- बुरा बक्त किसी को बतलाकर नहीं आता।
- किया गया कुछ भी अपना बेकार नहीं जाता।।
- दूध के फट जाने पर दुखी होते हैं कुछ नादान,
- शायद बापरों को रसगुल्ला बनाना नहीं आता।
- खुदा क्यों देता रहता खुदाई उनको इतनी सारी ,
- जिनको अपने सिवा कुछ और नजर नहीं आता।
- माना कि अभी बहारों का असर है फिजाओं में,
- फिर भी उन्हें गुलों से यारी निभाना नहीं आता।
- वेशक किसी से कोई गिला शिकवा न हो बंधूवर,
- लेकिन रूठों को मनाना तुम्हें बिल्कुल नहीं आता ।।
- खुदा की रहमत से बुलंदियों पर मुकाम है तुम्हारा ,
- लेकिन धरती पर पाँव ज़माना तुम्हें नहीं आता।
- क्या खाक करोगे उत्थान सृजन विकास मान्यवर,
- तुम्हें तो खेतों की सोंधी सुगंध में मजा नहीं आता।
- श्रीराम तिवारी
शुक्रवार, 17 नवंबर 2017
शनिवार, 21 अक्टूबर 2017
- धुल धुँआँ धुंध बयोम में बारूदी गंध घुली ,
- ऐंसी दीवाली तो सिर्फ शोहदों को सुहावै है !
- रोजी के जुगाड़ की फ़िकर लागी जिनको।
- उत्सव उमंग उन्हें क्या खाक हुलसावै है?
- ख़ुशी मौज मस्ती चंद अमीरों की मुठ्ठियों में ,
- अडानी अंबानी घर लक्ष्मी धन बरसावै है।
- कहाँ पै जलाएं,दिये अनिकेत अनगिन ,
- हिस्से में जिनको सिर्फ अमावश ही आवै है?
- श्रीराम तिवारी
बुधवार, 20 सितंबर 2017
शब्द शक्ति आराधना !
{१}
तीज त्यौहार के दिनों मैं माता ,निर्धन जन कुछ समझ न पाता।
महँगा ईंधन सब्जी दुर्लभ आटा,शासक को कुछ समझ न आता ।।
दाल तेल चावल शक़्कर में मंत्री अफसर ,जनता का दुःख दाई है।
मेहनतकश जनता पै भारी माता ,यह सिस्टम साला हरजाई है।।
भूँख कुपोषण लाचारी में माँ ,दिन भी होते हैं कुछ लम्बे लम्बे।
संघर्षों की ज्योति जले माँ ,जय जय अम्बे जय जगदम्बे।।
[२]
मंत्री नेता अफसर बाबू ,इनपर नहीं किसी का काबू।
भले बुढ़ापा आ जाए पर,इनकी तृष्णा कभी न जाबू।।
नित नित नए चुनावी फंडे,बदल बदलकर झंडे डंडे।
राजनीती हरजाई इतनी, कि नहीं देखती संडे मंडे।।
अंधे पीसें कुत्ते खायें ,ये रीति सदा से चलि आई है।
कोटि कोटि जनता पै भारी, शासक की बरियाई है।।
भारत की धरती पर अम्बे ,जाति धर्म के हाथ हैं लम्बे ।
संघर्षों की ज्योति जले माँ ,जय जय अंबे जयजगदम्बे।।
===+======+=====
[३]
महँगी बिजली महँगा पानी ,खाद बीज की आनाकानी।
नहीं ठिकाना कृषि किसानका,भौंचक हैं सब ज्ञानी ध्यानी।।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों में जमकर, नफरत उनने फैलाई है।
गांव शहर और गली गली में.साम्प्रदायिकता ही छाई हैा।।
घोर बबाल है गौ हत्या का,धर्मांध भीड़ की कारस्तानी।
त्यौहारों पर होती अक्सर ,मजहब धरम की खींचातानी।।
वोट की खातिर अहम की शातिर खुद ही कराते नेता दंगे।
संघर्षों की ज्योति जले माँ जय जय अम्बे जय जगदम्बे।।
श्रीराम तिवारी
तीज त्यौहार के दिनों मैं माता ,निर्धन जन कुछ समझ न पाता।
महँगा ईंधन सब्जी दुर्लभ आटा,शासक को कुछ समझ न आता ।।
दाल तेल चावल शक़्कर में मंत्री अफसर ,जनता का दुःख दाई है।
मेहनतकश जनता पै भारी माता ,यह सिस्टम साला हरजाई है।।
भूँख कुपोषण लाचारी में माँ ,दिन भी होते हैं कुछ लम्बे लम्बे।
संघर्षों की ज्योति जले माँ ,जय जय अम्बे जय जगदम्बे।।
[२]
मंत्री नेता अफसर बाबू ,इनपर नहीं किसी का काबू।
