हो, सच्चा वतन हमारा है।।
वर्ना नंगे भूँखे को कैसा वतन,कहेगा सारा जहाँ हमारा है।
  
  
  


बुधवार, 21 जून 2017

क्यों फूलों को खार बनाने पर आमादा हैं !

वो जो भारत के खिलाफ हथियार उठाने वाली है ।
वो जो कश्मीरी युवतियों को भड़काने वाली है ।।
वो वतनपरस्त नहीं अबला दुख्तराने हिन्द भी नहीं,
वो गद्दार पाकिस्तानी जनरलों की बदनाम साली है ।

जो शख्स अपने मजहब को देश से ऊपर रखता है।
जो सत्ता में होकर एक खास धर्म से रिस्ता रखता है।।
जो लोकतंत्र धर्मनिर्पेक्षता समाजवाद से बैर रखता है,
वो देशभक्त नहीं, शूरमा नहीं, शिखंडी सा लगता है।

क्यों लोग निरंतर फूलों को खार बनाने पर आमादा हैं !
क्यों किशोर -युवाओं को अंगार बनाने पर आमादा हैं!!
क्यों खेतों खलिहानों की पावन महकती सौंधी मिट्टी को,
धर्म जात मजहब की दरो दीवार बनाने पर आमादा हैं!

श्रीराम तिवारी




गुरुवार, 15 जून 2017

गाज गिरती है सिर्फ कमजोर दरख्तों पर !

मायिक बंधन से जीव देह इक आती इक जाती है।
काल वहीँ ठहरा है सिर्फ अंधी राह गुजर जाती है।।
दृश्य जगत की सुबह हो या शाम, ख़ुशी हो या गम ,
उत्थान हो या पतन, जिंदगी यों ही गुजर जाती है।
भोगियों ,योगियों, रोगियों, देहधारियों, की तमाम,
रूहानी ताकत भौतिक माँग पूर्ति में गुजर जाती है।
वेशक होगा कोइ सर्वशक्तिमान,सर्वज्ञ सनातन सर्वत्र,  
किन्तु कभी कभी उससे भी बड़ी चूक हो जाती है।
कमजोरों पर शक्तिशाली का वर्चस्व कैसा कर्मफल ?
जब न्याय तुला उसकी बलवान के पक्षमें झुक जाती है।

हैं अनंत ब्रह्माण्ड में अनंत नीहारिकाएँ,नक्षत्र,सूर्य चंद्र ,
हरेक निर्बल वस्तु शक्तिशाली का प्रभुत्व सहती जाती है।
कोई ईश्वर नहीं कहता कि निर्बल का शोषण- दमन करो ,
जिसने सब जग सृजा दुनिया उसके वन्दों को क्यों सताती है।

हर युग में वह अनंत असीम अपने उत्कृष्ट चाहने वालों के
ध्यानमें आकर आकर कहता है ,मुझे तुम्हारी याद आती है ।

गाज गिरती है केवल कोमल दरख्तों- कमजोर झोपडों पर,
शस्य स्यामल धरा की दुर्दशा देख सुनामी भी मुस्कराती है!

श्रीराम तिवारी
 

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017


'सारे जहाँ से अच्छा ,हिन्दोस्ताँ हमारा ........' लिखने वाले अल्लामा मोहम्मद इकवाल साहब की पुण्य तिथि पर उनका हार्दिक अभिवादन!वेशक पाकिस्तान बनने पर ,वे भारत छोड़ गए! किन्तु उनकी धर्मनिरपेक्ष शायरी हमेशा 'हिंदी हैं हम वतन हैं हम और हिन्दोस्ताँ हमारा' का पैगाम युगों-युगों तक देती रहेगी !
ज्वालन  के जाल बिकराल बरषत है।

