शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

कोयल गाती तो है।


गुजरी हुई हर रात के बाद,इक नयी सुबह आती तो है।

नेक इंसानके घर आँगनमें पेड़ हो तो गौरैया गाती तो है।।

हर एक तितली जीती है ख़ुशी-ख़ुशी अपनी जिंदगी पूरी ,

जीवन भले हो महज आठ पहर का फिरभी सुहाती तो है।

सुख-दुःख, हानि-लाभ , मानवीय छल-कपट से बेखबर ,

तयशुदा मौसम में कोयल अमुआकी डालीपर गाती तो है।

 आपाधापीयुक्त शहर की अभिजात्य कोठियों में न सही ,

 गाँवकी झोपडी से अभी भी लोरी की आवाज आती तो है।

गौरैया,तितली,कोयल,माँ की लोरी ,नयी सुबह का कलरव,

 अभी भी इंसान को जिंदगी जीने की उमंग जगाती तो है।

  - श्रीराम तिवारी !




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