- मानसून बागी हुआ, हुये किसान बैचेन।
अच्छे दिन क्या खाक,घड़ी बिकट दिन-रेन।! - बिजली संकट बढ़ चला ,महँगाई की मार!
जीएसटी के नाम पर लूट रही सरकार।! - सारे भारत में बढे,हिंसा रेप व्यभिचार।!
काश्मीर में एक दिन, रुका न गोली बार।। - बिजली डीजल पैट्रोल, कीमत बढ़ी अपार।
अच्छे दिन कब आएंगे ,जनता करे पुकार।। - वादों जुमलों का भरा ,जैसे मेला कुम्भ!
जो सेवक थे राम के, हो गये शुंभ निशुंभ!! - श्रीराम तिवारी
सोमवार, 25 जून 2018
Dohe -muktak shriram tiwari
रविवार, 17 जून 2018
- सुबह हो या शाम हो जिंदगी पलपल बदलती जाती है।
रूहानी ताकत इस देह की माँग पूर्ति में गुजर जाती है।।
होगा सर्वशक्तिमान कोई और सर्वत्र भी होगा लेकिन,
न्यायिककी तुला उसकी ताकतके पक्षमें झुक जाती है।
अनंत ब्रह्माण्ड की शक्तियां कोटिक नक्षत्र चंद तारे,...
निहारती नीहारिकायें तटस्थ कोई काम नही आती है।
अब क्यों नही सुनाई देती आकाशवाणी कोई -हे मानव!
एक ही नूर से जग उपजाया,तत्त्वमसि-वयम रक्षाम:
ख्वाबों में कहा होगा -'सब मम क्रत सब मम उपजाये'
हकीकत में उसे सिर्फ बर्बर लुटेरोंकी दुआ ही सुहाती है।
गाज गिरतीहै सिर्फ कमजोर दरख्तों खंडहरों पर,
और सुनामी भी निर्बलों पर मुसीबत बनकर आती है! - *श्रीराम तिवारी
मंगलवार, 5 दिसंबर 2017
जन -गण -मन त्रिवेणी हो !
वही देश का मालिक हो ,जिस हाथ कुदाली छेनी हो !
जो बात सभी के हित की हो,वो बात जुबांसे कहनी हो !!
सच्ची सामाजिक समरसता हो, न ऊंच नीच की श्रेणी हो !
अभिव्यक्ति की आजादी हो ,कहीं न फासीवाद नसैनी हो!!
धर्मनिरपेक्षता समाजवाद लोकतंत्र गंगा जमुना त्रिवेणी हो !
न कोई नंगा भूंखा शोषित हो, न जाति पांत की बैनी हो !!
मूल्य आधारित शासन हो,सलाह मेहनतकशों से लेनी हो !
समझ जिन्हें हो भले बुरे की,राष्ट्र की सत्ता उनको देनी हो !!
श्रीराम तिवारी
जो बात सभी के हित की हो,वो बात जुबांसे कहनी हो !!
सच्ची सामाजिक समरसता हो, न ऊंच नीच की श्रेणी हो !
अभिव्यक्ति की आजादी हो ,कहीं न फासीवाद नसैनी हो!!
धर्मनिरपेक्षता समाजवाद लोकतंत्र गंगा जमुना त्रिवेणी हो !
न कोई नंगा भूंखा शोषित हो, न जाति पांत की बैनी हो !!
मूल्य आधारित शासन हो,सलाह मेहनतकशों से लेनी हो !
समझ जिन्हें हो भले बुरे की,राष्ट्र की सत्ता उनको देनी हो !!