तचति धरनि जग जरति झरनि  सीरी ,

छाँह को पकरि पंथी पंछी बिलमत है।

'सेनापति' नेक दुपहरी के ढरत होत ,

घमका विषम ज्यों न पात खरकत है।

मोरे जान पौन सीरी ठौरको पकरि कोनों ,

घरी एक बैठ कहूं घामहु  वितवत है।

[ ग्रीष्म ऋतु का इससे बेहतर काव्यात्मक वर्णन मैं नहीं कर सकता, इसलिए 'सेनापति'के कवित्त को उद्धृत कर रहा हूँ,ग्रीष्म ऋतु में कवित्त का आनंद लेवें

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

नित नई कठिन चुनौतियां,मुल्क हुआ हैरान।

लाल बत्ती बन्द भइ , नेता भये अधीर।
पद प्रतिष्ठा अहम बिन,पिद्दा हुए वजीर।।
         
सत्ता मृग मारीचिका,जाने सकल जहान। 
दंड कमंडल छोड़कर,योगी हुए महान।।

मोदीजी के मन बसी ,केवल एक ही बात।
कैशलेस सबको करो,मारो बैंक को लात।।

नित नई कठिन चुनौतियां,मुल्क हुआ हैरान।
महंगाई आतंक का , हुआ न कोई निदान ।

पुलिस दमन शोषण घुटन,भॄस्ट तंत्र नाकाम।
मूल्यहीनता चरम पर,भ्रमित सकल आवाम।।

राजनीति ने पी रखा ,जातिवाद का जाम।
धर्मनिपेक्षता यों हुई ,ज्यों मुन्नी बदनाम।।

जोशी अडवानी चिंतित ,सुश्री उमा अधीर ।
मस्जिद मंदिर विषय में, हुआ कोर्ट गंभीर।।

न विचार न नीति कोई ,न विकास के काम।
सेना को अपमानित करें ,पत्थरबाज तमाम।

श्रीराम तिवारी



 

श्रीराम तिवारी

बुधवार, 15 मार्च 2017

सत्ता महाठगनी हम जानी

सत्ता महाठगनी हम जानी

कोटिक जतन करे नेता ने छोड़ी कुल की कानी !

लटके झटके जुमले वादे नित नित नई कहानी ! सत्ता महा ठगनी ,,,,,,,,जानी !


 मुफ्त  जहाज  अडानी  देता  चन्दा दे अम्बानी !

 यू पी विजय पाकर बौराये  कर  बैठे  नादानी!

गोवा और मणिपुर में भी हार की  जीत बखानी !  सत्ता महा ठगनी हम जानी ! !

रविवार, 12 मार्च 2017

भाजपा की होली।



माल्याओं मोदियों चौकसियों ने, खेली बैंकों संग ठिठोली ,
सीमाओं पर दुश्मन खेलता रहता, नित्य ही खून की होली।
अमन के फाख्ते कबके उड़ चुके,कश्मीर की वादियों से ,
वतन के नौनिहाल हो रहे शहीद,झेल रहे सीने पर गोली।।
सत्ता के दलाल पूँजीवादी साम्प्रदायिक बकवादी भृष्ट नेता,
होकर सत्ता मद चूर कर रहे हैं जनता के संग हंसी ठिठोली।
नए नए झुनझुने जीएसटी,नोटबंदी और विकास की बोली ,
=श्रीराम तिवारी





शनिवार, 4 मार्च 2017

भोर किसी मुर्गे की बाँग की मुहताज नहीं।

हरेक स्याह रात के बाद नयी सुबह खुद आती है।

चलती का नाम जिंदगी है खुद ही चलती जाती है।।

कोई भी भोर किसी मुर्गे की बाँग की मुहताज नहीं।

जिजीविषा की ताकत  ही  दुनिया  को चलाती है।।

सच कहा किसी ने जरूरत आविष्कार की जननी है।

इसीलिये गधा धूल में और चिड़िया औस में नहाती है।।

======+++++=====

यदि जवानी किसी महान पुरषार्थ सिंधु में नहाती है।

जीवन की साँझ स्वतः खुशनुमा होती चली जाती है।।

कौन कितना जिया यह महत्वपूर्ण नहीं है  लेकिन ,

सार्थक जिंदगी हो  तो कुछ  असर छोड़ जाती है।

पाशविक जगत की रीति है खुद के लिए ही जीना ,

मानवता तो औरों के लिए जीना मरना सिखाती है।

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निर्बलों की हित चिंतक बुध्दि न्याय को पक्षधर बनाती है। 

