- जरा दिल को तसल्ली दो,आरत सुनो मेरी।
रोको रवानी को,तुम्हें जल्दी भी क्या ऐंसी।।
लगी दिल की बुझालें हम, तबतुम चले जाना।
गम अपना सुना दें हम ,तब तुम चले जाना।। - ...
- अरे चोट दिल में लगी, तुमसे बिछुड़ने की।
एक सूरत बसी दिल में,हरदम सलोनी सी।।
प्रीत अनमोल कैसी है,ए हमने अब जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।। - इतना ही था मिलन,आई वेला जुदा होने ।
होश उड़े हैं मेरे ,अंत मेरा खुदा जाने ।।
मैं जरा होश मैं आऊं ,तब तुम चले जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।। - मन हल्का तो होने दो, हम गम के मारे हैं।
हमको न भुला देना ,सदा हम तुम्हारे हैं।।
नफरतों के दौर में ,यारी को निभा जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।। - हमें गम जुदाई का,देकर के तुम चल दिए।
पलकोंमें बसाकर तुम्हें,वक्त ने छल किये।।
तुम बिन कैसे जियें, जरा ये तो बता जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।। - ये आदत पुरानी है ,गमें चोट खाने की।
जबजब जागे नसीब,आये बेला रुलाने की।।
तुमने पीर पराई को,कुछ देखा सुना जाना।
गम अपना सुना दें हम, तब तुम चले जाना।। - खूब चाहा तुम्हें हमने, हमको न भुला देना।
ग़मों को हमारे तुम ,अपना न बना लेना ।।
दिल का जख्म भर दे, दवा ऐंसी दे जाना।
गम अपना सुना दें हम तब तुम चले जाना।। - जुदाई गीत -श्रीराम तिवारी (मेरी पुस्तक अनामिका से)
शनिवार, 16 सितंबर 2017
जुदाई गीत -श्रीराम तिवारी
रविवार, 3 सितंबर 2017
सबक नहीं सीखते ठोकरें खाने के बाद।
गोली असर करती है बंदूक से निकल जाने के बाद।
गाली असर करती है जुबाँ से निकल जाने के बाद।।
मेहंदी असर करती है हथेलियों से पिस जाने के बाद।
चंदन खुसबू देता है पत्थर पै खूब पिस जाने के बाद।।
संत होने का ढोंग करता है पाखंडी जेल जाने के बाद।
फ़ना हो जाता इंसान भ्रस्ट मंत्री अफसर होने के बाद।।
छाछ भी फूँककर पीते हैं गर्म दूध से जल जानेके बाद।
किन्तु मूर्खजन सबक नहीं सीखते ठोकरें खाने के बाद।।
लोग उन्हें ही क्यों चुनते हैं जो ठगते हैं चुने जाने के बाद।
आदमी आदमी का शोषण करता आदमी होने के बाद।।
श्रीराम तिवारी
शनिवार, 2 सितंबर 2017
बच नहीं पाओगे !
- हंसोगे अगर तो हँसेगी साथ दुनिया
रोओगे तो रहोगे निपट अकेले मनमार!
खुशी है ऐसी शै जो हम ढूंढते हैं बाहर ,
और गमों के भर रखें हैं भीतर भण्डार! - ठहाका लगाओ तो आसमां गूँज उठेगा ,
आह भरो तो पाओगे हर शख्स मौन है !
हर्ष उल्लासों की प्रतिध्वनियां मन पसंद,
मौन-मंद सिसकी तुम्हारी सुनता कौन है ? - खुशियां अगर बांटो तो लोग आएंगे तेरे दर,
दिखाओगे अपने गम, तो सब भाग जायेंगे !
हिस्सा आपके सुख में सभी बंटाना चाहेंगे ,
चाहते हुये भी दूसरे दु:ख नहीं बांट पायेंगे ! - सुखके दिनों में तो सब ही बन जाते मीत ,
दुःख में कोई साथ दे ढूँडते रह जाओगे !
जब तक है मौज खैरियत पूंछते रहेंगे सब,
गर्दिश में ईद के चाँद देखते रह जाओगे ! - यदि तुम कभी दावत दोगे तो भीड़ जुटेगी,
किंतु फाकें में साथ देनें कोई नही आ्येगा !
ज़िन्दगी में सब साथ देंगे,अगर सफल रहो,
मरते हुये किसी के कोई काम नहीं आयेगा !
- श्रीराम तिवारी
मंगलवार, 22 अगस्त 2017
गुल अपने खिलाये हुए हैं!