श्रीराम तिवारी
शुक्रवार, 17 नवंबर 2017
- बुरा बक्त किसी को बतलाकर नहीं आता।
- किया गया कुछ भी अपना बेकार नहीं जाता।।
- दूध के फट जाने पर दुखी होते हैं कुछ नादान,
- शायद बापरों को रसगुल्ला बनाना नहीं आता।
- खुदा क्यों देता रहता खुदाई उनको इतनी सारी ,
- जिनको अपने सिवा कुछ और नजर नहीं आता।
- माना कि अभी बहारों का असर है फिजाओं में,
- फिर भी उन्हें गुलों से यारी निभाना नहीं आता।
- वेशक किसी से कोई गिला शिकवा न हो बंधूवर,
- लेकिन रूठों को मनाना तुम्हें बिल्कुल नहीं आता ।।
- खुदा की रहमत से बुलंदियों पर मुकाम है तुम्हारा ,
- लेकिन धरती पर पाँव ज़माना तुम्हें नहीं आता।
- क्या खाक करोगे उत्थान सृजन विकास मान्यवर,
- तुम्हें तो खेतों की सोंधी सुगंध में मजा नहीं आता।
- श्रीराम तिवारी
शनिवार, 21 अक्टूबर 2017
- धुल धुँआँ धुंध बयोम में बारूदी गंध घुली ,
- ऐंसी दीवाली तो सिर्फ शोहदों को सुहावै है !
- रोजी के जुगाड़ की फ़िकर लागी जिनको।
- उत्सव उमंग उन्हें क्या खाक हुलसावै है?
- ख़ुशी मौज मस्ती चंद अमीरों की मुठ्ठियों में ,
- अडानी अंबानी घर लक्ष्मी धन बरसावै है।
- कहाँ पै जलाएं,दिये अनिकेत अनगिन ,
- हिस्से में जिनको सिर्फ अमावश ही आवै है?
- श्रीराम तिवारी
बुधवार, 20 सितंबर 2017
शब्द शक्ति आराधना !
{१}
तीज त्यौहार के दिनों मैं माता ,निर्धन जन कुछ समझ न पाता।
महँगा ईंधन सब्जी दुर्लभ आटा,शासक को कुछ समझ न आता ।।
दाल तेल चावल शक़्कर में मंत्री अफसर ,जनता का दुःख दाई है।
मेहनतकश जनता पै भारी माता ,यह सिस्टम साला हरजाई है।।
भूँख कुपोषण लाचारी में माँ ,दिन भी होते हैं कुछ लम्बे लम्बे।
संघर्षों की ज्योति जले माँ ,जय जय अम्बे जय जगदम्बे।।
[२]
मंत्री नेता अफसर बाबू ,इनपर नहीं किसी का काबू।
भले बुढ़ापा आ जाए पर,इनकी तृष्णा कभी न जाबू।।
नित नित नए चुनावी फंडे,बदल बदलकर झंडे डंडे।
राजनीती हरजाई इतनी, कि नहीं देखती संडे मंडे।।
अंधे पीसें कुत्ते खायें ,ये रीति सदा से चलि आई है।
कोटि कोटि जनता पै भारी, शासक की बरियाई है।।
भारत की धरती पर अम्बे ,जाति धर्म के हाथ हैं लम्बे ।
संघर्षों की ज्योति जले माँ ,जय जय अंबे जयजगदम्बे।।
===+======+=====
[३]
महँगी बिजली महँगा पानी ,खाद बीज की आनाकानी।
नहीं ठिकाना कृषि किसानका,भौंचक हैं सब ज्ञानी ध्यानी।।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों में जमकर, नफरत उनने फैलाई है।
गांव शहर और गली गली में.साम्प्रदायिकता ही छाई हैा।।
घोर बबाल है गौ हत्या का,धर्मांध भीड़ की कारस्तानी।
त्यौहारों पर होती अक्सर ,मजहब धरम की खींचातानी।।
वोट की खातिर अहम की शातिर खुद ही कराते नेता दंगे।
संघर्षों की ज्योति जले माँ जय जय अम्बे जय जगदम्बे।।
श्रीराम तिवारी
तीज त्यौहार के दिनों मैं माता ,निर्धन जन कुछ समझ न पाता।
महँगा ईंधन सब्जी दुर्लभ आटा,शासक को कुछ समझ न आता ।।
दाल तेल चावल शक़्कर में मंत्री अफसर ,जनता का दुःख दाई है।
मेहनतकश जनता पै भारी माता ,यह सिस्टम साला हरजाई है।।
भूँख कुपोषण लाचारी में माँ ,दिन भी होते हैं कुछ लम्बे लम्बे।
संघर्षों की ज्योति जले माँ ,जय जय अम्बे जय जगदम्बे।।
[२]
मंत्री नेता अफसर बाबू ,इनपर नहीं किसी का काबू।
