ज्वालन के जाल बिकराल बरषत है।
तचति धरनि जग जरति झरनि सीरी ,
छाँह को पकरि पंथी पंछी बिलमत है।
'सेनापति' नेक दुपहरी के ढरत होत ,
घमका विषम ज्यों न पात खरकत है।
मोरे जान पौन सीरी ठौरको पकरि कोनों ,
घरी एक बैठ कहूं घामहु वितवत है।
[ ग्रीष्म ऋतु का इससे बेहतर काव्यात्मक वर्णन मैं नहीं कर सकता, इसलिए 'सेनापति'के कवित्त को उद्धृत कर रहा हूँ,ग्रीष्म ऋतु में कवित्त का आनंद लेवें
तचति धरनि जग जरति झरनि सीरी ,
छाँह को पकरि पंथी पंछी बिलमत है।
'सेनापति' नेक दुपहरी के ढरत होत ,
घमका विषम ज्यों न पात खरकत है।
मोरे जान पौन सीरी ठौरको पकरि कोनों ,
घरी एक बैठ कहूं घामहु वितवत है।
[ ग्रीष्म ऋतु का इससे बेहतर काव्यात्मक वर्णन मैं नहीं कर सकता, इसलिए 'सेनापति'के कवित्त को उद्धृत कर रहा हूँ,ग्रीष्म ऋतु में कवित्त का आनंद लेवें

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