मंगलवार, 24 मई 2016

जीवन यापन संघर्षों में यदि इंसानियत न भूल पाए । [A poem by :-Shriram Tiwari ]



    बल पौरुष और सत्ता यदि किसी कमजोर के काम आये ।

    जवानी यदि  देश की सीमाओं पर बल-पौरुष दिखलाये ।।

    मानव सत्य-न्याय का सिंहनाद करे क्रांति के गीत गाए। 

    कृषकाय युवा  खेतों में यदि अपना श्रम स्वेद बहाए ।।

    जीवन यापन संघर्षों में यदि  इंसानियत न भूल पाए ।

   लोभ-लालच की भृष्ट व्यवस्था का पुर्जा न बन जाए ।।

   'जनवादी कवि' इसको ही मानव अनुशासन कहते हैं ।

   योगीजन  शायद इसको शरीर अनुशासन कहते हैं।।

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  जिस धीरोदात्त चरित्र सिंहनाद से अन्यायी थर्राते हैं।

  अमृतवाणी समरसता की शब्द क्रांति दूत बन जाते हैं ।।

  वो सिंहनाद जिससे कि  हर युग में नव मानव ढलते हैं  ।

  जन महानाद  संगीत कला साहित्य सृजन करते हैं।।

  'सत्यम शिवम् सुंदरम' भी जब इंकलाब बन जाते  हैं ।

  'जनवादी कवि 'उसको ही जनक्रांति सुशासन कहते हैं।।

  योगीजन शायद उसको केवल बाचानुशासन कहते हैं ।

एक खास परिवार के भरोसे रहने के कारण कांग्रेस लोकतंत्र से महरूम हो गयी है।

  कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने टवीट किया है कि ''कांग्रेस उस बरगद के बृक्ष की तरह है ,जिसकी छाँव हिन्दू,मुस्लिम ,सिख ,ईसाई सबको बराबर मिलती है ,जबकि भाजपा तो जात -धर्म  देखकर  छाँव देती है। ''

  बहुत सम्भव है कि खुद कांग्रेस समर्थक प्रबुद्ध जन ही मनु अभिषक संघवी से सहमत नहीं होंगे ! इस विमर्श में भाजपा वालों के समर्थन की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती। उन्होंने ऐंसी साम्प्रदायिक घुट्टी पी रखी है कि जिसके असर से उन्हें 'भगवा' रंग के अलावा  'चढ़े न दूजो रंग '! दरसल मनु अभिषेक ने अपने ट्वीट में जो कहा वह तो कांग्रेस के विरोधी अर्से से कहते आ रहे हैं। इसमें नया क्या है ? कांग्रेस रुपी नाव में ही छेद करते हुए सिंघवी यह भूल गए कि भारतीय कांग्रेस  महज एक राजनीतिक पार्टी नहीं बल्कि एक खास विचारधारा का नाम है। खैर कांग्रेस की चिंता जब कांग्रेसियों को नहीं तो हमारे जैसे आलोचकों को क्या पडी कि व्यर्थ शोक संवेदना व्यक्त करते रहें !

मनु अभिषेक सिंघवी  ने शायद हिंदी की  यह  मशहूर कहावत नहीं सुनी  की ''बरगद के पेड़ की छाँव में हरी दूब भी नहीं उगा करती '' अर्थात  किसी विशालकाय व्यक्ति ,वस्तु या गुणधर्म के समक्ष  नया विकल्प पनप नहीं सकता ! कुछ पुरानी चीजें ऐंसी होतीं हैं कि कोई नई चीज कितनी भी चमकदार या उपयोगी क्यों न हो ,किन्तु फिर भी वह  पुरानी के सामने  टिक ही नहीं पाती। राजनीती  में इसका भावार्थ यह भी है कि  कुछ दल या नेता   ऐंसे  भी होते हैं कि उनकी शख्सियत के सामने  नए-नए दल या नेता पानी भरते हैं। इसका चुनावी जीत-हार से कोई लेना-देना नहीं। समाज में इस कहावत का तातपर्य यह है कि दवंग व्यक्ति या  दवंग समाज के नीचे दबे हुए व्यक्ति या समाज का उद्धार  तब तक सम्भव नहीं ,जब तक वे उसके आभा मंडल से मुक्त न हो  जाए ।