भले बुढ़ापा आ जाए पर,इनकी तृष्णा कभी न जाबू।।
नित नित नए चुनावी फंडे,बदल बदलकर झंडे डंडे।
राजनीती हरजाई इतनी, कि नहीं देखती संडे मंडे।।
अंधे पीसें कुत्ते खायें ,ये रीति सदा से चलि आई है।
कोटि कोटि जनता पै भारी, शासक की बरियाई है।।
भारत की धरती पर अम्बे ,जाति धर्म के हाथ हैं लम्बे ।
संघर्षों की ज्योति जले माँ ,जय जय अंबे जयजगदम्बे।।
===+======+=====
[३]
महँगी बिजली महँगा पानी ,खाद बीज की आनाकानी।
नहीं ठिकाना कृषि किसानका,भौंचक हैं सब ज्ञानी ध्यानी।।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों में जमकर, नफरत उनने फैलाई है।
गांव शहर और गली गली में.साम्प्रदायिकता ही छाई हैा।।
घोर बबाल है गौ हत्या का,धर्मांध भीड़ की कारस्तानी।
त्यौहारों पर होती अक्सर ,मजहब धरम की खींचातानी।।
वोट की खातिर अहम की शातिर खुद ही कराते नेता दंगे।
संघर्षों की ज्योति जले माँ जय जय अम्बे जय जगदम्बे।।
श्रीराम तिवारी
शनिवार, 16 सितंबर 2017
जुदाई गीत -श्रीराम तिवारी
- जरा दिल को तसल्ली दो,आरत सुनो मेरी।
रोको रवानी को,तुम्हें जल्दी भी क्या ऐंसी।।
लगी दिल की बुझालें हम, तबतुम चले जाना।
गम अपना सुना दें हम ,तब तुम चले जाना।। - ...
- अरे चोट दिल में लगी, तुमसे बिछुड़ने की।
एक सूरत बसी दिल में,हरदम सलोनी सी।।
प्रीत अनमोल कैसी है,ए हमने अब जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।। - इतना ही था मिलन,आई वेला जुदा होने ।
होश उड़े हैं मेरे ,अंत मेरा खुदा जाने ।।
मैं जरा होश मैं आऊं ,तब तुम चले जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।। - मन हल्का तो होने दो, हम गम के मारे हैं।
हमको न भुला देना ,सदा हम तुम्हारे हैं।।
नफरतों के दौर में ,यारी को निभा जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।। - हमें गम जुदाई का,देकर के तुम चल दिए।
पलकोंमें बसाकर तुम्हें,वक्त ने छल किये।।
तुम बिन कैसे जियें, जरा ये तो बता जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।। - ये आदत पुरानी है ,गमें चोट खाने की।
जबजब जागे नसीब,आये बेला रुलाने की।।
तुमने पीर पराई को,कुछ देखा सुना जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।। - खूब चाहा तुम्हें हमने, हमको न भुला देना।
ग़मों को हमारे तुम ,अपना न बना लेना ।।
दिल का जख्म भर दे, दवा ऐंसी दे जाना।
गम अपना सुना दें हम तब तुम चले जाना।। - जुदाई गीत -श्रीराम तिवारी (मेरी पुस्तक अनामिका से)
रविवार, 3 सितंबर 2017
सबक नहीं सीखते ठोकरें खाने के बाद।
गोली असर करती है बंदूक से निकल जाने के बाद।
गाली असर करती है जुबाँ से निकल जाने के बाद।।
मेहंदी असर करती है हथेलियों से पिस जाने के बाद।
चंदन खुसबू देता है पत्थर पै खूब पिस जाने के बाद।।
संत होने का ढोंग करता है पाखंडी जेल जाने के बाद।
फ़ना हो जाता इंसान भ्रस्ट मंत्री अफसर होने के बाद।।
छाछ भी फूँककर पीते हैं गर्म दूध से जल जानेके बाद।
किन्तु मूर्खजन सबक नहीं सीखते ठोकरें खाने के बाद।।
लोग उन्हें ही क्यों चुनते हैं जो ठगते हैं चुने जाने के बाद।
आदमी आदमी का शोषण करता आदमी होने के बाद।।
श्रीराम तिवारी
शनिवार, 2 सितंबर 2017
बच नहीं पाओगे !
