रविवार, 14 अगस्त 2016

अमर शहीदों को नमन

   भगतसिंह आजाद पुकारे जागो-जागो वीरो जागो।

  आजादी है ध्येय हमारा ,पीठ दिखाकर न तुम भागो।।

   बांधो कफ़न शीश पर साथी ,रिपु रण में होगी आसानी।

   स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर ,हंसते हंसते दो कुर्बानी।।

  पुरुष सिंह थे वे हुतात्मा ,जिनने मर मिटने की ठानी।

  आओ शीश नवाएं उनको ,जो थे क्रांति वीर बलिदानी।।

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

कविता -असली बारहमासा -[ रचनाकार -श्रीराम तिवारी ]

                  [१]
 
  चैत्र  गावै  चेतुवा  वैशाख गावै वनियाँ ,

  जेठ गावै रोहिणी अगनि बरसावै है।

  भवन सुलभ जिन्हें शीतल वातानुकूल ,

  बृष को तरनि तेज उन्हें न सतावै है।।

  नंगे पाँव कृषक भूँखा -प्यासा मजदूर ,

  पसीना बहाये थोड़ी छाँव को ललावै है।

 अंधड़ चलत इत झोपड़े उड़त जात ,

 बंगले से धुन उत डिस्को की आवै है।।


             [२]

 बोअनी की वेला में देर करे मानसून ,

निर्धन किसान मन शोक उपजावै है।

बंगालकी खाड़ीसे न आगे आवैं इंद्रदेव ,

वानियाँ वक्काल दाम दुगने बढ़ावै है।।

वक्त पै बरस जावें  अषढ़ा के बदरा ,

तो दादुरों की धुन पै  धरनि हरषावै है।

कारी घटा घिरआये,खेतों में बरस जाए,

सारँग की धुन सुन सारंग ही गावै है।।

               [३]

वन बाग़ खेत मैढ़ ,चारों ओर हरियाली ,

उदभिज  -गगन  अमिय झलकावै है।

पिहुं -पिहुं बोले पापी पेड़ों पै पपीहरा ,

चिर -बिरहन -मन उमंग जगावै है।।

जलधि मिलन चलीं इतराती सरिताएँ ,

गजगामिनी मानों  पिय घर जावै  है।

झूम-झूम  बरसें  सावन -सरस  घन ,

झूलने पै गोरी मेघ मल्हार गावै है।।

           [४]

 गीली -सीली लकड़ी का चूल्हा नहीं सुलगत ,

 गहर -गहर  बरसात  गहरावै है।

 एलपीजी सुविधा या सोलर इनर्जी का ,

 गाँव की गरीबनी दरस नहीं पावै है।।

 गरीबी में गीला आटा, सुरसा सी महँगाई ,

 श्रमिक गुजारे लायक मजूरी न पावै है।

 बाढ़ में ही बह गए टूटे-फूटे ठीकरे ,

डूब रही झोपड़ी पै  मौत मँडरावै है।

अभिजात्य कोठियों में परजीवी वनिता ,

भादों गोरी सेज सजन संग गावै  है।।

                 [५]

  1. धुल धुँआँ धुंध बयोम में बारूदी गंध घुली ,
  2. ऐंसी दीवाली तो सिर्फ शोहदों को सुहावै  है !
  3. रोजी के जुगाड़ की फ़िकर लागी जिनको।
  4. उत्सव उमंग उन्हें क्या खाक हुलसावै है?
  5. ख़ुशी मौज मस्ती चंद अमीरों की मुठ्ठियों में ,
  6. अडानी अंबानी  घर लक्ष्मी धन बरसावै है।
  7. कहाँ पै जलाएं,दिये अनिकेत अनगिन ,
  8. हिस्से में जिनको सिर्फ अमावश ही आवै है?