भले बुढ़ापा आ जाए पर,इनकी तृष्णा कभी न जाबू।।
नित नित नए चुनावी फंडे,बदल बदलकर झंडे डंडे।
राजनीती हरजाई इतनी, कि नहीं देखती संडे मंडे।।
अंधे पीसें कुत्ते खायें ,ये रीति सदा से चलि आई है।
कोटि कोटि जनता पै भारी, शासक की बरियाई है।।
भारत की धरती पर अम्बे ,जाति धर्म के हाथ हैं लम्बे ।
संघर्षों की ज्योति जले माँ ,जय जय अंबे जयजगदम्बे।।
===+======+=====
[३]
महँगी बिजली महँगा पानी ,खाद बीज की आनाकानी।
नहीं ठिकाना कृषि किसानका,भौंचक हैं सब ज्ञानी ध्यानी।।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों में जमकर, नफरत उनने फैलाई है।
गांव शहर और गली गली में.साम्प्रदायिकता ही छाई हैा।।
घोर बबाल है गौ हत्या का,धर्मांध भीड़ की कारस्तानी।
त्यौहारों पर होती अक्सर ,मजहब धरम की खींचातानी।।
वोट की खातिर अहम की शातिर खुद ही कराते नेता दंगे।
संघर्षों की ज्योति जले माँ जय जय अम्बे जय जगदम्बे।।
श्रीराम तिवारी
शनिवार, 16 सितंबर 2017
जुदाई गीत -श्रीराम तिवारी
- जरा दिल को तसल्ली दो,आरत सुनो मेरी।
रोको रवानी को,तुम्हें जल्दी भी क्या ऐंसी।।
लगी दिल की बुझालें हम, तबतुम चले जाना।
गम अपना सुना दें हम ,तब तुम चले जाना।। - ...
- अरे चोट दिल में लगी, तुमसे बिछुड़ने की।
एक सूरत बसी दिल में,हरदम सलोनी सी।।
प्रीत अनमोल कैसी है,ए हमने अब जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।। - इतना ही था मिलन,आई वेला जुदा होने ।
होश उड़े हैं मेरे ,अंत मेरा खुदा जाने ।।
मैं जरा होश मैं आऊं ,तब तुम चले जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।। - मन हल्का तो होने दो, हम गम के मारे हैं।
हमको न भुला देना ,सदा हम तुम्हारे हैं।।
नफरतों के दौर में ,यारी को निभा जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।। - हमें गम जुदाई का,देकर के तुम चल दिए।
पलकोंमें बसाकर तुम्हें,वक्त ने छल किये।।
तुम बिन कैसे जियें, जरा ये तो बता जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।। - ये आदत पुरानी है ,गमें चोट खाने की।
जबजब जागे नसीब,आये बेला रुलाने की।।
तुमने पीर पराई को,कुछ देखा सुना जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।। - खूब चाहा तुम्हें हमने, हमको न भुला देना।
ग़मों को हमारे तुम ,अपना न बना लेना ।।
दिल का जख्म भर दे, दवा ऐंसी दे जाना।
गम अपना सुना दें हम तब तुम चले जाना।। - जुदाई गीत -श्रीराम तिवारी (मेरी पुस्तक अनामिका से)
रविवार, 3 सितंबर 2017
सबक नहीं सीखते ठोकरें खाने के बाद।
गोली असर करती है बंदूक से निकल जाने के बाद।
गाली असर करती है जुबाँ से निकल जाने के बाद।।
मेहंदी असर करती है हथेलियों से पिस जाने के बाद।
चंदन खुसबू देता है पत्थर पै खूब पिस जाने के बाद।।
संत होने का ढोंग करता है पाखंडी जेल जाने के बाद।
फ़ना हो जाता इंसान भ्रस्ट मंत्री अफसर होने के बाद।।
छाछ भी फूँककर पीते हैं गर्म दूध से जल जानेके बाद।
किन्तु मूर्खजन सबक नहीं सीखते ठोकरें खाने के बाद।।
लोग उन्हें ही क्यों चुनते हैं जो ठगते हैं चुने जाने के बाद।
आदमी आदमी का शोषण करता आदमी होने के बाद।।
श्रीराम तिवारी
शनिवार, 2 सितंबर 2017
बच नहीं पाओगे !