- हंसोगे अगर तो हँसेगी साथ दुनिया
रोओगे तो रहोगे निपट अकेले मनमार!
खुशी है ऐसी शै जो हम ढूंढते हैं बाहर ,
और गमों के भर रखें हैं भीतर भण्डार! - ठहाका लगाओ तो आसमां गूँज उठेगा ,
आह भरो तो पाओगे हर शख्स मौन है !
हर्ष उल्लासों की प्रतिध्वनियां मन पसंद,
मौन-मंद सिसकी तुम्हारी सुनता कौन है ? - खुशियां अगर बांटो तो लोग आएंगे तेरे दर,
दिखाओगे अपने गम, तो सब भाग जायेंगे !
हिस्सा आपके सुख में सभी बंटाना चाहेंगे ,
चाहते हुये भी दूसरे दु:ख नहीं बांट पायेंगे ! - सुखके दिनों में तो सब ही बन जाते मीत ,
दुःख में कोई साथ दे ढूँडते रह जाओगे !
जब तक है मौज खैरियत पूंछते रहेंगे सब,
गर्दिश में ईद के चाँद देखते रह जाओगे ! - यदि तुम कभी दावत दोगे तो भीड़ जुटेगी,
किंतु फाकें में साथ देनें कोई नही आ्येगा !
ज़िन्दगी में सब साथ देंगे,अगर सफल रहो,
मरते हुये किसी के कोई काम नहीं आयेगा !
- श्रीराम तिवारी
मंगलवार, 22 अगस्त 2017
गुल अपने खिलाये हुए हैं!
लम्बी लम्बी उड़ानों के हंस,क्रांतिपथ को सजा्ये हुए हैं।
छोड़ यादों का वो कारवां, आज ही होश आये हुए हैं ।।
साथी मिलते गये नए नए ,कुछ अपने भी पराये हुए हैं ।
फलसफा पेश है पुरनज़र को,लक्षय पै ही टिकाये हुए हैं ।।
प्राप्त आनन्द है इस फिजामें,मेघ नभ में भी छाये हुए हैं।
युग युग से जो प्यासे रहे वो ,क्षीर सिंधु में नहाये हुए हैं।।
अपनी चाहत के सब रंग बदरंग,खुद अपने सजाये हुए हैं।
औरों की खता कुछ नहीं है,गुल अपने ही खिलाये हुए हैं।।
जन्मों जन्मों किये धतकरम सब ,क़र्ज़ उसका चढ़ाए हुए हैं।
जख्म जितने भी हैं जिंदगी के, मर्ज़ अपने ही कमाए हुए हैं।।
खुद ही भूले हैं अपने ठिकाने,दोष गैरों पै ही लगाए हुए हैं।
वक्तने हमको ऐंसा कुछ मारा,कि नींद अपनी उड़ाए हुए हैं।।
श्रीराम तिवारी
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