क्रांतिका विचार हौसला देता है शहादत सुर्खुरू बनाती है।।  

मानव जीवन का फलसफा सिर्फ धर्म-मजहब में नहीं है।

साहित्य कला संगीत के बिना जिंदगी अधूरी रह जाती है।।  

जीवन मूल्य सदा फूलों की भाँति सुवासित होते रहने दो।

मानव जीवन में  खुशियों की बहार खुद चली आती है।।


नभ में छिटके चाँद सितारे सूरज सबके गतिज नियम हैं।

ऐंसे नियम मनुज जीवन में भी हों तो वसन्त ऋतू आती है।।

 श्रीराम तिवारी



श्रीराम तिवारी  

 



रविवार, 26 फ़रवरी 2017

रोटी कपडा और मकान


नेता  बड़बोले नादान , गिना रहे हैं कब्रिस्तान।

कहते हैं यूपी जितवा दो ,बनवा देंगे वे श्मशान।।

मेरा देश है बड़ा महान ,मतदाता बेहद नादान।

सत्ता के दल्लों से मांगे ,रोटी कपडा और मकान।।

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

कोयल गाती तो है।


गुजरी हुई हर रात के बाद,इक नयी सुबह आती तो है।

नेक इंसानके घर आँगनमें पेड़ हो तो गौरैया गाती तो है।।

हर एक तितली जीती है ख़ुशी-ख़ुशी अपनी जिंदगी पूरी ,

जीवन भले हो महज आठ पहर का फिरभी सुहाती तो है।

सुख-दुःख, हानि-लाभ , मानवीय छल-कपट से बेखबर ,

तयशुदा मौसम में कोयल अमुआकी डालीपर गाती तो है।

 आपाधापीयुक्त शहर की अभिजात्य कोठियों में न सही ,

 गाँवकी झोपडी से अभी भी लोरी की आवाज आती तो है।

गौरैया,तितली,कोयल,माँ की लोरी ,नयी सुबह का कलरव,

 अभी भी इंसान को जिंदगी जीने की उमंग जगाती तो है।

  - श्रीराम तिवारी !




गुरुवार, 26 जनवरी 2017

कहें पद्माकर जू,,,!

'बड़ी जीजी' हम सब भाई बहिनों में सबसे बड़ी हैं। उम्रमें वे मुझसे आठ साल बड़ी हैं। विगत २२ दिसम्बर को जब 'आनंदम' के मित्रों ने और सपरिजनों ने मेरा जन्म दिन मनाया और शुभकामनाएँ दीं तब 'बड़ी जीजी ' मेरे पास ही थीं। उन्होंने मुझे बताया कि मेरा जन्म 'बसन्त पंचमी' को हुआ था ! उनकी याददास्त के अनुसार स्कूल में मेरी उम्र एक साल ज्यादा लिखी गई। याने मैं एक साल पहले ही रिटायर हो चूका हूँ। यह जानकर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ !मेरी जन्म तारीख  स्कूल में सही नहीं लिखी गयी या मुझे किसी ने  बताया नहीं तो इसमें मेरी क्या त्रुटि है? हालाँकि हमारे रिटायर जनरल बी'के सिंह [अब केंद्रीय मंत्री] की तरह मुझे कोई कोर्टबाजी नहीं करनी। क्योंकि मैं जानता हूँ कि ५०-६० साल पहले वाले भारत के ठेठ गाँव के सरकारी स्कूल में भी पढाई अच्छी होती थी, और हमारे लिए यही बहुत है। जन्म तारीख इत्यादि का तब खास ध्यान नहीं रखा जाता था।

सभी मित्रों,सुह्र्दयजनों और सपरिजनों को  'बसन्त पंचमी' की शुभकामनाएँ ! इस अवसर पर महाकवि पद्माकर की चार पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं :-  