 हालाँकि काग्रेस  की उपमा बरगद के पेड़ से  करना एक कड़वा सच है ,किन्तु सिंघवी द्वारा कहा जाना एक बिडंबना है।  यह आत्मघाती गोल करने जैसा कृत्य है।  मनु अभिषेक सिंघवी जैसा आला दर्जे का बकील  यदि  कांगेस को बरगद बताएगा तो कांग्रेस मुक्त भारत की  कामना  करने वालों की तमन्ना पूर्ण होने में संदेह क्या ?  वैसे भी आत्म हत्या करने वाले गरीब किसान ,वेरोजगार युवा ,गरीब छात्र और असामाजिकता से पीड़ित कमजोर वर्ग के नर-नारियों  की नजर में कांग्रेस और भाजपा एक ही सिक्के के दो  पहलु  हैं। लेकिन मेरी नजर में भाजपा और कांग्रेस में  बहुत अंतर् है। भाजपा घोर साम्प्रदायिक दक्षिणपंथी पूँजीवादी  पार्टी  है ,जो मजदूरों ,अल्पसंख्यकों और प्रगतिशील वैज्ञानिकवाद से घ्रणा करती है ,और  अम्बानियों-अडानियों ,माऌयाओं की सेवा में यकीन रखती है।  कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष  उदारवादी पूंजीवादी पार्टी  है। एक खास परिवार के भरोसे  रहने के कारण  वह लोकतंत्र से महरूम हो गयी है।  वैसे कांग्रेस वालों को बिना जोर -जबर्जस्ती  के जो कुछ मिला उसी में संतोष कर लिया करते हैं । उन्होंने ईमानदारी या देशभक्ति का ढोंग भी नहीं किया। देशभक्ति का झूंठा हो हल्ला भी नहीं मचाया। जबकि भाजपा वाले  कंजड़ों की भांति दिन दहाड़े डाके डालने में यकीन करते हैं।  इसका एक उदाहरण तो यही है कि जब  घोषित डिफालटर अडानी को आस्ट्रेलिया में किसी उद्द्य्म के लिए बैंक गारंटी की जरूरत पडी तो एसबीआई चीफ अरुंधति भट्टाचार्य और खुद पीएम भी साथ गए थे। क्या कभी इंदिरा जी राजीव जी या मनमोहन सिंह ने ऐंसा किया ? देश के १०० उद्योगपति ऐंसे हैं जो भारतीय बैंकों के डिफालटर हैं और बैंकों का १० लाख करोड़  रुपया डकार गए हैं ।  कोई  भी लुटेरा पूँजीपति  एक पाई लौटाने को  तैयार नहीं है ,सब विजय माल्या के बही बंधू हैं। जबकि गरीब किसान को हजार-पांच सौ के कारण बैंकों की कुर्की का सामना करना पड़ रहा है ,आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। मोदी सरकार बिना कुछ किये धरे ही अपने  दो साल की काल्पनिक उपलब्धियों के बखान में राष्टीय कोष का अरबों रुपया  विज्ञापनों में बर्बाद कर रही है। दलगत आधार पर साम्प्रदायिकता की भंग के नशे में चूर होकर  हिंदुत्व के ध्रुवीकरण में व्यस्त हैं ,मदमस्त हैं । जबकि मनु अभिषेक सिंघवी,दिग्गी राजा ,थरूर और अन्य दिग्गज कांग्रेसी केवल आत्मघाती गोल दागने में व्यस्त हैं।  कांग्रेस की मौसमी हार से भयभीत लोग भूल रहे हैं कि  कांग्रेस ने स्वाधीनता संग्राम का अमृत फल चखा है उसे  कोई नष्ट नहीं कर सकता , खुद गांधी ,नेहरू,पटेल भी  नहीं ! मोदी जी और संघ परिवार तो  कदापि नहीं ! श्रीराम  तिवारी

रविवार, 22 मई 2016

कौन -कौन तर गए ,कुम्भ के नहाए से ,मीन न तरी जाको गंगा में घर है ,,,[संत कबीर ]


लगभग एक माह तक चला उज्जैन सिंहस्थ  मेला -पर्व समाप्त हो चूका है । कुछ अखवार वाले और न्यूज चैनल वाले  जिन्हे मध्य प्रदेश सरकार ने खूब ठूंस -ठूंसकर खिलाया है,इस सिंहस्थ को ऐतिहासिक रूप से सफल बता रहे हैं।  केवल श्रद्धालु स्नानार्थी ही नहीं ,धर्मांध लाभार्थी ही नहीं  ,साधु -संत -महंत ज्ञानी -ध्यानी ही नहीं ,अपितु इस सिंहस्थ पर्व के तमाम प्रत्यक्ष और परोक्ष  'स्टेक होल्डर्स' भी इस सिंहस्थ मेले का गुणगान करते हुए ,अपना-अपना बोरिया विस्तर बांधकर  लौट चुके हैं । भारत के ज्ञात इतिहास में अब तक शायद ही किसी  राजा ने ,किसी सामन्त ने ,किसी राज्य सरकार ने ,किसी मुख्य्मंत्री ने - कुम्भ-सिंहस्थ के निमित्त इस कदर -अविरल आदरभाव,  समर्पण और आर्थिक वित्त पोषण किया हो ! शिवराज जैसा मन-बचन -कर्म सेराजकीय समर्पण शायद ही किसी  शासक ने  कभी  न्यौछावर किया हो !

