गुरुवार, 30 जून 2016

गुरुडम में गच्चा खुद ही खा गए हम। [ A Poem by Shriram tiwari ]

घर से तो निकले थे खुशियाँ जुटाने ,उदास वीराने में क्यों आ गए हम।
होगा कबीलों में जंगल का क़ानून ,उसी के मुहाने पर क्यों आ गए हम ।।
कारवाँ हकालते हैं सत्ता के प्यादे , ज़माने की गर्दिश में क्यों आ गए हम ।
फर्क ही नहीं जहाँ नीति -अनीति का , खरामा- खरामा उधर आ गए हम।।
लग रही दाँव पर जिधर पांचाली , दुष्ट दुर्योधन के दरबार में आ गए हम ।...
चर्चा नहीं जन संघर्ष -क्रांति की ,ऐंसी बेजान महफ़िल में क्यों आ गए हम।।


निकले थे अपनी विपदा सुनाने , छल-छन्द के बाजार में आ गए हम ।
छकाते रहे जिस अज्ञान छाया को ,उसी की परीधि में खुद आ गए हम ।।
जो कारवाँ संवारते रहे जिंदगी भर ,उसी के निशाने पै खुद आ गए हम । 
अर्थ ही नहीं जहाँ नीति -अनीति का, बदनाम बस्ती में फिर आ गए हम।।   
लगती है जहाँ  दाँव पर पांचाली , उस धृतराष्ट्र के राज में आ गए हम।
उफ़ नहीं करते जहाँ द्रोण भीष्म कृप ,उस नापाक महफ़िल में  आ गए हम।।
चले थे जमाने को सत्पथ दिखाने ,गुरुडम से  भरपूर खुद भरमा गए हम।
दुनिया है गोल या कि इंसा की फितरत ,जहाँ से चले थे वहीँ आ गए हम।

श्रीराम तिवारी

शनिवार, 11 जून 2016

अमर शहीद आहें भर पूँछें ,क्या यह वतन हमारा है? [ A poem by -Shriram Tiwari ]


  नए  दौर  के  नए  ठगों ने ,नव उदार चोला पहना ।

 भारत देश की नीति बन गई ,शोषण को सहते रहना ।।

 सार्वजनिक सम्पत्ति  खाकर , निजी क्षेत्र बौराया है ।

 मीरजाफरों- जयचंदों का ,कठिन दौर फिर आया है ।।

 'सबको शिक्षा सबको काम दो ',मंद हुआ यह नारा है ।

 राष्ट्र निर्माण में फिर भी जुटा है ,वंचित सर्वहारा है ।।

 'भारत माता की जय' तो केवल ,भारत ही का नारा है।

 मेहनतकश जनता का नारा ,'सारा जहाँ हमारा है'।।

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स्वतंत्रता के भीषण रण में ,आशाओं के दीप जले ।

धर्मनिपेक्षता समाजवाद के ,लोकतंत्र के नीड पले ।।

जाति पाँति भाषा-मजहब ,ये शैतान के भाई सगे  ।

राजनीति की क्यारी में कुछ ,खरपतवार बबूल उगे।।

गिद्ध बाज चमगादड़ डोलें ,बोलें चमन हमारा है ।

इसीलिये तो आधा भारत , भूँख प्यास का मारा है ।।

मेहनतकश जनता का यौवन ,खटता मारा-मारा है ।

अमर शहीद आहें भर पूँछें ,क्या यह वतन हमारा है।।

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चोर -उचक्कों के कब्जे में ,जग उत्पादन  सारा है।

नहीं चेतना जन गण मन में ,न इंकलाब का नारा है ।।

कठिन दौर है मेहनतकश का ,नेता हैं नादान देश के।  

जो भी सत्ता पा जाते हैं ,कारण बनते गृहक्लेश के ।।

 राजनीति का नव घनचक्कर, वैश्वीकरण मुनाफा खोरी।

 आतंकवाद भी करता रहता ,राष्ट्रवाद से सीनाजोरी  ।।

 सभ्यताओं के वैमनस्य ने ,हिंस्र भाव को जन्म दिया ।  

 रिश्वतखोर दल्लों  ने उनको ,हथियारों से लैश किया ।। 

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 सत्ता की गुमनाम हस्तियाँ ,उड़ा रहीं हैं मौज मस्तियाँ । 