''कूलनमें केलिमें कछारनमें कुंजनमें, क्यारिनमें कलित कलीन किलकंत है।

द्वार में दिशान में दूनी देश-देशन में ,देख्यों दीप दीपन में  दीपत  दिगंत है।।

कहें पद्माकर जू  परागन में पौन में ,पाकन में पिक में पलाशन पगंत है।

बेलि में बितान में ,बेलन नवेलन में, बनन में बागन में बगरो बसन्त है।। ''

हालाँकि मैं अच्छस तरह जानता हूँ कि इस कड़कड़ाती ठण्ड और धूल धुआँ -धुंध से परेशान लोगों को पद्माकर का रीतिकालीन ' बसन्त सौंदर्य' अथवा बसन्तोत्सव नहीं बल्कि इससे कठिन दौर से शीघ्र निजात चाहिए !


''पद्माकर '' 

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

बिकट संकट गणतंत्रानाम,,,,,!



परपीड़ा ददामि महापुण्यम, श्रमशोषण पापनाशनम !

कालाधन स्वर्गसोपानाम , रिश्वतखोरी मोक्षदायकम  !!


मक्कारी मुफ़्तखोरानाम ,आरक्षण भवभय हारणीम !

 नायक: भवतु खलनायक:,एष : नवभारतस्यलक्षणम !!


 जनानां पीड़ित:महादुष्ट:,संसदीय लोकतंत्र गतरसातलं  !

 जीवनमुक्ति सर्वहारानाम ,पूँजीवादकृत महा पातकम !!

 
   पर सम्पदा हरणम महापुण्यम, दलाली पापनाशनम !

   घटिया सार्वजनिक निर्माणम ,कमीशन मुक्तिदायकम !!


   कृतघ्नता घोरं सरकारी क्षेत्रे,शिक्षा स्वास्थ्य बँटाढारकम !

  आर्थिक पैकेज प्रदत्त निजीक्षेत्रे ,सार्वजनिक क्षेत्र नाशनं !!


   चुनाव प्रक्रिया दोषपूर्णे: नेता जाति वर्ण साम्प्रदायकम !

   महाविकट संकट भारतराष्ट्र गणतन्त्रणाम पतनम गतः !!

 

   श्रीराम तिवारी


  


सरस्वती वंदना -[रचना -श्रीराम तिवारी]

                    [१]
करुणकृन्दन विनयवाणी, हृदय हाहाकार हो।

शारदा  माँ  वीणापाणी, शब्द में साकार हो।।

अरुण मानव का जगा दे ,हीनता संहार दे।

झंझावतों में अचल हो ,वह ज्ञान दीप उजार दे।।

                  [२]


गीत की स्वर  लहरियों में, सत्य  का संधान हो।

जन में हो भ्रातत्व समता, एकता अविराम हो।।

विज्ञानसे  मानव बड़ा हो , विश्व का कल्याण हो।

मस्जिदों में शंख ध्वनियाँ, मंदिरों में अजान हो।।

                  [३]

मूक कम्पित दमित को माँ ,सिंहसी हुँकार दे।

वंचितों की वेदना को , मेदनी ललकार दे।।

 काँटे कुचल दे राह के, पंथ की पहचान हो।

 कठिनाइयों से न डरें ,आँधी या तूफ़ान हो।।

                         [४]

एकता के प्यार के सुर, छंद में सजते रहें।

नित्य नव निर्माण के हम, गीत नव रचते रहें।।

धर्मान्धता अज्ञानता का,बध अहम् का कीजिये।

दिग्भ्रमित इस राष्ट्रका माँ ,दिशि निर्देशन कीजिये।।


                       [५]

तंत्रीनाद कवित्त रस में ,विषमता धो दीजिये।

परपीड़न की कामना को ,कालकलवित कीजिये।।

निर्भय सकल जहान हो ,नीति का सम्मान हो।

ज्ञान की गंगा बहे माँ ,पंथ की पहचान हो।


                   [६]