मध्यप्रदेश के मौजूदा मुख्य्मंत्री शिवराज सिंह चौहान  ने सांस्कृतिक , सामाजिक एवं आध्यात्मिक संगम -सिंहस्थ पर्व की सफलता  के निमित्त जो किया है,उसकी मिशाल भारत में  तो क्या दुनिया में भी नहीं मिलेगी।  बहरहाल उनके इस सकाम भक्तिभाव से 'संघ परिवार'  गदगदायमान है। भगवान महाकाल  और  शिप्रा +नर्मदा मैया भी शिवराज पर अवश्य ही प्रशन्न होंगी ! तमाम मठाधीश ,साधु , संत ,महंत,शंकराचार्य ,महामंडलेश्वर , व्यापारी,ठेकेदार,अधिकारी -सभी शिवराज से खुश हैं । पीएम नरेंद्र मोदी जी भी  मध्यप्रदेश के नैनावा ज्ञान कुम्भ में शिवराज जी की तारीफ कर गए -अर्थात ''मोगेम्बो खुश हुआ ''!भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और इन सबके मुकुट मणि सर  संघ संचालक -महानुभाव मोहनराव भागवत ,एवं संघ गणांनाम्  सर्वश्री अनिल माधव दवे,राम माधव, भैया जी जोशी  इत्यादि  भी सिंहस्थ नहाकर शिवराज से  प्रशन्न भए !  इसमें कोई शक नहीं कि भगवान शिव खुद ही शिवराज के मार्ग की समस्त बाधाओं  को  दूर कर अभय दान  देने को लालायित हो रहे होंगे ! आकाशवाणी होने को है कि  हे तात - तुम्हारी सत्ता की  कुर्सी सुरक्षित रहे । न केवल कुर्सी सुरक्षित रहे बल्कि आगामी   चुनाव में  भी शिवराज को अंदर-बाहर  से कोई चुनौती न रहे ! एवमस्तु !  हालांकि  भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव  कैलाश विजयवर्गीय  भी महाकाल के उद्भट उपासक हैं अतएव उनके उदगार कि ' सिंहस्थ की सफलता किसी एक व्यक्ति या सरकार की बदौलत नहीं है बल्कि यह  तो महाकाल की कृपा से ही सम्भव हुआ है ।  कैलाश जी के अमृत रुपी बचनामृत से भाजपा की  राजनीतिक़  हांडी का आंतरिक तापमान ज्ञातव्य हो रहा है। उनके आशय को रहीम कवि  अपने दोहे में पहले ही समझा गए हैं ,,,

अमृत जैसे बचन में ,रहिमन रिस की गाँठ।
 जैसे मिश्री में मिली ,निअर्स बांस की गांठ।।


 खैर यह तो  'मुण्डे -मुण्डे मतरिभिन्ना' वाली कहावत  ही चरितार्थ हुई है ,मुझे तो इस कुम्भ -सिंहस्थ का  अंतिम दृश्य कुछ  यौं जान पड़ता है :-


ख़त्म हुआ जलसा अभी ,संगत उठी जमात।
अब निरीह निर्बल बचे ,तम्बू और कनात।।

इन मजदूरों ने किया ,यह सब बंदोबस्त।
भूंखे-प्यासे  जुटे रहे ,महीनों हालत खस्त। ।

जो बतलाते हैं हमें ,स्वर्ग प्राप्त तरकीब।
 उन  परजीवी धूर्त से ,मेरा  वतन गरीब।।

होटल हो या खेत हो ,फैक्टरी खलिहान।
मुफलिस बच्चों के लिए ,कैसा कुम्भ स्नान। ।

संत कबीर को भी जब कभी इसी तरह के दौर से गुजरना पड़ा होगा तो उन्होंने  निम्नलिखित भजन लिखा मारा !

