रविवार, 20 नवंबर 2016

अचानक आधी रात के बाद। [poem by shriram tiwari]

मैं जनता हूँ हर कोई कामना पूरी नहीं होती, खुदा से दरख्वास्त के बाद।

फिर भी खुवाहिश है कि 'इंकलाब' आजाये, कभी किसी आधी रात के बाद।।

इस सिस्टम में कराह सुनता हूँ स्वप्न में भी जब, कभी किसी मजलूम की,

 मुठ्ठियाँ  भिंच जातीं हैं ,पैर से ठोकर मारता हूँ ,दीवार को आधी रात के बाद।


कुछ लोग लड़ते हुए कुछ  बिना लड़े ही 'शहीद' हो जाते हैं  सीमाओं पर ,

 राष्ट्र का सनातन शत्रु भी सीमाओं पर घात लगाये बैठा है आधी रात के बाद।

कभी- कभी संसद भंग की गयी अतीत में और स्थिगित किया गया संविधान,

थोप  दिया गया  देश पर जबरन स्याह आपातकाल आधी रात के बाद।

कभी सुनाया गया हुक्म 'नोटबंदी' का याने मौद्रिक सर्जिकल स्ट्राइक का,

देश के नवेले रहनुमाओं ने कर दिया ऎलान अचानक आधी रात के बाद।

जाने क्यों  इस देश की रेलगाडियाँ अभिशप्त हैं और उतर जातीं हैं पटरी से ,

मर जाते हैं एक साथ सैकड़ों नर -नारी आबाल बृद्ध  आधी रात के बाद।

जंगे आजादी का चुटकी भर प्रसाद भी नसीब नहीं हुआ  मेहनतकशों को, 

 जिनके पूर्वजों की कुर्बानियों से मिली थी यह आजादी आधी रात के बाद।

  श्रीराम तिवारी

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

असुरक्षित है आज ,वतन पर छाया संकट।। [Shriram Tiwari]



 अमर शहीदों के ह्रदय ,होगा दुखद मलाल।

 देश की सत्ता में घुसे  ,रिश्वतखोर  दलाल।।

 रिश्वतखोर दलाल ,स्वार्थी  कपटी  लम्पट।

 असुरक्षित है आज ,वतन पर छाया संकट।।

 नागफाँस जातीय ,नस्ल मजहब का जहर।

 पीकर नहीं हो सकता , कोई भी राष्ट्र अमर।।

                  श्रीराम तिवारी

रविवार, 9 अक्टूबर 2016

राजनीति और सत्ता ,जैसे लोकतंत्र की पाहूनी है। [shriram tiwari]


 इस दौर की असली सूरत बेहद डरावनी है।

 भले ही वेशभूषा आकर्षक और लुभावनी है।।


 एटॉमिक हथियारोंके जखीरे यथावत कायम हैं ,

 गौर से देखो लगता है कि सारा जग छावनी है।


 शासन-प्रशासन ,पुलिस -प्रहरी उनके लिए हैं ,

 राजनीति और राज्य सत्ता ,जिनकी पाहूनी है।


 सूचना - संचार क्रांति की असीम अनुकम्पा से,

 गलाकाट स्पर्धा अलगाव का दौर दुखदायनी है।


                   श्रीराम तिवारी


 

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

अँधेरे के खिलाफ लड़ने के लिए,,,!


