गुरुवार, 24 नवंबर 2016


हर एक स्याह रात के बाद फिर नई सुबह आती है।

घर के आँगन में कोई पेड़ हो तो गौरैया गाती है।।

तितलियाँ फुदकती हैं पतझड़ गुजर जाने के बाद भी.

चहकती चिड़िया भी सुमधुर भोर का राग सुनाती है।

कूँकती है कोयल जब कभी झूमते अमुआ की डाल पर,

किसी चिर बिरहन के कलेजे पर मानों खंजर चलाती है।

गौरैया ,तितली, चिड़िया, कोयल की कूँक और नई सुबह,

नियति के सम्पूर्ण अस्तित्व को आँगन में उतार लाती है।

तपती धरती सूखे खेत सूखे बाग़ बगीचे आसमा में बादल,

 देखदेखकर भूँखे किसान की थकान भी काफूर हो जाती है।

उसके पेट में अन्न हो और गुजारे लायक संसाधन,

तो गौरैया, तितली और कोयल उसे भी सुहाती है।

 देश -प्रदेश में सुशासन और न्यायप्रिय सिस्टम हो ,

 शोषण विहीन व्यवस्था हो तो जिंदगी कहलाती है। 

  अपनी निजी सनक को सियासत का नाम न दे कोई ,

   ये सियासत ही तो  लोकतंत्र को सुर्खरू बनाती है।  

सोमवार, 21 नवंबर 2016

क्या बाकई मेंरा देश आगे बढ़ रहा है?


  मेरा देश ,,मेरा देश ,,मेरा देश ,,,आगे बढ़ रहा है ,,,,,गरीब की रसोई से धुंआँ हट रहा है ! भारत संचार निगम लिमिटेड के किसी अधिकारी  को जब मोबाइल पर रिंग करो तो अक्सर यह देशभक्तिपूर्ण  टोन सुनाई देती है।

 देश के वर्तमान हालात को देखकर उन्हें अब यह टोन रिकार्ड कर लेना चाहिए :.........


पटरियां उखड़ रहीं हैं ,डिब्बे पलट रहे हैं।

रेल दुर्घटनाओं में लोग बेतहाशा मर रहे हैं।।

नोटबंदी के कारण  देश में मची है किल्लत ,

आबाल-बृद्ध नर-नारी कुछ बेमौत मर रहे हैं।

 बदमाश चोट्टे अपना कालाधन दिन दहाड़े ,

  पिछले दरवाजे से बाकायदा सफेद कर रहे हैं।

डालर और विश्व की करेंसी ऊपर चढ़ रही है,

मगर भारतीय  रूपये के क्यों दाम घट रहे  हैं।

सीमाओं पर जवानों का लहू  सस्ता बह रहा है  ,

और केवल सत्ताधारी नेताओं के भाव बढ़ रहे हैं।

 कौन कहता है  गरीबकी रसोईसे धुँआँ घट रहा है,

 हकीकत में तो गरीब की रसोई में चूहे मचल रहे हैं।

  यदि  बाकई मेंरा देश आगे बढ़ रहा है तो क्यों ,

  अंतर्राष्टीय सूचकांक में हम   नीचे  गिर रहे हैं।

  ये नोटबंदी  ये जुमले ये  चोंचले पाखण्ड है सब ,

  देश जड़वत है केवल  नेताओं की  तेवर बदल रहे हैं।


   श्रीराम तिवारी

 

रविवार, 20 नवंबर 2016

अचानक आधी रात के बाद। [poem by shriram tiwari]

मैं जनता हूँ हर कोई कामना पूरी नहीं होती, खुदा से दरख्वास्त के बाद।

फिर भी खुवाहिश है कि 'इंकलाब' आजाये, कभी किसी आधी रात के बाद।।

इस सिस्टम में कराह सुनता हूँ स्वप्न में भी जब, कभी किसी मजलूम की,

 मुठ्ठियाँ  भिंच जातीं हैं ,पैर से ठोकर मारता हूँ ,दीवार को आधी रात के बाद।


कुछ लोग लड़ते हुए कुछ  बिना लड़े ही 'शहीद' हो जाते हैं  सीमाओं पर ,

 राष्ट्र का सनातन शत्रु भी सीमाओं पर घात लगाये बैठा है आधी रात के बाद।

कभी- कभी संसद भंग की गयी अतीत में और स्थिगित किया गया संविधान,

थोप  दिया गया  देश पर जबरन स्याह आपातकाल आधी रात के बाद।

कभी सुनाया गया हुक्म 'नोटबंदी' का याने मौद्रिक सर्जिकल स्ट्राइक का,

देश के नवेले रहनुमाओं ने कर दिया ऎलान अचानक आधी रात के बाद।

जाने क्यों  इस देश की रेलगाडियाँ अभिशप्त हैं और उतर जातीं हैं पटरी से ,

मर जाते हैं एक साथ सैकड़ों नर -नारी आबाल बृद्ध  आधी रात के बाद।

जंगे आजादी का चुटकी भर प्रसाद भी नसीब नहीं हुआ  मेहनतकशों को, 

 जिनके पूर्वजों की कुर्बानियों से मिली थी यह आजादी आधी रात के बाद।

  श्रीराम तिवारी