कौन -कौन तर गए ,कुम्भ के नहाए से ,मीन न तरी जाको गंगा में घर है।
कौन-कौन तर गए भभूति लगाए से ,श्वान ने तरो  जाको घूरे पै  घर है।

कौन -कौन तर गए धूनी  रमाए से ,तिरिया ने तरी जाको  चूल्हे में घर है।
कौन -कौन तर गए ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,तरेंगे वही जिनके ह्रदय में हर है।।



कबीर का यह भजन बचपन में सुना था ,,अब विस्मृत हो चुका  है ,लेकिन कबीर के आशय से पूरी तरह विज्ञ हूँ और उसमें आस्था भी है। यही वजह है कि
६३ साल की उम्र में एक भी कुम्भ नहीं नहाया।  मैं  २८ मई- १९७६ को  ट्रांसफर होकर गाडरवारा से इंदौर  आया था ।  इंदौर आये हुए  पूरे चालीस साल हो गए ! यहाँ से उज्जैन  सिर्फ ५५  किलोमीटर है , और नासिक भी  ज्यादा दूर नहीं है ,किन्तु कभी  कोई कुम्भ -सिंहस्थ स्नान नहीं किए । दरसल इसकी जरूरत ही नहीं समझ पडी ! दोस्तों और सपरिजनों ने  भी बहुत मनाया-फुसलाया   किन्तु दिल है कि मानता नहीं । यद्द्पि मैं कुम्भ मेला , तीर्थटन  नदियों में पर्व स्नान को गलत नहीं मानता। अपितु मानवीय सांस्कृतिक जीवंतता के लिए उपयुक्त साधन  समझता हूँ । किन्तु राज्यसत्ता द्वारा राजकाज छोड़कर केवल  इस तरह के  धार्मिक मेगा इवेंट्स का वित्तपोषण किये जाने का औचित्य मुझे समझ में नहीं आया !  मनुष्य जीवन की शुचिता ,आत्मिक पवित्रता ,कष्ट मुक्ति ,पुण्यलाभ इत्यादि के निमित्त किसी भी व्यक्ति की अहेतुक आध्यात्मिक यात्रा उसका अपना व्यक्तिगत अधिकार है। और उसकी मनोवृत्ति आस्तिक-नास्तिक कुछ भी हो सकती है ,किन्तु  एक गरीब देश या प्रदेश में  केंद्र-राज्य सरकार और शासन-प्रशासन की सम्पूर्ण सामर्थ्य एवं वित्तीय संसाधनों का इस तरह बेजा दुरूपयोग मुझे कतई पसंद नहीं आया  !  श्रीराम तिवारी

सोमवार, 9 मई 2016

उनके दावे पर एतवार कौन करे ? [poem -by Shriram Tiwari]


बुलंदियों पर  है मुकाम उनका, फिर भी मुस्कराना नहीं आता।

दुनिया भर की खुशियाँ नसीब हैं. बस खिलखिलाना नहीं आता।

न जाने  क्यों देता है  खुदा उन्हें  खुदाई और प्रभु इनको प्रभुता ,

जिन्हें अपनी आभासी  छवि के अलावा कुछ और नजर नहीं आता।

 वक्त और सियासत ने  बख्स दी उनको शख्सियत कुछ ऐंसी कि

 श्मशान की लपटें  और सूखे खेतों का धुआँ उन्हें नजर नहीं आता।

 माना कि मौसमें बहार आई है  उनके जीवन की बगिया महक उठी ,

 लेकिन  काली स्याह रातों के अँधेरे पर रौब  ज़माना उन्हें  नहीं आता।

 उनके दावे पर एतवार कौन करे की शबे-रात के हमसफर होंगे  ?

  उन्हें तो  शायद अपने ही रूठे हुओं को मनाना  नहीं  आता।


                   श्रीराम तिवारी

रविवार, 8 मई 2016

जबसे हवाओं का रुख बदलने लगा है,,,! [poem by Shriram Tiwari ]


 जो भी चाहा वो नहीं मिला फिर भी कोई कोई गम नहीं ।

 बिना किसी वैशाखी के चल सके  यह भी तो कम नहीं।। 

 कदम जो भी आगे बढे और अनजानी राहों पर तन्हा चले ,

  कई बार ठोकरें खाईं और जीते भी  ये कुछ कम  तो नहीं ।

  संकल्पों की ऊँची उड़ानों  पर बज्रपात  हुआ बार-बार किन्तु  ,

  हौसले  बुलंद रख्खे और हार नहीं मानी यह भी  कुछ कम नहीं ।

   बक्त ने जो चाहा कराया और जमाने ने खूब  कहर बरपाया ,

   जीने की जद्दोजहद में इंसानियत नहीं भूले यह कुछ कम नहीं ।

    जबसे हवाओं का रुख बदलने लगा है, मन कुछ डरने लगा है ,

    हर वक्त चौकन्ना हूँ कि आस्तीन में कहीं कोई साँप तो नहीं।


                   श्रीराम तिवारी