[६]

सरसों के फूल सजी धरा बनी दुलहन ,

अलसी के फूल करें अगहन से बात है ।

उड़ि उड़ि झुण्ड गगन पखेरूवा अनगिन ,

सुंदर मानसके हंसों की गति दिन रात है।।

बाजरा -ज्वार की गबोट खिली हरी भरी ,

रबी की फसल भी उगत चली आत है।

कहीं पै सिचाई होवै कहीं पै निराई होवै ,

साँझ ढले कहीं पै धौरी गैया रंभात है।।


  [७]


प्रातःही पसर गये धुंध धूल ओसकण,
पता ही न चले कब दिन ढल जावे है।
पूस की ये ठंडी रातें झोपड़ी में काटे जो,
खेत पै किसान को शीत लहर सतावे है।
कटी फटी गुदड़ी और घास फूस छप्पर ,
आशंका तुषार की नित जिया घबरावे है।
भूतकाल भविष्य या वर्तमान हर क्षण,
हर मौसम केवल सर्वहारा को सतावे है।
गर्म ऊनी वस्त्र और वातानकूलित कोठियाँ ,
लक्जरी लाइफ भॄस्ट बुर्जुआ ही पावे है।

   [८]

हेमन्त आगमन आतिथ्य ललचाये जब ,

माघ मकर संक्रांति दौड़ी चली आवै है।

फाल्गुन के संग आईं गेहुंओं में बालियाँ ,

अमुआ की डार  बौर अगनि लगावै  है।

 चम्पा कचनार बेला सेमल पलाश फूले ,

 पतझड़ तन मन अगनि लगावै  है।

 मादकता गंध लिए महुए के फूल झरें ,

 अली संग कोयल वसन्त को बुलावै है।

   [९]

  रिश्वतखोर साला भृष्ट बाबू अफसर ,

  राष्ट्र भृष्ट तंत्र कल पुर्जा बन जावै है।

  सोना चाँदी ओढ़े नोटों की माला पहनें ,

  गुलछर्रे उड़ावै और नेता कहलावै है।

 अधर्म अनीति की काली कमाई खाये ,

 सत्ता का सुख भी उन्हें  ही दुलरावै है।

 गरीब की मनेगी  कब ईद दीवाली होली ,

 कवि श्रीराम यक्ष प्रश्न दुहरावै है।




















मंगलवार, 26 जुलाई 2016

सलमान के भाग बड़े सजनी ,,,,,,,[poem-by Shriram Tiwari]


कानून की आँखों पर पट्टी और बंद कान हैं।

हत्यारा बेक़सूर सावित ,बजरंगी भाईजान हैं।।

बाल भी बांका नहीं हुआ उस दबंग हत्यारे का।

क्योंकि निर्लज्ज नंगे के ,सदा नौ ग्रह बलवान हैं।।

दुनियाँ में कहाँ ऐंसा सबका नसीब है साथियो?

क्या न्याय के पहरुए  ऐंसे सब पै मेहरवान हैं ??

चिंकारों का कत्ल हो या फुटपाथियों की मौत।

ये तो हरी इच्छा प्रबल और भावी बलवान हैं।।

रुपया -रुतवा साधन शोहरत  ईश्वर से बड़े है ।

वह गधा पहलवान, जिस पर खुदा मेहरवान हैं।।

-:श्रीराम तिवारी :-

सोमवार, 25 जुलाई 2016

दम्भ -पाखंड की जद में फिर आ गए हम !


निकले थे घर से जिसकी बारात लेकर , उसी के जनाजे में क्यों आ गए हम !
चढ़े थे शिखर पर जो विश्वास् लेकर , निराशा की खाई में क्यों आ गिरे हम !!

गाज जो गिराते हैं नाजुक दरख्तों पै , उन्ही की पनाहों में क्यों  जा गिरे हम !
फर्क ही नहीं जहाँ नीति -अनीति का ,संगदिल महफ़िल में खुद आ गए हम !!
खींचते है चीर गंगा जमुनी तहजीव का ,वे तेवर दुशासन के खुद ला रहे हम !
लगती रही  जिधर दावँ पर पांचाली ,शकुनि के जुआ घर में फिर आ गए हम  !!
कर सकते नहीं कद्र अपने  वतन की , दम्भ -पाखंड की जद में  आ गए हम !
 है - खूनी भयानक बर्बर अँधेरी ,उस वामी  के मुहाने पर  फिर आ गए हम ! !