- हंसोगे अगर तो हँसेगी साथ दुनिया
रोओगे तो रहोगे निपट अकेले मनमार!
खुशी है ऐसी शै जो हम ढूंढते हैं बाहर ,
और गमों के भर रखें हैं भीतर भण्डार! - ठहाका लगाओ तो आसमां गूँज उठेगा ,
आह भरो तो पाओगे हर शख्स मौन है !
हर्ष उल्लासों की प्रतिध्वनियां मन पसंद,
मौन-मंद सिसकी तुम्हारी सुनता कौन है ? - खुशियां अगर बांटो तो लोग आएंगे तेरे दर,
दिखाओगे अपने गम, तो सब भाग जायेंगे !
हिस्सा आपके सुख में सभी बंटाना चाहेंगे ,
चाहते हुये भी दूसरे दु:ख नहीं बांट पायेंगे ! - सुखके दिनों में तो सब ही बन जाते मीत ,
दुःख में कोई साथ दे ढूँडते रह जाओगे !
जब तक है मौज खैरियत पूंछते रहेंगे सब,
गर्दिश में ईद के चाँद देखते रह जाओगे ! - यदि तुम कभी दावत दोगे तो भीड़ जुटेगी,
किंतु फाकें में साथ देनें कोई नही आ्येगा !
ज़िन्दगी में सब साथ देंगे,अगर सफल रहो,
मरते हुये किसी के कोई काम नहीं आयेगा !
- श्रीराम तिवारी
मंगलवार, 22 अगस्त 2017
गुल अपने खिलाये हुए हैं!
लम्बी लम्बी उड़ानों के हंस,क्रांतिपथ को सजा्ये हुए हैं।
छोड़ यादों का वो कारवां, आज ही होश आये हुए हैं ।।
साथी मिलते गये नए नए ,कुछ अपने भी पराये हुए हैं ।
फलसफा पेश है पुरनज़र को,लक्षय पै ही टिकाये हुए हैं ।।
प्राप्त आनन्द है इस फिजामें,मेघ नभ में भी छाये हुए हैं।
युग युग से जो प्यासे रहे वो ,क्षीर सिंधु में नहाये हुए हैं।।
अपनी चाहत के सब रंग बदरंग,खुद अपने सजाये हुए हैं।
औरों की खता कुछ नहीं है,गुल अपने ही खिलाये हुए हैं।।
जन्मों जन्मों किये धतकरम सब ,क़र्ज़ उसका चढ़ाए हुए हैं।
जख्म जितने भी हैं जिंदगी के, मर्ज़ अपने ही कमाए हुए हैं।।
खुद ही भूले हैं अपने ठिकाने,दोष गैरों पै ही लगाए हुए हैं।
वक्तने हमको ऐंसा कुछ मारा,कि नींद अपनी उड़ाए हुए हैं।।
श्रीराम तिवारी
अपना बाजिब हक चाहता हूँ।
- मेहनतकश सर्वहारा किसान मजदूर हूँ मैं,
हर खासोआम से कुछ कहना चाहता हूँ !
सदियों से सबकी सुन रहा हूँ मैं खामोश,
अब पूरी शिद्द्त से कुछ कहना चाहता हूँ!
वेद पुराण गीता बाइबिल कुरआन जेंदावेस्ता,
धर्मशास्त्रों के बरक्स कुछ कहना चाहता हूँ!
ईश्वर अवतारों पीरों पैगंबरों संतों महात्माओं,
बाबाओं के इतर कुछ और कहना चाहता हूँ!
समाज सुधारक नहीं हुँ, क्रांतिवीर भी नहीं मैं,
मनुष्य हूँ सो पूंछ सकते हो कि क्या चाहता हूँ?
