सोमवार, 29 अगस्त 2016

परिंदे नजर को आसमानी रख।-[gazal by -shriram tiwari]


परिंदे हौसला कायम रख ,उड़ान जारी रख,

हर इक निगाह तुझ पर है ,ध्यान ज्ञानी रख।

बुलंदियाँ  तेरी  हिम्मत  को  आजमाएँगीं,

परों में जान रख, नजर को आसमानी रख।

 परिंदे कई उड़े पहले , भटककर राह भूले ,

 लौटकर आये नहीं, याद उनकी निशानी रख।

 दहक़ता आसमाँ ,बादल घनेरे, अँधेरा घुप्प ,

 कौंधतीं  बिजलियाँ चमकें ,पुरुषत्व पानी रख।

 भेदकर धुंध के उस पार ,विहंगावलोकन कर ,

 सितारों से भी आगे जाना है ,तूँ रवानी रख ।


  श्रीराम तिवारी




रविवार, 28 अगस्त 2016

हम जब कंक्रीट की दीवाल में  कील ठोकते हैं तो पहली बार में कील अक्सर मुड़ जाया करती है। कभी कभी दूसरी बार में  भी सफल नहीं हो पाते। लेकिन तीसरी या चौथी बार कील ठोकने में हम सफल हो जाते हैं।पहली एक-दो कीलों के मुड़ जाने या खराब हो जाने  का मतलब यह नहीं कि वह प्रयास अकारथ गया। हमें हमेशा याद रखना चहिये कि उन्ही पहले वाले प्रयासों के कारण अंतिम प्रयास में सफलता मिला करती है। पहले प्रयास द्वारा बनाई गयी गहराई ही बाद के प्रयासों के सफल परिणाम का कारण बनती है।

इसी तरह भृष्ट सिस्टम अथवा  अनैतिक -अनाचार के पोखरों के खिलाफ किया जाने वाला कोई भी संघर्ष बेकार नहीं जाता। क्योकि सत्य परेशां हो सकता है ,पराजित नहीं। भारत की संघर्षशील जनता द्वारा अंग्रेजों को खदेडने में  १०० साल लग गए। १८५७ की  पहली क्रांति पूर्णतः असफल रही। लेकिन उसी असफल क्रांति के कारण आगे चलकर संघर्ष तेज हुआ और १९४७ को अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए। इसी तरह किसी संस्था भी संस्था विशेष में  पदों पर बैठे भृष्ट पदलोलुप नेताओं को बाहर करने में भी वक्त लगता है। ईमानदार- न्यायप्रिय जनों को शुरूं में भले ही एक दो बार पराजय झलनी पड़े ,किन्तु अंततोगत्वा विजय सत्य की ही होती है। कहावत भी है कि बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ? लेकिन इसके लिए निरन्तर संघर्ष जारी रखना पहली शर्त है। श्रीराम तिवारी

बुधवार, 24 अगस्त 2016

मैं जब वयम हो गया । । - [Shriram Tiwri ]

 ऊषा की लालिमा घुली , भोर आगमन हो गया !

  जिंदगी की राह में तभी ,उनसे  मिलन हो गया !!

  दिव्यता अलौकिक हुई  ,अंजुरी में पुष्प थे खिले।
  
  उर्वरा वसुंधरा हो  गई ,दूधिया   गगन  हो गया ।।

  शब्द ओस बिंदु बन गए,  छंद खग कलरव हो गए ।

  जिजीविषा धन्य हो गई ,विचार जब अनंत हो गया।।  

  अर्थपूर्ण मन्त्र सध गए ,कर्म शंखनाद हो  गए ।  

  संघर्ष यज्ञवेदी पर ,स्वार्थ का  हवन हो गया।।

  अहम का वहम न रहा ,जब  मैं -वयम हो गया ।
                                 
  जीवन संग्राम में मेरा ,खुद से मिलन हो गया।।

  जिंदगी की राह में तभी ,उनसे मिलन हो गया।,,,,,,,,,,,,!