श्रीराम तिवारी

गुरुवार, 30 जून 2016

गुरुडम में गच्चा खुद ही खा गए हम। [ A Poem by Shriram tiwari ]

घर से तो निकले थे खुशियाँ जुटाने ,उदास वीराने में क्यों आ गए हम।
होगा कबीलों में जंगल का क़ानून ,उसी के मुहाने पर क्यों आ गए हम ।।
कारवाँ हकालते हैं सत्ता के प्यादे , ज़माने की गर्दिश में क्यों आ गए हम ।
फर्क ही नहीं जहाँ नीति -अनीति का , खरामा- खरामा उधर आ गए हम।।
लग रही दाँव पर जिधर पांचाली , दुष्ट दुर्योधन के दरबार में आ गए हम ।...
चर्चा नहीं जन संघर्ष -क्रांति की ,ऐंसी बेजान महफ़िल में क्यों आ गए हम।।


निकले थे अपनी विपदा सुनाने , छल-छन्द के बाजार में आ गए हम ।
छकाते रहे जिस अज्ञान छाया को ,उसी की परीधि में खुद आ गए हम ।।
जो कारवाँ संवारते रहे जिंदगी भर ,उसी के निशाने पै खुद आ गए हम । 
अर्थ ही नहीं जहाँ नीति -अनीति का, बदनाम बस्ती में फिर आ गए हम।।   
लगती है जहाँ  दाँव पर पांचाली , उस धृतराष्ट्र के राज में आ गए हम।
उफ़ नहीं करते जहाँ द्रोण भीष्म कृप ,उस नापाक महफ़िल में  आ गए हम।।
चले थे जमाने को सत्पथ दिखाने ,गुरुडम से  भरपूर खुद भरमा गए हम।
दुनिया है गोल या कि इंसा की फितरत ,जहाँ से चले थे वहीँ आ गए हम।

श्रीराम तिवारी

शनिवार, 11 जून 2016

अमर शहीद आहें भर पूँछें ,क्या यह वतन हमारा है? [ A poem by -Shriram Tiwari ]


  नए  दौर  के  नए  ठगों ने ,नव उदार चोला पहना ।

 भारत देश की नीति बन गई ,शोषण को सहते रहना ।।

 सार्वजनिक सम्पत्ति  खाकर , निजी क्षेत्र बौराया है ।

 मीरजाफरों- जयचंदों का ,कठिन दौर फिर आया है ।।

 'सबको शिक्षा सबको काम दो ',मंद हुआ यह नारा है ।

 राष्ट्र निर्माण में फिर भी जुटा है ,वंचित सर्वहारा है ।।

 'भारत माता की जय' तो केवल ,भारत ही का नारा है।

 मेहनतकश जनता का नारा ,'सारा जहाँ हमारा है'।।

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स्वतंत्रता के भीषण रण में ,आशाओं के दीप जले ।

धर्मनिपेक्षता समाजवाद के ,लोकतंत्र के नीड पले ।।

जाति पाँति भाषा-मजहब ,ये शैतान के भाई सगे  ।

राजनीति की क्यारी में कुछ ,खरपतवार बबूल उगे।।

गिद्ध बाज चमगादड़ डोलें ,बोलें चमन हमारा है ।

इसीलिये तो आधा भारत , भूँख प्यास का मारा है ।।

मेहनतकश जनता का यौवन ,खटता मारा-मारा है ।

अमर शहीद आहें भर पूँछें ,क्या यह वतन हमारा है।।

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चोर -उचक्कों के कब्जे में ,जग उत्पादन  सारा है।

नहीं चेतना जन गण मन में ,न इंकलाब का नारा है ।।

कठिन दौर है मेहनतकश का ,नेता हैं नादान देश के।  

जो भी सत्ता पा जाते हैं ,कारण बनते गृहक्लेश के ।।

 राजनीति का नव घनचक्कर, वैश्वीकरण मुनाफा खोरी।

 आतंकवाद भी करता रहता ,राष्ट्रवाद से सीनाजोरी  ।।

 सभ्यताओं के वैमनस्य ने ,हिंस्र भाव को जन्म दिया ।  

 रिश्वतखोर दल्लों  ने उनको ,हथियारों से लैश किया ।। 

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 सत्ता की गुमनाम हस्तियाँ ,उड़ा रहीं हैं मौज मस्तियाँ । 