न तख्तो ताज चाहिए ,न जन्नत न स्वर्ग मोक्ष,
सब्ज बाग छोड़ , वर्तमान को जीना चाहता हूँ ।
युगो युगों से जो बात बिसारते रहे हैं विद्वतजन,
वो बात आज सर्मायेदारों से कहना चाहता हूँ।।
मैं अपने हिस्से की धरती,हवा,पानी,आसमान ,
सूरज,चाँद,तारों में अपना बाजिब हक चाहता हूँ।
विराट अस्तित्व में मौजूद अपार सम्पदा के हरएक, - कण पर प्राणीमात्र का बराबर अधिकार चाहता हूँ।
- Shriram Tiwari
शुक्रवार, 18 अगस्त 2017
नई सुबह जरूर आएगी ।
हरएक स्याह रात के बाद ,नयी सुबह आती है।
तलाश है ज़िसकी मुझे वो मौसमे बहार आती है ।।
निहित स्वार्थ से ऊपर उठा यत्किंचित कोई कभी,
तभी धरती पर जिंदगी खुद ब खुद मुस्कराती है।
समष्टि चेतना को देकर नाम रूहानी इबादत जैसा ,
शुभ संवेदनाओं की बगिया महकने लग जाती है ।।
तान सुरीली हो और कदमताल सधे हों जिंदगी के ,
बज उठेंगे वाद्यवृन्द व्योम में भोर खिलखिलाती है !!
हर एक स्याह रात के बाद,नयी सुबह आती है !,,,,
Shriram Tiwari
गुरुवार, 17 अगस्त 2017
लुटिया डूबी अर्थतंत्र की,मुल्क फँसा हैरानी में !
माल गपागप खा गए चोटटे,कसर नहीं हैवानी में।
मंद मंद मुस्काए हुक्मराँ, गई भैंस जब पानी में।।
सुरा सुंदरी पाए सब कुछ ,सत्ता की गुड़ धानी में।
जनगण मन को मूर्ख बनाते,शासक गण आसानी में।।
लोकतंत्र के चारों खम्बे, पथ विचलित नादानी में।
लुटिया डूबी अर्थतंत्र की,मुल्क फँसा हैरानी में।।
व्यथित किसान छीजते रहते,क़र्ज़ की खींचातानी में।
कारपोरेट पूँजी की जय जय,होती ऐंचकतानी में।।
निर्धन निबल लड़ें आपस में,जाति धर्म की घानी में।
सिस्टम अविरल जुटा हुआ है,काली कारस्तानी में।।
बलिदानों की गाथा हमने, पढ़ी थी खूब जवानी में।
संघर्षों की सही दिशा है ,भगतसिंह की वाणी में।।
श्रीराम तिवारी
मंद मंद मुस्काए हुक्मराँ, गई भैंस जब पानी में।।
सुरा सुंदरी पाए सब कुछ ,सत्ता की गुड़ धानी में।
जनगण मन को मूर्ख बनाते,शासक गण आसानी में।।
लोकतंत्र के चारों खम्बे, पथ विचलित नादानी में।
लुटिया डूबी अर्थतंत्र की,मुल्क फँसा हैरानी में।।
व्यथित किसान छीजते रहते,क़र्ज़ की खींचातानी में।
कारपोरेट पूँजी की जय जय,होती ऐंचकतानी में।।
निर्धन निबल लड़ें आपस में,जाति धर्म की घानी में।
सिस्टम अविरल जुटा हुआ है,काली कारस्तानी में।।
बलिदानों की गाथा हमने, पढ़ी थी खूब जवानी में।
संघर्षों की सही दिशा है ,भगतसिंह की वाणी में।।
श्रीराम तिवारी
शुक्रवार, 21 जुलाई 2017
हम उसको अवाम के पक्ष में नहीं समझते।
जिंदगी के कुछ काम दुआओं के भरोसे नहीं चलते।
बैटरी चार्ज न हो तो मोबाईल कम्प्यूटर नहीं चलते।।
लिखने के लिए और भी गम हैं जिंदगी के ज़माने में ,
इसलिए हम कसमें वादे प्यार बफा पर नहीं लिखते !!
बड़े पद जातीय सियासत से सुर्खुरू हो रहे इन दिनों , ...
हम इसको लोकतन्त्र के हित में कदापि नही समझते !!
जाने क्यों प्रतिस्परधी दौड़ में उतावला है हर शख्स,
खुशनसीब हैं वे जो इस पचडे में ज़रा भी नहीं फसते !!
