रविवार, 12 मार्च 2017

भाजपा की होली।



माल्याओं मोदियों चौकसियों ने, खेली बैंकों संग ठिठोली ,
सीमाओं पर दुश्मन खेलता रहता, नित्य ही खून की होली।
अमन के फाख्ते कबके उड़ चुके,कश्मीर की वादियों से ,
वतन के नौनिहाल हो रहे शहीद,झेल रहे सीने पर गोली।।
सत्ता के दलाल पूँजीवादी साम्प्रदायिक बकवादी भृष्ट नेता,
होकर सत्ता मद चूर कर रहे हैं जनता के संग हंसी ठिठोली।
नए नए झुनझुने जीएसटी,नोटबंदी और विकास की बोली ,
=श्रीराम तिवारी





शनिवार, 4 मार्च 2017

भोर किसी मुर्गे की बाँग की मुहताज नहीं।

हरेक स्याह रात के बाद नयी सुबह खुद आती है।

चलती का नाम जिंदगी है खुद ही चलती जाती है।।

कोई भी भोर किसी मुर्गे की बाँग की मुहताज नहीं।

जिजीविषा की ताकत  ही  दुनिया  को चलाती है।।

सच कहा किसी ने जरूरत आविष्कार की जननी है।

इसीलिये गधा धूल में और चिड़िया औस में नहाती है।।

======+++++=====

यदि जवानी किसी महान पुरषार्थ सिंधु में नहाती है।

जीवन की साँझ स्वतः खुशनुमा होती चली जाती है।।

कौन कितना जिया यह महत्वपूर्ण नहीं है  लेकिन ,

सार्थक जिंदगी हो  तो कुछ  असर छोड़ जाती है।

पाशविक जगत की रीति है खुद के लिए ही जीना ,

मानवता तो औरों के लिए जीना मरना सिखाती है।

======++++++=======

निर्बलों की हित चिंतक बुध्दि न्याय को पक्षधर बनाती है। 

क्रांतिका विचार हौसला देता है शहादत सुर्खुरू बनाती है।।  

मानव जीवन का फलसफा सिर्फ धर्म-मजहब में नहीं है।

साहित्य कला संगीत के बिना जिंदगी अधूरी रह जाती है।।  

जीवन मूल्य सदा फूलों की भाँति सुवासित होते रहने दो।

मानव जीवन में  खुशियों की बहार खुद चली आती है।।


नभ में छिटके चाँद सितारे सूरज सबके गतिज नियम हैं।

ऐंसे नियम मनुज जीवन में भी हों तो वसन्त ऋतू आती है।।

 श्रीराम तिवारी



श्रीराम तिवारी  

 



रविवार, 26 फ़रवरी 2017

रोटी कपडा और मकान


नेता  बड़बोले नादान , गिना रहे हैं कब्रिस्तान।

कहते हैं यूपी जितवा दो ,बनवा देंगे वे श्मशान।।

मेरा देश है बड़ा महान ,मतदाता बेहद नादान।

सत्ता के दल्लों से मांगे ,रोटी कपडा और मकान।।

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

कोयल गाती तो है।


गुजरी हुई हर रात के बाद,इक नयी सुबह आती तो है।

नेक इंसानके घर आँगनमें पेड़ हो तो गौरैया गाती तो है।।

हर एक तितली जीती है ख़ुशी-ख़ुशी अपनी जिंदगी पूरी ,

जीवन भले हो महज आठ पहर का फिरभी सुहाती तो है।

सुख-दुःख, हानि-लाभ , मानवीय छल-कपट से बेखबर ,

तयशुदा मौसम में कोयल अमुआकी डालीपर गाती तो है।

 आपाधापीयुक्त शहर की अभिजात्य कोठियों में न सही ,

 गाँवकी झोपडी से अभी भी लोरी की आवाज आती तो है।

गौरैया,तितली,कोयल,माँ की लोरी ,नयी सुबह का कलरव,

 अभी भी इंसान को जिंदगी जीने की उमंग जगाती तो है।

  - श्रीराम तिवारी !




गुरुवार, 26 जनवरी 2017

कहें पद्माकर जू,,,!

'बड़ी जीजी' हम सब भाई बहिनों में सबसे बड़ी हैं। उम्रमें वे मुझसे आठ साल बड़ी हैं। विगत २२ दिसम्बर को जब 'आनंदम' के मित्रों ने और सपरिजनों ने मेरा जन्म दिन मनाया और शुभकामनाएँ दीं तब 'बड़ी जीजी ' मेरे पास ही थीं। उन्होंने मुझे बताया कि मेरा जन्म 'बसन्त पंचमी' को हुआ था ! उनकी याददास्त के अनुसार स्कूल में मेरी उम्र एक साल ज्यादा लिखी गई। याने मैं एक साल पहले ही रिटायर हो चूका हूँ। यह जानकर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ !मेरी जन्म तारीख  स्कूल में सही नहीं लिखी गयी या मुझे किसी ने  बताया नहीं तो इसमें मेरी क्या त्रुटि है? हालाँकि हमारे रिटायर जनरल बी'के सिंह [अब केंद्रीय मंत्री] की तरह मुझे कोई कोर्टबाजी नहीं करनी। क्योंकि मैं जानता हूँ कि ५०-६० साल पहले वाले भारत के ठेठ गाँव के सरकारी स्कूल में भी पढाई अच्छी होती थी, और हमारे लिए यही बहुत है। जन्म तारीख इत्यादि का तब खास ध्यान नहीं रखा जाता था।

सभी मित्रों,सुह्र्दयजनों और सपरिजनों को  'बसन्त पंचमी' की शुभकामनाएँ ! इस अवसर पर महाकवि पद्माकर की चार पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं :-  



