गुजरी हुई हर रात के बाद,इक नयी सुबह आती तो है।
नेक इंसानके घर आँगनमें पेड़ हो तो गौरैया गाती तो है।।
हर एक तितली जीती है ख़ुशी-ख़ुशी अपनी जिंदगी पूरी ,
जीवन भले हो महज आठ पहर का फिरभी सुहाती तो है।
सुख-दुःख, हानि-लाभ , मानवीय छल-कपट से बेखबर ,
तयशुदा मौसम में कोयल अमुआकी डालीपर गाती तो है।
आपाधापीयुक्त शहर की अभिजात्य कोठियों में न सही ,
गाँवकी झोपडी से अभी भी लोरी की आवाज आती तो है।
गौरैया,तितली,कोयल,माँ की लोरी ,नयी सुबह का कलरव,
अभी भी इंसान को जिंदगी जीने की उमंग जगाती तो है।
- श्रीराम तिवारी !

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