आक्रोश जनका तब तलक,थम न जाए जानले।

कोटि -कोटि निर्धनों के ,आंसुओं को थाम ले।।

गगन - भेदी  भुवन - भेदी ,लक्ष्यभेदी   तान  दे।

शैतान का गढ़ ध्वस्त हो ,माता यही वरदान दे।।


                 [७]

कबीर नानक रहीम जैसी ,सृजना को दीजिये।

भुवनमोहन तानसेनी ,तान की लय दीजिये।।

रामायण के रचियता सा ,शिल्प का सामान हो।

 शबद साखी सुखमनी के ,सत्य का संधान हो।।

                [८]

स्वाधीनता समता जगे माँ ,बंधुता का मान हो।

 उसको बना दे माँ देवी ,जो ह्रदय पाषाण हो।।

मानवता के ग्रहण छूटें ,उत्पीड़न उन्माद के।

पिल्लर धराशायी करो माँ ,पापी पूँजीवाद के।।


            [९]

भारत में भ्रातत्व भाव की, भावना भर दीजिये।

मेहनतकशों में इंकलाबी ,गर्जना भर दीजिये।।

ज्ञानकी ज्योति जलाओ  ,जन तमस हर लीजिये।

जगके सब आतंकियोंमें ,इंसानियत भर दीजिये ।।


                                [१०]

कंठ में मानिंद शिव की, नित हलाहल पान हो।

कल्प कल्पान्तर कवि की, वेदना का ज्ञान हो।।

बलिदान की सम्भावना को, सतत सम्बल दीजिये।

जयति वाणी भारती माँ , पतित पावन कीजिये।।


  श्रीराम तिवारी








शनिवार, 21 जनवरी 2017

भारतीय सभ्यता -संस्कृति का सफरनामा [Rachana - by shriram tiwari]



  पाषाण युगीन बर्बर कबीलाई समाजों के,

 आदिम साम्यवादी स्वरूप का उदयगान ।

  सिंधु घाटी सभ्यता का प्राकृतिक विध्वंश , 

  मध्य एशियाई विस्थापितों का महाप्रयाण ।।

  भारोपीय सभ्यता संस्कृति का बीजांकुरण,

  आर्य द्रविड़ पार्वत्य जनजातिय सहउत्थान ।

  पूर्व वैदिक कालीन सभ्यता का उषाकाल ,

  आर्यसभ्यता का उत्कर्ष ऋक यजु समष्टिगान  ।।


 धनवंतरी च्यवन चरक-सुश्रुत कृत आयुर्वेद ,

 ऋषभदेव का असि -मसि-कृषि विकासगान ।

 
  शुक्राचार्य  शिवि दधीच मारीचि वैश्रवण भृगु,

  अंगिरा वशिष्ठ व्यास मनु अगस्त कण्व विद्वान ।


  आरण्यक उपनिषद दर्शन स्मृति वेदांतनामा ।

  उत्तरवैदिक सभ्यता के उत्कृष्ट अकाट्य प्रमाण ,



  सतपथ,गोपथ ,एतरेय,तैतरीय ईश  तथ्यान्वेषण,

  कार्य-कारण सिद्दांत और  ब्रह्म सूत्र अनुसन्धान।।


  सोSहम-अहंब्रह्मास्मि-'सत्यमेव जयते' उद्घोष ,

 'कृण्वन्तो  विश्वम आर्यम' ब्रह्मांड व्यापी सामगान ।
 

  कार्य-कारण  सिद्धांत विभिन्न भाष्य  दर्शन सूक्त ,

 'उदार चरितानाम  तु वसुधैव कुटुम्बकम का गान ।।


   देव दानव संघर्ष  द्वंद पुरुष-प्रकृति अंतर्द्वंद अध्यात्म,

   ज्ञान विज्ञानमय वाङ्ग्मय  मिथ-पुराण देवासुर संग्राम


   मार्क्स का द्वंदात्मक सिद्धांत बनाम सनातन धर्म सिद्धांत ,

  समुद्रमत्स्य कच्छप ,अर्द्धथल बाराह,थल वामनउपनाम ।


 आदिम युगीन हिंसक पशुतुल्य अर्धमानवतुल्य उग्र क्रोधी

  नरसिंह अवतार और प्रतिशोध के लिए परशुरामअवतार।।


  रामायणकालीन उन्नत मानव  रघुवंश सदृश्य नीति निर्धारक,

  धीरोदात्त चरित्र  संस्थापन मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम अवतार।