:-Shriram Tiwari
बैटरी चार्ज न हो तो मोबाईल कम्प्यूटर नहीं चलते।।
लिखने के लिए और भी गम हैं जिंदगी के ज़माने में ,
इसलिए हम कसमें वादे प्यार बफा पर नहीं लिखते !!
बड़े पद जातीय सियासत से सुर्खुरू हो रहे इन दिनों , ...
हम इसको लोकतन्त्र के हित में कदापि नही समझते !!
जाने क्यों प्रतिस्परधी दौड़ में उतावला है हर शख्स,
खुशनसीब हैं वे जो इस पचडे में ज़रा भी नहीं फसते !!
:-Shriram Tiwari
बुधवार, 5 जुलाई 2017
नंगे भूंखे को तो -सारा जहाँ हमारा है !
स्वतंत्रता के भीषण रण में ,सपने देख लड़ी आवाम।
आजादी के बाद मिलेगा ,सबको शिक्षा सबको काम।।
काम के होंगे निश्चित घंटे ,और मेहनत के पूरे दाम।
आजादी के बरसों बाद भी,मुल्क हुआ सबमें नाकाम।।
जिन्दा रहने की फितरत में ,जन फिरता मारा मारा है।
मदहोश शासकों का कुनबा ,अब लूट रहा धन सारा है।।
कैसा राष्ट्र क्या वतन परस्ती,जब लोकतंत्र बेचारा है।
नंगे भूंखे इंसानों का तो ,यह सारा जहाँ 'हमारा' है।।
======++++++=====
धूल धुआाँ धुंध से भरा यह, राष्ट्र आँसुओं से गीला है।
निर्धन ग्रामीणों को देखो, गौर से हरेक चेहरा पीला है।।
बड़े बड़े नगरों को देखो भौतिक विकास का मारा है।
भटक रही तरुणाई यहाँ फिर भी सत्ता की पौबारा है।।
आजादी के दीवानों ने ,तब क्रांति ज्योति जलाई थी।
प्रजातंत्र -समाजवाद होगा, कुछ ऐंसी आस जगाई थी।।
जात पांत भाषा मज़हब की ,सब कटटरता ठुकराई थी।
आज़ादी के बाद अमन की ,उन सबने राह दिखाई थी।।
अब भूँखे को रोटी मिल जाए, तो ये वतन हमारा है ।
वर्ना नंगे भूँखे इंसानों को,यह सारा जहाँ हमारा है।।
++++++======+=======+++=
आन बान सम्मान देश का प्रतिपल होता क्षरण देश का।
सत्ता में जो डटे हुए हैं , उन्हें नहीं भय नाम लेश का।।
कारपोरेट कल्चर का मिक्चर, सुपरमुनाफे के निवेश का।
सार्वजनिक उपक्रम को खाकर ,निजीक्षेत्र है भ्र्ष्ट देश का।।
बहुराष्ट्रीय निगमों ने फिर से, भारत जन को ललकारा है।
सुख चैन अमन साझा सबका हो, सच्चा वतन हमारा है।।
वर्ना नंगे भूँखे को कैसा वतन,कहेगा सारा जहाँ हमारा है।
बुधवार, 21 जून 2017
क्यों फूलों को खार बनाने पर आमादा हैं !
वो जो भारत के खिलाफ हथियार उठाने वाली है ।
वो जो कश्मीरी युवतियों को भड़काने वाली है ।।
वो वतनपरस्त नहीं अबला दुख्तराने हिन्द भी नहीं,
वो गद्दार पाकिस्तानी जनरलों की बदनाम साली है ।
जो शख्स अपने मजहब को देश से ऊपर रखता है।
जो सत्ता में होकर एक खास धर्म से रिस्ता रखता है।।
जो लोकतंत्र धर्मनिर्पेक्षता समाजवाद से बैर रखता है,
वो देशभक्त नहीं, शूरमा नहीं, शिखंडी सा लगता है।
क्यों लोग निरंतर फूलों को खार बनाने पर आमादा हैं !
क्यों किशोर -युवाओं को अंगार बनाने पर आमादा हैं!!