निर्बल निरीह निर्बोध को निगलने के लिए,

 इन्सानियत के दुश्मन हरदम तैयार रहते हैं ,

 जब मचता है चारों ओर हाहाकार -चीत्कार,

 स्याह रातों में सदा शैतान किरदार रहते हैं ,

जंग जरुरी हो जब काली ताकतों के खिलाफ,

 लड़ने के लिए केवल  'शहीद' तैयार रहते हैं ,

खुदा  ईश्वर  गॉड मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारा ,

ये तो अपनी दुकान चलाने को तैयार रहते हैं।

धर्म-मजहब कभी कमजोरों का साथ नहीं देते ,

ताकतवर लोग ही इसे इश्तेमाल करते रहते हैं।

 अज्ञानता और अँधेरे के खिलाफ लड़ने के लिए,

 दीपक जुगनू चाँद सितारे  सूरज तैयार रहते हैं ,

श्रीराम तिवारी





 

शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

अनमोल त्रयी सूत्र ,,,,,,,![shriram tiwari]


 समय ,मृत्यु और ईश्वर -मानवीय चेतना के मुँहताज हैं ।

 पदार्थ ,चेतना और विचार ये तीनों जगत के सरताज हैं।।


 वक्त मौत और ग्राहक -किसी का इन्तजार नहीं करते।

 कर्ज ,फर्ज और मर्ज -समझदार लोग नहीं भूला करते ।।


 माँ बाप जवानी - जीवन में किसीको दुबारा नहीं मिलते ।  

 कम खाने , गम खाने,  नम जाने से असमय नहीं मरते । 


सोमवार, 29 अगस्त 2016

परिंदे नजर को आसमानी रख।-[gazal by -shriram tiwari]


परिंदे हौसला कायम रख ,उड़ान जारी रख,

हर इक निगाह तुझ पर है ,ध्यान ज्ञानी रख।

बुलंदियाँ  तेरी  हिम्मत  को  आजमाएँगीं,

परों में जान रख, नजर को आसमानी रख।

 परिंदे कई उड़े पहले , भटककर राह भूले ,

 लौटकर आये नहीं, याद उनकी निशानी रख।

 दहक़ता आसमाँ ,बादल घनेरे, अँधेरा घुप्प ,

 कौंधतीं  बिजलियाँ चमकें ,पुरुषत्व पानी रख।

 भेदकर धुंध के उस पार ,विहंगावलोकन कर ,

 सितारों से भी आगे जाना है ,तूँ रवानी रख ।


  श्रीराम तिवारी




रविवार, 28 अगस्त 2016

हम जब कंक्रीट की दीवाल में  कील ठोकते हैं तो पहली बार में कील अक्सर मुड़ जाया करती है। कभी कभी दूसरी बार में  भी सफल नहीं हो पाते। लेकिन तीसरी या चौथी बार कील ठोकने में हम सफल हो जाते हैं।पहली एक-दो कीलों के मुड़ जाने या खराब हो जाने  का मतलब यह नहीं कि वह प्रयास अकारथ गया। हमें हमेशा याद रखना चहिये कि उन्ही पहले वाले प्रयासों के कारण अंतिम प्रयास में सफलता मिला करती है। पहले प्रयास द्वारा बनाई गयी गहराई ही बाद के प्रयासों के सफल परिणाम का कारण बनती है।

इसी तरह भृष्ट सिस्टम अथवा  अनैतिक -अनाचार के पोखरों के खिलाफ किया जाने वाला कोई भी संघर्ष बेकार नहीं जाता। क्योकि सत्य परेशां हो सकता है ,पराजित नहीं। भारत की संघर्षशील जनता द्वारा अंग्रेजों को खदेडने में  १०० साल लग गए। १८५७ की  पहली क्रांति पूर्णतः असफल रही। लेकिन उसी असफल क्रांति के कारण आगे चलकर संघर्ष तेज हुआ और १९४७ को अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए। इसी तरह किसी संस्था भी संस्था विशेष में  पदों पर बैठे भृष्ट पदलोलुप नेताओं को बाहर करने में भी वक्त लगता है। ईमानदार- न्यायप्रिय जनों को शुरूं में भले ही एक दो बार पराजय झलनी पड़े ,किन्तु अंततोगत्वा विजय सत्य की ही होती है। कहावत भी है कि बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ? लेकिन इसके लिए निरन्तर संघर्ष जारी रखना पहली शर्त है। श्रीराम तिवारी