''कूलनमें केलिमें कछारनमें कुंजनमें, क्यारिनमें कलित कलीन किलकंत है।

द्वार में दिशान में दूनी देश-देशन में ,देख्यों दीप दीपन में  दीपत  दिगंत है।।

कहें पद्माकर जू  परागन में पौन में ,पाकन में पिक में पलाशन पगंत है।

बेलि में बितान में ,बेलन नवेलन में, बनन में बागन में बगरो बसन्त है।। ''

हालाँकि मैं अच्छस तरह जानता हूँ कि इस कड़कड़ाती ठण्ड और धूल धुआँ -धुंध से परेशान लोगों को पद्माकर का रीतिकालीन ' बसन्त सौंदर्य' अथवा बसन्तोत्सव नहीं बल्कि इससे कठिन दौर से शीघ्र निजात चाहिए !


''पद्माकर '' 

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

बिकट संकट गणतंत्रानाम,,,,,!



परपीड़ा ददामि महापुण्यम, श्रमशोषण पापनाशनम !

कालाधन स्वर्गसोपानाम , रिश्वतखोरी मोक्षदायकम  !!


मक्कारी मुफ़्तखोरानाम ,आरक्षण भवभय हारणीम !

 नायक: भवतु खलनायक:,एष : नवभारतस्यलक्षणम !!


 जनानां पीड़ित:महादुष्ट:,संसदीय लोकतंत्र गतरसातलं  !

 जीवनमुक्ति सर्वहारानाम ,पूँजीवादकृत महा पातकम !!

 
   पर सम्पदा हरणम महापुण्यम, दलाली पापनाशनम !

   घटिया सार्वजनिक निर्माणम ,कमीशन मुक्तिदायकम !!


   कृतघ्नता घोरं सरकारी क्षेत्रे,शिक्षा स्वास्थ्य बँटाढारकम !

  आर्थिक पैकेज प्रदत्त निजीक्षेत्रे ,सार्वजनिक क्षेत्र नाशनं !!


   चुनाव प्रक्रिया दोषपूर्णे: नेता जाति वर्ण साम्प्रदायकम !

   महाविकट संकट भारतराष्ट्र गणतन्त्रणाम पतनम गतः !!

 

   श्रीराम तिवारी


  


सरस्वती वंदना -[रचना -श्रीराम तिवारी]

                    [१]
करुणकृन्दन विनयवाणी, हृदय हाहाकार हो।

शारदा  माँ  वीणापाणी, शब्द में साकार हो।।

अरुण मानव का जगा दे ,हीनता संहार दे।

झंझावतों में अचल हो ,वह ज्ञान दीप उजार दे।।

                  [२]


गीत की स्वर  लहरियों में, सत्य  का संधान हो।

जन में हो भ्रातत्व समता, एकता अविराम हो।।

विज्ञानसे  मानव बड़ा हो , विश्व का कल्याण हो।

मस्जिदों में शंख ध्वनियाँ, मंदिरों में अजान हो।।

                  [३]

मूक कम्पित दमित को माँ ,सिंहसी हुँकार दे।

वंचितों की वेदना को , मेदनी ललकार दे।।

 काँटे कुचल दे राह के, पंथ की पहचान हो।

 कठिनाइयों से न डरें ,आँधी या तूफ़ान हो।।

                         [४]

एकता के प्यार के सुर, छंद में सजते रहें।

नित्य नव निर्माण के हम, गीत नव रचते रहें।।

धर्मान्धता अज्ञानता का,बध अहम् का कीजिये।

दिग्भ्रमित इस राष्ट्रका माँ ,दिशि निर्देशन कीजिये।।


                       [५]

तंत्रीनाद कवित्त रस में ,विषमता धो दीजिये।

परपीड़न की कामना को ,कालकलवित कीजिये।।

निर्भय सकल जहान हो ,नीति का सम्मान हो।

ज्ञान की गंगा बहे माँ ,पंथ की पहचान हो।


                   [६]

आक्रोश जनका तब तलक,थम न जाए जानले।

कोटि -कोटि निर्धनों के ,आंसुओं को थाम ले।।

गगन - भेदी  भुवन - भेदी ,लक्ष्यभेदी   तान  दे।

शैतान का गढ़ ध्वस्त हो ,माता यही वरदान दे।।


                 [७]

कबीर नानक रहीम जैसी ,सृजना को दीजिये।

भुवनमोहन तानसेनी ,तान की लय दीजिये।।

रामायण के रचियता सा ,शिल्प का सामान हो।

 शबद साखी सुखमनी के ,सत्य का संधान हो।।

                [८]

स्वाधीनता समता जगे माँ ,बंधुता का मान हो।

 उसको बना दे माँ देवी ,जो ह्रदय पाषाण हो।।

मानवता के ग्रहण छूटें ,उत्पीड़न उन्माद के।

पिल्लर धराशायी करो माँ ,पापी पूँजीवाद के।।


            [९]

भारत में भ्रातत्व भाव की, भावना भर दीजिये।

मेहनतकशों में इंकलाबी ,गर्जना भर दीजिये।।

ज्ञानकी ज्योति जलाओ  ,जन तमस हर लीजिये।

जगके सब आतंकियोंमें ,इंसानियत भर दीजिये ।।


                                [१०]

कंठ में मानिंद शिव की, नित हलाहल पान हो।

कल्प कल्पान्तर कवि की, वेदना का ज्ञान हो।।

बलिदान की सम्भावना को, सतत सम्बल दीजिये।

जयति वाणी भारती माँ , पतित पावन कीजिये।।


  श्रीराम तिवारी