लम्बी लम्बी उड़ानों के हंस,क्रांतिपथ को सजा्ये हुए हैं।
छोड़ यादों का वो कारवां, आज ही होश आये हुए हैं ।।
साथी मिलते गये नए नए ,कुछ अपने भी पराये हुए हैं ।
फलसफा पेश है पुरनज़र को,लक्षय पै ही टिकाये हुए हैं ।।
प्राप्त आनन्द है इस फिजामें,मेघ नभ में भी छाये हुए हैं।
युग युग से जो प्यासे रहे वो ,क्षीर सिंधु में नहाये हुए हैं।।
अपनी चाहत के सब रंग बदरंग,खुद अपने सजाये हुए हैं।
औरों की खता कुछ नहीं है,गुल अपने ही खिलाये हुए हैं।।
जन्मों जन्मों किये धतकरम सब ,क़र्ज़ उसका चढ़ाए हुए हैं।
जख्म जितने भी हैं जिंदगी के, मर्ज़ अपने ही कमाए हुए हैं।।
खुद ही भूले हैं अपने ठिकाने,दोष गैरों पै ही लगाए हुए हैं।
वक्तने हमको ऐंसा कुछ मारा,कि नींद अपनी उड़ाए हुए हैं।।
श्रीराम तिवारी
अपना बाजिब हक चाहता हूँ।
- मेहनतकश सर्वहारा किसान मजदूर हूँ मैं,
हर खासोआम से कुछ कहना चाहता हूँ !
सदियों से सबकी सुन रहा हूँ मैं खामोश,
अब पूरी शिद्द्त से कुछ कहना चाहता हूँ!
वेद पुराण गीता बाइबिल कुरआन जेंदावेस्ता,
धर्मशास्त्रों के बरक्स कुछ कहना चाहता हूँ!
ईश्वर अवतारों पीरों पैगंबरों संतों महात्माओं,
बाबाओं के इतर कुछ और कहना चाहता हूँ!
समाज सुधारक नहीं हुँ, क्रांतिवीर भी नहीं मैं,
मनुष्य हूँ सो पूंछ सकते हो कि क्या चाहता हूँ?
न तख्तो ताज चाहिए ,न जन्नत न स्वर्ग मोक्ष,
सब्ज बाग छोड़ , वर्तमान को जीना चाहता हूँ ।
युगो युगों से जो बात बिसारते रहे हैं विद्वतजन,
वो बात आज सर्मायेदारों से कहना चाहता हूँ।।
मैं अपने हिस्से की धरती,हवा,पानी,आसमान ,
सूरज,चाँद,तारों में अपना बाजिब हक चाहता हूँ।
विराट अस्तित्व में मौजूद अपार सम्पदा के हरएक, - कण पर प्राणीमात्र का बराबर अधिकार चाहता हूँ।
- Shriram Tiwari
शुक्रवार, 18 अगस्त 2017
नई सुबह जरूर आएगी ।
हरएक स्याह रात के बाद ,नयी सुबह आती है।
तलाश है ज़िसकी मुझे वो मौसमे बहार आती है ।।
निहित स्वार्थ से ऊपर उठा यत्किंचित कोई कभी,
तभी धरती पर जिंदगी खुद ब खुद मुस्कराती है।
समष्टि चेतना को देकर नाम रूहानी इबादत जैसा ,
शुभ संवेदनाओं की बगिया महकने लग जाती है ।।
तान सुरीली हो और कदमताल सधे हों जिंदगी के ,
बज उठेंगे वाद्यवृन्द व्योम में भोर खिलखिलाती है !!
हर एक स्याह रात के बाद,नयी सुबह आती है !,,,,
Shriram Tiwari
गुरुवार, 17 अगस्त 2017
लुटिया डूबी अर्थतंत्र की,मुल्क फँसा हैरानी में !
माल गपागप खा गए चोटटे,कसर नहीं हैवानी में।
मंद मंद मुस्काए हुक्मराँ, गई भैंस जब पानी में।।
सुरा सुंदरी पाए सब कुछ ,सत्ता की गुड़ धानी में।
जनगण मन को मूर्ख बनाते,शासक गण आसानी में।।
लोकतंत्र के चारों खम्बे, पथ विचलित नादानी में।
लुटिया डूबी अर्थतंत्र की,मुल्क फँसा हैरानी में।।
व्यथित किसान छीजते रहते,क़र्ज़ की खींचातानी में।
कारपोरेट पूँजी की जय जय,होती ऐंचकतानी में।।
निर्धन निबल लड़ें आपस में,जाति धर्म की घानी में।
सिस्टम अविरल जुटा हुआ है,काली कारस्तानी में।।
बलिदानों की गाथा हमने, पढ़ी थी खूब जवानी में।
संघर्षों की सही दिशा है ,भगतसिंह की वाणी में।।
श्रीराम तिवारी
मंद मंद मुस्काए हुक्मराँ, गई भैंस जब पानी में।।
सुरा सुंदरी पाए सब कुछ ,सत्ता की गुड़ धानी में।
जनगण मन को मूर्ख बनाते,शासक गण आसानी में।।
लोकतंत्र के चारों खम्बे, पथ विचलित नादानी में।
लुटिया डूबी अर्थतंत्र की,मुल्क फँसा हैरानी में।।
व्यथित किसान छीजते रहते,क़र्ज़ की खींचातानी में।
कारपोरेट पूँजी की जय जय,होती ऐंचकतानी में।।
निर्धन निबल लड़ें आपस में,जाति धर्म की घानी में।
सिस्टम अविरल जुटा हुआ है,काली कारस्तानी में।।
बलिदानों की गाथा हमने, पढ़ी थी खूब जवानी में।
संघर्षों की सही दिशा है ,भगतसिंह की वाणी में।।
श्रीराम तिवारी
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