{१}
तीज त्यौहार के दिनों मैं माता ,निर्धन जन कुछ समझ न पाता।
महँगा ईंधन सब्जी दुर्लभ आटा,शासक को कुछ समझ न आता ।।
दाल तेल चावल शक़्कर में मंत्री अफसर ,जनता का दुःख दाई है।
मेहनतकश जनता पै भारी माता ,यह सिस्टम साला हरजाई है।।
भूँख कुपोषण लाचारी में माँ ,दिन भी होते हैं कुछ लम्बे लम्बे।
संघर्षों की ज्योति जले माँ ,जय जय अम्बे जय जगदम्बे।।
[२]
मंत्री नेता अफसर बाबू ,इनपर नहीं किसी का काबू।
भले बुढ़ापा आ जाए पर,इनकी तृष्णा कभी न जाबू।।
नित नित नए चुनावी फंडे,बदल बदलकर झंडे डंडे।
राजनीती हरजाई इतनी, कि नहीं देखती संडे मंडे।।
अंधे पीसें कुत्ते खायें ,ये रीति सदा से चलि आई है।
कोटि कोटि जनता पै भारी, शासक की बरियाई है।।
भारत की धरती पर अम्बे ,जाति धर्म के हाथ हैं लम्बे ।
संघर्षों की ज्योति जले माँ ,जय जय अंबे जयजगदम्बे।।
===+======+=====
[३]
महँगी बिजली महँगा पानी ,खाद बीज की आनाकानी।
नहीं ठिकाना कृषि किसानका,भौंचक हैं सब ज्ञानी ध्यानी।।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों में जमकर, नफरत उनने फैलाई है।
गांव शहर और गली गली में.साम्प्रदायिकता ही छाई हैा।।
घोर बबाल है गौ हत्या का,धर्मांध भीड़ की कारस्तानी।
त्यौहारों पर होती अक्सर ,मजहब धरम की खींचातानी।।
वोट की खातिर अहम की शातिर खुद ही कराते नेता दंगे।
संघर्षों की ज्योति जले माँ जय जय अम्बे जय जगदम्बे।।
श्रीराम तिवारी
तीज त्यौहार के दिनों मैं माता ,निर्धन जन कुछ समझ न पाता।
महँगा ईंधन सब्जी दुर्लभ आटा,शासक को कुछ समझ न आता ।।
दाल तेल चावल शक़्कर में मंत्री अफसर ,जनता का दुःख दाई है।
मेहनतकश जनता पै भारी माता ,यह सिस्टम साला हरजाई है।।
भूँख कुपोषण लाचारी में माँ ,दिन भी होते हैं कुछ लम्बे लम्बे।
संघर्षों की ज्योति जले माँ ,जय जय अम्बे जय जगदम्बे।।
[२]
मंत्री नेता अफसर बाबू ,इनपर नहीं किसी का काबू।
भले बुढ़ापा आ जाए पर,इनकी तृष्णा कभी न जाबू।।
नित नित नए चुनावी फंडे,बदल बदलकर झंडे डंडे।
राजनीती हरजाई इतनी, कि नहीं देखती संडे मंडे।।
अंधे पीसें कुत्ते खायें ,ये रीति सदा से चलि आई है।
कोटि कोटि जनता पै भारी, शासक की बरियाई है।।
भारत की धरती पर अम्बे ,जाति धर्म के हाथ हैं लम्बे ।
संघर्षों की ज्योति जले माँ ,जय जय अंबे जयजगदम्बे।।
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महँगी बिजली महँगा पानी ,खाद बीज की आनाकानी।
नहीं ठिकाना कृषि किसानका,भौंचक हैं सब ज्ञानी ध्यानी।।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों में जमकर, नफरत उनने फैलाई है।
गांव शहर और गली गली में.साम्प्रदायिकता ही छाई हैा।।
घोर बबाल है गौ हत्या का,धर्मांध भीड़ की कारस्तानी।
त्यौहारों पर होती अक्सर ,मजहब धरम की खींचातानी।।
वोट की खातिर अहम की शातिर खुद ही कराते नेता दंगे।
संघर्षों की ज्योति जले माँ जय जय अम्बे जय जगदम्बे।।
श्रीराम तिवारी