   सूर्यवंश,चन्द्रवंश, यदु-जदू-कुरु -पुरुवंश गल्प श्रुति आख्यान ,

   महाभारत कुरुक्षेत्र गीता -ज्ञान -कर्म सांख्ययोग श्रीकृष्णावतार।।



 शापित परीक्षित निधन - जनमेजय का प्रतिशोध नागयज्ञ , 

 निष्ठुर नियति  निर्मम संक्रांतिकालीन सत्ता विध्वंश अपार ।।



पुरातन क्षत्रियकुल रीति-नीति विलुप्त घोर अनैतिकता

मनुस्मृति सृजन ,नवीन आचार संहिता सृजन लोकाचार ।


भारत  'बुद्धम शरणं गच्छामि'दिग्भर्मित जन- अकर्मण्यता,

महावीर का अहिंसा अनेकान्तवाद स्याद्वाद अपरम्पार ।।


मगध नन्दवंश का अमानवीय कदाचरण, प्रमाद- विलासिता ,

चंद्रगुप्त -चाणक्य का त्याग -तपस्या, राष्ट्र नव- निर्माणनामा।   

इंडो -यूनानी सभ्यताओं का संगम, मेगास्थनीज इंडस सृजन  ,

चन्द्रगुप्त मौर्यका फिलिप्स -सेल्युकस पर महाविजयनामा।।



 रक्तपिपासु चण्ड अशोक का 'बुद्धम शरणम गच्छामि' होना ,

 कलिंगविजय ,भिख्खु -धम्मचक्र प्रवर्तन ,वैश्विक प्रचारनामा। 

 तथागत सन्देश बौद्धदर्शन-संघवाद भिख्खुवाद पथ विचलन , 

बौद्धकालीन स्तूप आलेख साक्षी, द्वंद  हीनयान-महायान नामा।।    

 गुप्तकालीन क्षत्रिय राजवंशों का उदय-ब्राह्मणोचित अवदान,

 विष्णुगुप्त -स्कंदगुप्त -चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य  शौर्यादित्यनामा।

 धर्म-दर्शन,मत -पन्थ पाखण्ड प्रेरित अनाचार व्यभिचार अत्याचार   ,

 आदिशंकराचार्य की हुंकार दिग्विजय अद्वैत दर्शन वेदांतनामा।।

 