                     श्रीराम तिवारी

  
पुरवा हुम -हुम करे ,पछुवा गुन -गुन करे ,

  ढलती जाए शिशिर की जवानी हो।


  बीतें पतझड़ के दौर ,झूमें आमों में बौर ,

  कूँकी  कुंजन में कोयलिया कारी हो।


  उपवन खिलने लगे ,मन मचलने लगे ,

  ऋतु फागुन की आई सुहानी हो।


  करे धरती  श्रृंगार ,दिन वासंती चार,

   अली करने लगे मनमानी हो।


  फलें -फूलें दिगंत ,गाता  आये वसंत ,

  हर सवेरा नया और संध्या सुहानी हो।


               श्रीराम तिवारी

सोमवार, 15 अगस्त 2016

मेरा देश महान।




 पूरव का मानवीय दर्शन अध्यात्म ज्ञान ,पश्चिम का भौतिक विज्ञान।

 दोनों के द्वंद से नहीं संवाद से ही होगा ,  मानवमात्र का कल्याण।।

 पथ प्रदर्शक है शहीदों की शहादत ,नीति निर्देशक हमारा संविधान।

 अपने हिस्से की आहुति दें सभी ,तो निश्चय ही बनेगा  मेरा देश महान।।


  देश में सवा सौ करोड़ की आबादी ,खेलों पर अरबों रुपयों की बर्बादी।

  खेल संघों में घुसे नेता अफसर चोर,  खिलाड़ी मचाते फोकट का शोर ।।

  ये अपने घर में ही हैं सिर्फ बातों के शेर , रियो ओलम्पिक में हो गए  ढेर।

   भारत के सभासद अफसर मंत्री नादान ,केवल नीता अम्बानी बलवान ।।

   हम हैं दुनिया में लोकतंत्र और आबादी में  हीरो ,रियो में पदक मिले  जीरो।  

 

 

रविवार, 14 अगस्त 2016

अमर शहीदों को नमन

   भगतसिंह आजाद पुकारे जागो-जागो वीरो जागो।

  आजादी है ध्येय हमारा ,पीठ दिखाकर न तुम भागो।।

   बांधो कफ़न शीश पर साथी ,रिपु रण में होगी आसानी।

   स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर ,हंसते हंसते दो कुर्बानी।।

  पुरुष सिंह थे वे हुतात्मा ,जिनने मर मिटने की ठानी।

  आओ शीश नवाएं उनको ,जो थे क्रांति वीर बलिदानी।।

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

कविता -असली बारहमासा -[ रचनाकार -श्रीराम तिवारी ]

                  [१]
 
  चैत्र  गावै  चेतुवा  वैशाख गावै वनियाँ ,

  जेठ गावै रोहिणी अगनि बरसावै है।

  भवन सुलभ जिन्हें शीतल वातानुकूल ,

  बृष को तरनि तेज उन्हें न सतावै है।।

  नंगे पाँव कृषक भूँखा -प्यासा मजदूर ,

  पसीना बहाये थोड़ी छाँव को ललावै है।

 अंधड़ चलत इत झोपड़े उड़त जात ,

 बंगले से धुन उत डिस्को की आवै है।।


             [२]

 बोअनी की वेला में देर करे मानसून ,

निर्धन किसान मन शोक उपजावै है।

बंगालकी खाड़ीसे न आगे आवैं इंद्रदेव ,

वानियाँ वक्काल दाम दुगने बढ़ावै है।।

वक्त पै बरस जावें  अषढ़ा के बदरा ,

तो दादुरों की धुन पै  धरनि हरषावै है।

कारी घटा घिरआये,खेतों में बरस जाए,

सारँग की धुन सुन सारंग ही गावै है।।

               [३]