लोकतंत्र की सकल शक्तियाँ ,वसा रहीं बदनाम बस्तियाँ ।।

 विश्व मंच पर काबिज है अब ,काली पूँजी आवारा है।

 ललचाये इस नागिन को जो , एफडीआई का मारा है ।।

 सिस्टम खंडित हर स्तर पर , मण्डित भृष्ट पौबारा है।

 बागड़  व्यस्त खेत चरने में ,किसका बचा सहारा है।।

 ऊँट पटांग नीतियां जिनकी , वो शासक वेचारा है।

आबाल बृद्ध आहें भर पूँछें ,क्या यह वतन हमारा है।।

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लोकतंत्र में धनतंत्रों के ,गीत सुनाई देते हैं।




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शुक्रवार, 10 जून 2016

तीन बेर खातीं वे ,,,,,ते वे तीन बेर खातीं हैं।

जब प्याज के भाव आसमान पर होते हैं ,तो सत्ता  जमीन सूंघने लगती हैं ।
अब प्याज सड़कों पर वेभाव पडी है ,और सत्ता के पाँव जमीं पर नहीं हैं।।

इन पंक्तियों को लिखते ही मुझे अचानक कविवर 'भूषण ' याद आ गए। मुझे लगता है कि ' साहित्य समाज का दर्पण 'नहीं होता बल्कि वह 'देश काल परिस्थिति और सभ्यताओं के उत्थान-पतन का आइना हुआ करता है। यही वजह है कि सामन्त युगीन रचनाएं तो सर्वकालिक और कालजयी प्रतीत होती हैं और वर्तमान वैज्ञानिक अनुसन्धान आधारित रचना कर्म नित्य नाशवान  महसूस होता है। शायद इसीलिये वर्तमान तीव्रगामी -परिवर्तनशील -द्वन्दात्मक दौर में , सार्वभौम सत्य को निरुपित करते हुए , कालजयी रचनाओं का सृजन अतयन्त दुरूह  हो चला है। जबकि अतीत के सामन्तयुगींन अथवा पुरातन साहित्यिक परिवेश में ,खास तौर से हिन्दी साहित्य  में रीतिकालीन कवियों के सृजन ने सर्वकालिक नीति बोध ,मानवीय सौंदर्य बोध और मानव जीवन  की  बिडंबनाओं को भी कालजयी रचनाओं में पिरोया है। कविवर भूषण का एक मशहूर कवित्त -छन्द है ,जो कि अक्सर  हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों को 'यमक' अलंकार समझाने के बतौर उदाहरण - प्रस्तुत किया जाता है।

''ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाने वारी ,ते वे ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहातीं हैं।
विजन डुलातीं वे ,,,,,,,,,,,,, ,,,,,,,,,,,,,,,,  ते वे विजन डुलातीं हैं।।
तीन बेर  खातीं  वे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,ते वे तीन बेर खातीं  हैं।  ''

चूँकि कविवर  भूषण भी बिहारी या केशवदास जैसे  दरवारी और चारण कवि ही थे। इसलिए उन्हें उनके आका -सामन्तों के युध्दों और उनकी 'प्रियतमाओं ' के नख-शिख सौंदर्य वर्णन से ही फुरसत नहीं मिली। अतः महँगाई  के बारे में ,किसानों -मजूरों के बारे में ,दालों के बारे में ,सब्जियों या प्याज के बारे में उन्होंने कुछ भी नहीं लिखा। फिर भी कविवर भूषण का उक्त कालजयी छन्द लोक व्यवहार में अब भी व्यवहृत देखा जा सकता है। मध्यप्रदेश में इस साल प्याज की बम्फर फसल ने किसानों को बर्बाद कर दिया है।  मंडी में एक रुपया किलो भाव में भी खरीददार नहीं मिल रहे हैं। प्याज को लेकर जो मारामारी मची है उससे कवि भूषण का उक्त छप्यय् छन्द  पुनः याद आ रहा है। आप भी गौर फरमाएं :-

श्रीराम तिवारी ;-