[१]
करुणकृन्दन विनयवाणी, हृदय हाहाकार हो।
शारदा माँ वीणापाणी, शब्द में साकार हो।।
अरुण मानव का जगा दे ,हीनता संहार दे।
झंझावतों में अचल हो ,वह ज्ञान दीप उजार दे।।
[२]
गीत की स्वर लहरियों में, सत्य का संधान हो।
जन में हो भ्रातत्व समता, एकता अविराम हो।।
विज्ञानसे मानव बड़ा हो , विश्व का कल्याण हो।
मस्जिदों में शंख ध्वनियाँ, मंदिरों में अजान हो।।
[३]
मूक कम्पित दमित को माँ ,सिंहसी हुँकार दे।
वंचितों की वेदना को , मेदनी ललकार दे।।
काँटे कुचल दे राह के, पंथ की पहचान हो।
कठिनाइयों से न डरें ,आँधी या तूफ़ान हो।।
[४]
एकता के प्यार के सुर, छंद में सजते रहें।
नित्य नव निर्माण के हम, गीत नव रचते रहें।।
धर्मान्धता अज्ञानता का,बध अहम् का कीजिये।
दिग्भ्रमित इस राष्ट्रका माँ ,दिशि निर्देशन कीजिये।।
[५]
तंत्रीनाद कवित्त रस में ,विषमता धो दीजिये।
परपीड़न की कामना को ,कालकलवित कीजिये।।
निर्भय सकल जहान हो ,नीति का सम्मान हो।
ज्ञान की गंगा बहे माँ ,पंथ की पहचान हो।
[६]
आक्रोश जनका तब तलक,थम न जाए जानले।
कोटि -कोटि निर्धनों के ,आंसुओं को थाम ले।।
गगन - भेदी भुवन - भेदी ,लक्ष्यभेदी तान दे।
शैतान का गढ़ ध्वस्त हो ,माता यही वरदान दे।।
[७]
कबीर नानक रहीम जैसी ,सृजना को दीजिये।
भुवनमोहन तानसेनी ,तान की लय दीजिये।।
रामायण के रचियता सा ,शिल्प का सामान हो।
शबद साखी सुखमनी के ,सत्य का संधान हो।।
[८]
स्वाधीनता समता जगे माँ ,बंधुता का मान हो।
उसको बना दे माँ देवी ,जो ह्रदय पाषाण हो।।
मानवता के ग्रहण छूटें ,उत्पीड़न उन्माद के।
पिल्लर धराशायी करो माँ ,पापी पूँजीवाद के।।
[९]
भारत में भ्रातत्व भाव की, भावना भर दीजिये।
मेहनतकशों में इंकलाबी ,गर्जना भर दीजिये।।
ज्ञानकी ज्योति जलाओ ,जन तमस हर लीजिये।
जगके सब आतंकियोंमें ,इंसानियत भर दीजिये ।।
[१०]
कंठ में मानिंद शिव की, नित हलाहल पान हो।
कल्प कल्पान्तर कवि की, वेदना का ज्ञान हो।।
बलिदान की सम्भावना को, सतत सम्बल दीजिये।
जयति वाणी भारती माँ , पतित पावन कीजिये।।
श्रीराम तिवारी
करुणकृन्दन विनयवाणी, हृदय हाहाकार हो।
शारदा माँ वीणापाणी, शब्द में साकार हो।।
अरुण मानव का जगा दे ,हीनता संहार दे।
झंझावतों में अचल हो ,वह ज्ञान दीप उजार दे।।
[२]
गीत की स्वर लहरियों में, सत्य का संधान हो।
जन में हो भ्रातत्व समता, एकता अविराम हो।।
विज्ञानसे मानव बड़ा हो , विश्व का कल्याण हो।
मस्जिदों में शंख ध्वनियाँ, मंदिरों में अजान हो।।
[३]
मूक कम्पित दमित को माँ ,सिंहसी हुँकार दे।
वंचितों की वेदना को , मेदनी ललकार दे।।
काँटे कुचल दे राह के, पंथ की पहचान हो।
कठिनाइयों से न डरें ,आँधी या तूफ़ान हो।।
[४]
एकता के प्यार के सुर, छंद में सजते रहें।
नित्य नव निर्माण के हम, गीत नव रचते रहें।।
धर्मान्धता अज्ञानता का,बध अहम् का कीजिये।
दिग्भ्रमित इस राष्ट्रका माँ ,दिशि निर्देशन कीजिये।।
[५]
तंत्रीनाद कवित्त रस में ,विषमता धो दीजिये।
परपीड़न की कामना को ,कालकलवित कीजिये।।
निर्भय सकल जहान हो ,नीति का सम्मान हो।
ज्ञान की गंगा बहे माँ ,पंथ की पहचान हो।
[६]
आक्रोश जनका तब तलक,थम न जाए जानले।
कोटि -कोटि निर्धनों के ,आंसुओं को थाम ले।।
गगन - भेदी भुवन - भेदी ,लक्ष्यभेदी तान दे।
शैतान का गढ़ ध्वस्त हो ,माता यही वरदान दे।।
[७]
कबीर नानक रहीम जैसी ,सृजना को दीजिये।
भुवनमोहन तानसेनी ,तान की लय दीजिये।।
रामायण के रचियता सा ,शिल्प का सामान हो।
शबद साखी सुखमनी के ,सत्य का संधान हो।।
[८]
स्वाधीनता समता जगे माँ ,बंधुता का मान हो।
उसको बना दे माँ देवी ,जो ह्रदय पाषाण हो।।
मानवता के ग्रहण छूटें ,उत्पीड़न उन्माद के।
पिल्लर धराशायी करो माँ ,पापी पूँजीवाद के।।
[९]
भारत में भ्रातत्व भाव की, भावना भर दीजिये।
मेहनतकशों में इंकलाबी ,गर्जना भर दीजिये।।
ज्ञानकी ज्योति जलाओ ,जन तमस हर लीजिये।
जगके सब आतंकियोंमें ,इंसानियत भर दीजिये ।।
[१०]
कंठ में मानिंद शिव की, नित हलाहल पान हो।
कल्प कल्पान्तर कवि की, वेदना का ज्ञान हो।।
बलिदान की सम्भावना को, सतत सम्बल दीजिये।
जयति वाणी भारती माँ , पतित पावन कीजिये।।
श्रीराम तिवारी

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