वन बाग़ खेत मैढ़ ,चारों ओर हरियाली ,

उदभिज  -गगन  अमिय झलकावै है।

पिहुं -पिहुं बोले पापी पेड़ों पै पपीहरा ,

चिर -बिरहन -मन उमंग जगावै है।।

जलधि मिलन चलीं इतराती सरिताएँ ,

गजगामिनी मानों  पिय घर जावै  है।

झूम-झूम  बरसें  सावन -सरस  घन ,

झूलने पै गोरी मेघ मल्हार गावै है।।

           [४]

 गीली -सीली लकड़ी का चूल्हा नहीं सुलगत ,

 गहर -गहर  बरसात  गहरावै है।

 एलपीजी सुविधा या सोलर इनर्जी का ,

 गाँव की गरीबनी दरस नहीं पावै है।।

 गरीबी में गीला आटा, सुरसा सी महँगाई ,

 श्रमिक गुजारे लायक मजूरी न पावै है।

 बाढ़ में ही बह गए टूटे-फूटे ठीकरे ,

डूब रही झोपड़ी पै  मौत मँडरावै है।

अभिजात्य कोठियों में परजीवी वनिता ,

भादों गोरी सेज सजन संग गावै  है।।

                 [५]

  1. धुल धुँआँ धुंध बयोम में बारूदी गंध घुली ,
  2. ऐंसी दीवाली तो सिर्फ शोहदों को सुहावै  है !
  3. रोजी के जुगाड़ की फ़िकर लागी जिनको।
  4. उत्सव उमंग उन्हें क्या खाक हुलसावै है?
  5. ख़ुशी मौज मस्ती चंद अमीरों की मुठ्ठियों में ,
  6. अडानी अंबानी  घर लक्ष्मी धन बरसावै है।
  7. कहाँ पै जलाएं,दिये अनिकेत अनगिन ,
  8. हिस्से में जिनको सिर्फ अमावश ही आवै है?


[६]

सरसों के फूल सजी धरा बनी दुलहन ,

अलसी के फूल करें अगहन से बात है ।

उड़ि उड़ि झुण्ड गगन पखेरूवा अनगिन ,

सुंदर मानसके हंसों की गति दिन रात है।।

बाजरा -ज्वार की गबोट खिली हरी भरी ,

रबी की फसल भी उगत चली आत है।

कहीं पै सिचाई होवै कहीं पै निराई होवै ,

साँझ ढले कहीं पै धौरी गैया रंभात है।।


  [७]


प्रातःही पसर गये धुंध धूल ओसकण,
पता ही न चले कब दिन ढल जावे है।
पूस की ये ठंडी रातें झोपड़ी में काटे जो,
खेत पै किसान को शीत लहर सतावे है।
कटी फटी गुदड़ी और घास फूस छप्पर ,
आशंका तुषार की नित जिया घबरावे है।
भूतकाल भविष्य या वर्तमान हर क्षण,
हर मौसम केवल सर्वहारा को सतावे है।
गर्म ऊनी वस्त्र और वातानकूलित कोठियाँ ,
लक्जरी लाइफ भॄस्ट बुर्जुआ ही पावे है।

   [८]

हेमन्त आगमन आतिथ्य ललचाये जब ,

माघ मकर संक्रांति दौड़ी चली आवै है।

फाल्गुन के संग आईं गेहुंओं में बालियाँ ,

अमुआ की डार  बौर अगनि लगावै  है।

 चम्पा कचनार बेला सेमल पलाश फूले ,

 पतझड़ तन मन अगनि लगावै  है।

 मादकता गंध लिए महुए के फूल झरें ,

 अली संग कोयल वसन्त को बुलावै है।

   [९]

  रिश्वतखोर साला भृष्ट बाबू अफसर ,

  राष्ट्र भृष्ट तंत्र कल पुर्जा बन जावै है।

  सोना चाँदी ओढ़े नोटों की माला पहनें ,

  गुलछर्रे उड़ावै और नेता कहलावै है।

 अधर्म अनीति की काली कमाई खाये ,

 सत्ता का सुख भी उन्हें  ही दुलरावै है।

 गरीब की मनेगी  कब ईद दीवाली होली ,

 कवि श्रीराम यक्ष प्रश्न दुहरावै है।