गुरुवार, 15 जून 2017

गाज गिरती है सिर्फ कमजोर दरख्तों पर !

मायिक बंधन से जीव देह इक आती इक जाती है।
काल वहीँ ठहरा है सिर्फ अंधी राह गुजर जाती है।।
दृश्य जगत की सुबह हो या शाम, ख़ुशी हो या गम ,
उत्थान हो या पतन, जिंदगी यों ही गुजर जाती है।
भोगियों ,योगियों, रोगियों, देहधारियों, की तमाम,
रूहानी ताकत भौतिक माँग पूर्ति में गुजर जाती है।
वेशक होगा कोइ सर्वशक्तिमान,सर्वज्ञ सनातन सर्वत्र,  
किन्तु कभी कभी उससे भी बड़ी चूक हो जाती है।
कमजोरों पर शक्तिशाली का वर्चस्व कैसा कर्मफल ?
जब न्याय तुला उसकी बलवान के पक्षमें झुक जाती है।

हैं अनंत ब्रह्माण्ड में अनंत नीहारिकाएँ,नक्षत्र,सूर्य चंद्र ,
हरेक निर्बल वस्तु शक्तिशाली का प्रभुत्व सहती जाती है।
कोई ईश्वर नहीं कहता कि निर्बल का शोषण- दमन करो ,
जिसने सब जग सृजा दुनिया उसके वन्दों को क्यों सताती है।

हर युग में वह अनंत असीम अपने उत्कृष्ट चाहने वालों के
ध्यानमें आकर आकर कहता है ,मुझे तुम्हारी याद आती है ।

गाज गिरती है केवल कोमल दरख्तों- कमजोर झोपडों पर,
शस्य स्यामल धरा की दुर्दशा देख सुनामी भी मुस्कराती है!

श्रीराम तिवारी
 

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017


'सारे जहाँ से अच्छा ,हिन्दोस्ताँ हमारा ........' लिखने वाले अल्लामा मोहम्मद इकवाल साहब की पुण्य तिथि पर उनका हार्दिक अभिवादन!वेशक पाकिस्तान बनने पर ,वे भारत छोड़ गए! किन्तु उनकी धर्मनिरपेक्ष शायरी हमेशा 'हिंदी हैं हम वतन हैं हम और हिन्दोस्ताँ हमारा' का पैगाम युगों-युगों तक देती रहेगी !
ज्वालन  के जाल बिकराल बरषत है।

तचति धरनि जग जरति झरनि  सीरी ,

छाँह को पकरि पंथी पंछी बिलमत है।

'सेनापति' नेक दुपहरी के ढरत होत ,

घमका विषम ज्यों न पात खरकत है।

मोरे जान पौन सीरी ठौरको पकरि कोनों ,

घरी एक बैठ कहूं घामहु  वितवत है।

[ ग्रीष्म ऋतु का इससे बेहतर काव्यात्मक वर्णन मैं नहीं कर सकता, इसलिए 'सेनापति'के कवित्त को उद्धृत कर रहा हूँ,ग्रीष्म ऋतु में कवित्त का आनंद लेवें

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

नित नई कठिन चुनौतियां,मुल्क हुआ हैरान।

लाल बत्ती बन्द भइ , नेता भये अधीर।
पद प्रतिष्ठा अहम बिन,पिद्दा हुए वजीर।।
         
सत्ता मृग मारीचिका,जाने सकल जहान। 
दंड कमंडल छोड़कर,योगी हुए महान।।

मोदीजी के मन बसी ,केवल एक ही बात।
कैशलेस सबको करो,मारो बैंक को लात।।

नित नई कठिन चुनौतियां,मुल्क हुआ हैरान।
महंगाई आतंक का , हुआ न कोई निदान ।

पुलिस दमन शोषण घुटन,भॄस्ट तंत्र नाकाम।
मूल्यहीनता चरम पर,भ्रमित सकल आवाम।।

राजनीति ने पी रखा ,जातिवाद का जाम।
धर्मनिपेक्षता यों हुई ,ज्यों मुन्नी बदनाम।।

जोशी अडवानी चिंतित ,सुश्री उमा अधीर ।
मस्जिद मंदिर विषय में, हुआ कोर्ट गंभीर।।

न विचार न नीति कोई ,न विकास के काम।
सेना को अपमानित करें ,पत्थरबाज तमाम।

श्रीराम तिवारी



 

श्रीराम तिवारी

बुधवार, 15 मार्च 2017

सत्ता महाठगनी हम जानी

सत्ता महाठगनी हम जानी

कोटिक जतन करे नेता ने छोड़ी कुल की कानी !

लटके झटके जुमले वादे नित नित नई कहानी ! सत्ता महा ठगनी ,,,,,,,,जानी !


 मुफ्त  जहाज  अडानी  देता  चन्दा दे अम्बानी !

 यू पी विजय पाकर बौराये  कर  बैठे  नादानी!

गोवा और मणिपुर में भी हार की  जीत बखानी !  सत्ता महा ठगनी हम जानी ! !

रविवार, 12 मार्च 2017

भाजपा की होली।



माल्याओं मोदियों चौकसियों ने, खेली बैंकों संग ठिठोली ,
सीमाओं पर दुश्मन खेलता रहता, नित्य ही खून की होली।
अमन के फाख्ते कबके उड़ चुके,कश्मीर की वादियों से ,
वतन के नौनिहाल हो रहे शहीद,झेल रहे सीने पर गोली।।
सत्ता के दलाल पूँजीवादी साम्प्रदायिक बकवादी भृष्ट नेता,
होकर सत्ता मद चूर कर रहे हैं जनता के संग हंसी ठिठोली।
नए नए झुनझुने जीएसटी,नोटबंदी और विकास की बोली ,
=श्रीराम तिवारी





शनिवार, 4 मार्च 2017

भोर किसी मुर्गे की बाँग की मुहताज नहीं।

हरेक स्याह रात के बाद नयी सुबह खुद आती है।

चलती का नाम जिंदगी है खुद ही चलती जाती है।।

कोई भी भोर किसी मुर्गे की बाँग की मुहताज नहीं।

जिजीविषा की ताकत  ही  दुनिया  को चलाती है।।

सच कहा किसी ने जरूरत आविष्कार की जननी है।

इसीलिये गधा धूल में और चिड़िया औस में नहाती है।।

======+++++=====

यदि जवानी किसी महान पुरषार्थ सिंधु में नहाती है।

जीवन की साँझ स्वतः खुशनुमा होती चली जाती है।।

कौन कितना जिया यह महत्वपूर्ण नहीं है  लेकिन ,

सार्थक जिंदगी हो  तो कुछ  असर छोड़ जाती है।

पाशविक जगत की रीति है खुद के लिए ही जीना ,

मानवता तो औरों के लिए जीना मरना सिखाती है।

======++++++=======

निर्बलों की हित चिंतक बुध्दि न्याय को पक्षधर बनाती है। 

क्रांतिका विचार हौसला देता है शहादत सुर्खुरू बनाती है।।  

मानव जीवन का फलसफा सिर्फ धर्म-मजहब में नहीं है।

साहित्य कला संगीत के बिना जिंदगी अधूरी रह जाती है।।  

जीवन मूल्य सदा फूलों की भाँति सुवासित होते रहने दो।

मानव जीवन में  खुशियों की बहार खुद चली आती है।।


नभ में छिटके चाँद सितारे सूरज सबके गतिज नियम हैं।

ऐंसे नियम मनुज जीवन में भी हों तो वसन्त ऋतू आती है।।

 श्रीराम तिवारी



श्रीराम तिवारी