शनिवार, 4 मार्च 2017

भोर किसी मुर्गे की बाँग की मुहताज नहीं।

हरेक स्याह रात के बाद नयी सुबह खुद आती है।

चलती का नाम जिंदगी है खुद ही चलती जाती है।।

कोई भी भोर किसी मुर्गे की बाँग की मुहताज नहीं।

जिजीविषा की ताकत  ही  दुनिया  को चलाती है।।

सच कहा किसी ने जरूरत आविष्कार की जननी है।

इसीलिये गधा धूल में और चिड़िया औस में नहाती है।।

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यदि जवानी किसी महान पुरषार्थ सिंधु में नहाती है।

जीवन की साँझ स्वतः खुशनुमा होती चली जाती है।।

कौन कितना जिया यह महत्वपूर्ण नहीं है  लेकिन ,

सार्थक जिंदगी हो  तो कुछ  असर छोड़ जाती है।

पाशविक जगत की रीति है खुद के लिए ही जीना ,

मानवता तो औरों के लिए जीना मरना सिखाती है।

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निर्बलों की हित चिंतक बुध्दि न्याय को पक्षधर बनाती है। 

क्रांतिका विचार हौसला देता है शहादत सुर्खुरू बनाती है।।  

मानव जीवन का फलसफा सिर्फ धर्म-मजहब में नहीं है।

साहित्य कला संगीत के बिना जिंदगी अधूरी रह जाती है।।  

जीवन मूल्य सदा फूलों की भाँति सुवासित होते रहने दो।

मानव जीवन में  खुशियों की बहार खुद चली आती है।।


नभ में छिटके चाँद सितारे सूरज सबके गतिज नियम हैं।

ऐंसे नियम मनुज जीवन में भी हों तो वसन्त ऋतू आती है।।

 श्रीराम तिवारी



श्रीराम तिवारी  

 



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