शक हूण कुषाण तोरमाण यवन नवागन्तुक यायावर कबीले ,

भारतीय 'सनातन संस्कृति' का सर्वस्वीकारोक्ति सिद्धांतनामा। 

पारसी यहूदी  ईसाई यूनानी, अरबी मजहबों का 'हिन्द'आगमन ,

आर्यावर्त भारतवर्ष जम्बूदीप भरतखंडको मिला 'हिन्दुस्ताननामा।।

भारतीय जनता की 'अतिथि देवोभव' स्नेहिल  शरणागत वत्सलता ,

जैन-बौद्ध दर्शन प्रणीत 'अहिंसा परमोधर्म' का उदारचरितनामा।

देशी सामन्तों का विलासितापूर्ण जीवन ,पौरूष विहीन अहंकार ,

और क्रूर कपटी- विदेशी भूँखे भेड़ियों का जघन्य  प्रति घातनामा।।

कासिम, गजनवी, गौरीका रक्त पिपासु बहशी विध्वंशकअभियान  ,

 जयचन्द की गद्दारी व पृथ्वीराज चौहान का गौरी -परोपकारनामा।

  यवन अरब गुलाम ऐबक खिलजी  तुगलक तुर्क हब्शी तथा उजबेग  ,

  खण्ड-खण्ड बिखरे हुए भारत पर बर्बर कबीलोंका हमलावरनामा।।


  कज्जाक, अफगान,लोधी ,मुगल-पठान ,मंगोल -तातार,पिंडारी ,

  लूटते रहे भारतका धन ,नारियोंकी अस्मत, लगाया जजियानामा।

  बनाये जिन भारतीय मजदूरों ने किले ,इमारतें, मजारें और महल ,

  काट दिए गए उनके हाथ ,इतिहास का कडुवा सच कबूलनामा।।

  दमिश्क,बग़दादमें औकात नहीं थी जिनकी खानसामा बननेकी भी  ,

   छल से बन गए दिल्लीश्वर भारत की छातीपर लिख गए बाबरनामा।


  दुर्दांत  बाबर के वंशज भारतकी छाती पर हिन्दू 'काफिरों'के लहु से

 लिखते चले गए हुमायूँ नामा-अकबरनामा और जहांगीरनामा।।

  अय्यास मुगलों ने ही दिया पट्टा लुटेरे पुर्तगालियों डचों अंग्रेजों को,

  जिसकी बदौलत ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने लिख दिया तिजारतनामा।।

  १८५७ के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में हिन्दू -मुस्लिम एक हो गए तो ,

  'डिवाइडेड एन्ड रूल्स ' से बाँटा गया,लागू हुआ विक्टोरिया नामा।

 


 

  बंग-भंग नामा,नरसंहार- जलियाँवालाबाग़ नामा ,

  कांग्रेस ,गाँधी,,नेहरू,पटेल, मौलानाआजाद नामा,

  सुभाष ,भगतसिंह, राजगुरु,सुखदेव,आजाद नामा ,

  ब्रिटिश गवर्नमेंट ,माउन्टवेटन- जिन्ना  इकरारनामा,

   एक ही धरती पर तीन-चार देश क्रूर विभाजन नामा,

   साम्प्रदायिक  तत्वों द्वारा अमानवीय कत्लेआम नामा,

   गांधी को गोली मारकर लिखा नाथूराम ने गोडसेनामा ,

   आधी-अधूरी आजादी और पँ नेहरू का नेतत्व नामा ,
 
    बाबा साहिब - संविधान सम्पादन  भारत गणतंत्र नामा ,

    इंदिराजी का राष्ट्रीयकरण,श्वेतक्रांति हरित क्रांति नामा ,

    बांग्लादेश निर्माण ,पोखरण विस्फोट आपातकाल नामा ,

    राजीव गाँधी का आधुनिकीकरण कम्प्यूटरीकरण  बोफोर्स नामा

गुरुवार, 5 जनवरी 2017

भर्राशाही मची है भाई


रघुकुल रीति सदा चलि आई,

 राजनीती दुष्टों को भायी,

भले श्री राम गए वनराई ,

भरत भाई ने प्रीत निभाई ,

उसी भरत के भारत में अब ,

भाई-भाई में कटुता आई ,

जीत चुनाव वोट की खातिर , 

भाई की हत्या करवाई ,


देशभक्ति  दल वाले भाई ,

आईएस की जूँठन खाई ,

 हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई,

 संग-संग छाने दूध मलाई।

खा पीकर  सब गर्रा गए जब ,

विरोधियों की करें कुटाई,


लगा तुषार फसल को भाई ,

निर्धन किसान पै विपदाआई।

बागड़  खेत चरत है भाई   ,

कैसे दुर्दिन आये भाई  ।


जात पाँत मजहब के बूते ,

लोकतंत्र की  रस्म निभाई।

वे कहते अच्छे दिन आए ,

मजा मौज में लोग लुगाई ,

खबर पढ़ी अखवार में भाई ,

एक बृद्ध देह चूहों ने खाई,

कोई किसी का नहीं है भाई ,

झूँठी आस दिलासा भाई ,

भर्राशाही मची है भाई    ,

जनहित सुध सबने बिसराई !


श्रीराम तिवारी