क्यों खेतों खलिहानों की पावन महकती सौंधी मिट्टी को,
धर्म जात मजहब की दरो दीवार बनाने पर आमादा हैं!
श्रीराम तिवारी
वो जो कश्मीरी युवतियों को भड़काने वाली है ।।
वो वतनपरस्त नहीं अबला दुख्तराने हिन्द भी नहीं,
वो गद्दार पाकिस्तानी जनरलों की बदनाम साली है ।
जो शख्स अपने मजहब को देश से ऊपर रखता है।
जो सत्ता में होकर एक खास धर्म से रिस्ता रखता है।।
जो लोकतंत्र धर्मनिर्पेक्षता समाजवाद से बैर रखता है,
वो देशभक्त नहीं, शूरमा नहीं, शिखंडी सा लगता है।
क्यों लोग निरंतर फूलों को खार बनाने पर आमादा हैं !
क्यों किशोर -युवाओं को अंगार बनाने पर आमादा हैं!!
क्यों खेतों खलिहानों की पावन महकती सौंधी मिट्टी को,
धर्म जात मजहब की दरो दीवार बनाने पर आमादा हैं!
श्रीराम तिवारी
गुरुवार, 15 जून 2017
गाज गिरती है सिर्फ कमजोर दरख्तों पर !
मायिक बंधन से जीव देह इक आती इक जाती है।
काल वहीँ ठहरा है सिर्फ अंधी राह गुजर जाती है।।
दृश्य जगत की सुबह हो या शाम, ख़ुशी हो या गम ,
उत्थान हो या पतन, जिंदगी यों ही गुजर जाती है।
भोगियों ,योगियों, रोगियों, देहधारियों, की तमाम,
रूहानी ताकत भौतिक माँग पूर्ति में गुजर जाती है।
वेशक होगा कोइ सर्वशक्तिमान,सर्वज्ञ सनातन सर्वत्र,
किन्तु कभी कभी उससे भी बड़ी चूक हो जाती है।
कमजोरों पर शक्तिशाली का वर्चस्व कैसा कर्मफल ?
जब न्याय तुला उसकी बलवान के पक्षमें झुक जाती है।
हैं अनंत ब्रह्माण्ड में अनंत नीहारिकाएँ,नक्षत्र,सूर्य चंद्र ,
हरेक निर्बल वस्तु शक्तिशाली का प्रभुत्व सहती जाती है।
कोई ईश्वर नहीं कहता कि निर्बल का शोषण- दमन करो ,
जिसने सब जग सृजा दुनिया उसके वन्दों को क्यों सताती है।
हर युग में वह अनंत असीम अपने उत्कृष्ट चाहने वालों के
ध्यानमें आकर आकर कहता है ,मुझे तुम्हारी याद आती है ।
गाज गिरती है केवल कोमल दरख्तों- कमजोर झोपडों पर,
शस्य स्यामल धरा की दुर्दशा देख सुनामी भी मुस्कराती है!
श्रीराम तिवारी
काल वहीँ ठहरा है सिर्फ अंधी राह गुजर जाती है।।
दृश्य जगत की सुबह हो या शाम, ख़ुशी हो या गम ,
उत्थान हो या पतन, जिंदगी यों ही गुजर जाती है।
भोगियों ,योगियों, रोगियों, देहधारियों, की तमाम,
रूहानी ताकत भौतिक माँग पूर्ति में गुजर जाती है।
वेशक होगा कोइ सर्वशक्तिमान,सर्वज्ञ सनातन सर्वत्र,
किन्तु कभी कभी उससे भी बड़ी चूक हो जाती है।
कमजोरों पर शक्तिशाली का वर्चस्व कैसा कर्मफल ?
जब न्याय तुला उसकी बलवान के पक्षमें झुक जाती है।
हैं अनंत ब्रह्माण्ड में अनंत नीहारिकाएँ,नक्षत्र,सूर्य चंद्र ,
हरेक निर्बल वस्तु शक्तिशाली का प्रभुत्व सहती जाती है।
कोई ईश्वर नहीं कहता कि निर्बल का शोषण- दमन करो ,
जिसने सब जग सृजा दुनिया उसके वन्दों को क्यों सताती है।
हर युग में वह अनंत असीम अपने उत्कृष्ट चाहने वालों के
ध्यानमें आकर आकर कहता है ,मुझे तुम्हारी याद आती है ।
गाज गिरती है केवल कोमल दरख्तों- कमजोर झोपडों पर,
शस्य स्यामल धरा की दुर्दशा देख सुनामी भी मुस्कराती है!