लोकतंत्र की सकल शक्तियाँ ,वसा रहीं बदनाम बस्तियाँ ।।

 विश्व मंच पर काबिज है अब ,काली पूँजी आवारा है।

 ललचाये इस नागिन को जो , एफडीआई का मारा है ।।

 सिस्टम खंडित हर स्तर पर , मण्डित भृष्ट पौबारा है।

 बागड़  व्यस्त खेत चरने में ,किसका बचा सहारा है।।

 ऊँट पटांग नीतियां जिनकी , वो शासक वेचारा है।

आबाल बृद्ध आहें भर पूँछें ,क्या यह वतन हमारा है।।

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लोकतंत्र में धनतंत्रों के ,गीत सुनाई देते हैं।




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शुक्रवार, 10 जून 2016

तीन बेर खातीं वे ,,,,,ते वे तीन बेर खातीं हैं।

जब प्याज के भाव आसमान पर होते हैं ,तो सत्ता  जमीन सूंघने लगती हैं ।
अब प्याज सड़कों पर वेभाव पडी है ,और सत्ता के पाँव जमीं पर नहीं हैं।।

इन पंक्तियों को लिखते ही मुझे अचानक कविवर 'भूषण ' याद आ गए। मुझे लगता है कि ' साहित्य समाज का दर्पण 'नहीं होता बल्कि वह 'देश काल परिस्थिति और सभ्यताओं के उत्थान-पतन का आइना हुआ करता है। यही वजह है कि सामन्त युगीन रचनाएं तो सर्वकालिक और कालजयी प्रतीत होती हैं और वर्तमान वैज्ञानिक अनुसन्धान आधारित रचना कर्म नित्य नाशवान  महसूस होता है। शायद इसीलिये वर्तमान तीव्रगामी -परिवर्तनशील -द्वन्दात्मक दौर में , सार्वभौम सत्य को निरुपित करते हुए , कालजयी रचनाओं का सृजन अतयन्त दुरूह  हो चला है। जबकि अतीत के सामन्तयुगींन अथवा पुरातन साहित्यिक परिवेश में ,खास तौर से हिन्दी साहित्य  में रीतिकालीन कवियों के सृजन ने सर्वकालिक नीति बोध ,मानवीय सौंदर्य बोध और मानव जीवन  की  बिडंबनाओं को भी कालजयी रचनाओं में पिरोया है। कविवर भूषण का एक मशहूर कवित्त -छन्द है ,जो कि अक्सर  हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों को 'यमक' अलंकार समझाने के बतौर उदाहरण - प्रस्तुत किया जाता है।

''ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाने वारी ,ते वे ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहातीं हैं।
विजन डुलातीं वे ,,,,,,,,,,,,, ,,,,,,,,,,,,,,,,  ते वे विजन डुलातीं हैं।।
तीन बेर  खातीं  वे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,ते वे तीन बेर खातीं  हैं।  ''

चूँकि कविवर  भूषण भी बिहारी या केशवदास जैसे  दरवारी और चारण कवि ही थे। इसलिए उन्हें उनके आका -सामन्तों के युध्दों और उनकी 'प्रियतमाओं ' के नख-शिख सौंदर्य वर्णन से ही फुरसत नहीं मिली। अतः महँगाई  के बारे में ,किसानों -मजूरों के बारे में ,दालों के बारे में ,सब्जियों या प्याज के बारे में उन्होंने कुछ भी नहीं लिखा। फिर भी कविवर भूषण का उक्त कालजयी छन्द लोक व्यवहार में अब भी व्यवहृत देखा जा सकता है। मध्यप्रदेश में इस साल प्याज की बम्फर फसल ने किसानों को बर्बाद कर दिया है।  मंडी में एक रुपया किलो भाव में भी खरीददार नहीं मिल रहे हैं। प्याज को लेकर जो मारामारी मची है उससे कवि भूषण का उक्त छप्यय् छन्द  पुनः याद आ रहा है। आप भी गौर फरमाएं :-

श्रीराम तिवारी ;-