श्रीराम तिवारी
शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017
ज्वालन के जाल बिकराल बरषत है।
तचति धरनि जग जरति झरनि सीरी ,
छाँह को पकरि पंथी पंछी बिलमत है।
'सेनापति' नेक दुपहरी के ढरत होत ,
घमका विषम ज्यों न पात खरकत है।
मोरे जान पौन सीरी ठौरको पकरि कोनों ,
घरी एक बैठ कहूं घामहु वितवत है।
[ ग्रीष्म ऋतु का इससे बेहतर काव्यात्मक वर्णन मैं नहीं कर सकता, इसलिए 'सेनापति'के कवित्त को उद्धृत कर रहा हूँ,ग्रीष्म ऋतु में कवित्त का आनंद लेवें
तचति धरनि जग जरति झरनि सीरी ,
छाँह को पकरि पंथी पंछी बिलमत है।
'सेनापति' नेक दुपहरी के ढरत होत ,
घमका विषम ज्यों न पात खरकत है।
मोरे जान पौन सीरी ठौरको पकरि कोनों ,
घरी एक बैठ कहूं घामहु वितवत है।
[ ग्रीष्म ऋतु का इससे बेहतर काव्यात्मक वर्णन मैं नहीं कर सकता, इसलिए 'सेनापति'के कवित्त को उद्धृत कर रहा हूँ,ग्रीष्म ऋतु में कवित्त का आनंद लेवें
बुधवार, 19 अप्रैल 2017
नित नई कठिन चुनौतियां,मुल्क हुआ हैरान।
लाल बत्ती बन्द भइ , नेता भये अधीर।
पद प्रतिष्ठा अहम बिन,पिद्दा हुए वजीर।।
पद प्रतिष्ठा अहम बिन,पिद्दा हुए वजीर।।
सत्ता मृग मारीचिका,जाने सकल जहान।
दंड कमंडल छोड़कर,योगी हुए महान।।
मोदीजी के मन बसी ,केवल एक ही बात।
कैशलेस सबको करो,मारो बैंक को लात।।
नित नई कठिन चुनौतियां,मुल्क हुआ हैरान।
महंगाई आतंक का , हुआ न कोई निदान ।
पुलिस दमन शोषण घुटन,भॄस्ट तंत्र नाकाम।
मूल्यहीनता चरम पर,भ्रमित सकल आवाम।।
राजनीति ने पी रखा ,जातिवाद का जाम।
धर्मनिपेक्षता यों हुई ,ज्यों मुन्नी बदनाम।।
जोशी अडवानी चिंतित ,सुश्री उमा अधीर ।
मस्जिद मंदिर विषय में, हुआ कोर्ट गंभीर।।
न विचार न नीति कोई ,न विकास के काम।
सेना को अपमानित करें ,पत्थरबाज तमाम।
श्रीराम तिवारी
श्रीराम तिवारी
दंड कमंडल छोड़कर,योगी हुए महान।।
मोदीजी के मन बसी ,केवल एक ही बात।
कैशलेस सबको करो,मारो बैंक को लात।।
नित नई कठिन चुनौतियां,मुल्क हुआ हैरान।
महंगाई आतंक का , हुआ न कोई निदान ।
पुलिस दमन शोषण घुटन,भॄस्ट तंत्र नाकाम।
मूल्यहीनता चरम पर,भ्रमित सकल आवाम।।
राजनीति ने पी रखा ,जातिवाद का जाम।
धर्मनिपेक्षता यों हुई ,ज्यों मुन्नी बदनाम।।
जोशी अडवानी चिंतित ,सुश्री उमा अधीर ।
मस्जिद मंदिर विषय में, हुआ कोर्ट गंभीर।।
न विचार न नीति कोई ,न विकास के काम।
सेना को अपमानित करें ,पत्थरबाज तमाम।
श्रीराम तिवारी
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