तुम्हारे उजबक फैसलों से ,आवाम घबराई है।
और खुद तुम्हारे चेहरे पर ही घबराहट छाई है।।
गरीबों को यकीन नहीं तुम पर,हे अम्बानी मित्र !
वादाखिलाफी की क्या तुमने कोई कसम खायी है?
तुम अपने ही घर में आग लगाकर ताप रहे हो ,
पूंछ सकते हैं कि विध्वंशक अक्ल कहाँ पाई है ?
बड़े परिश्रमी, साहसी, देशभक्त स्वाभिमानी हो,
लेकिन तुम्हारे धतकर्मों से अमीरोंकी बन आई है।
जर्जर है मुल्क और सदियों से बीमार भी लेकिन,
ये कैसा इलाज कर रहे हो कि जान पै बन आई है।
मझधार में डूबती कस्ती ,तुम्हें नोटबंदी की पडी है ,
रेल दुर्घटनाओं का चीत्कार, सुनो दुहाई है दुहाई है।
रोजगार नहीं ,घर नहीं ,आजीविका नहीं जिनके पास,
उन्हें ऐंड्रायड फोन एटीम कैशलेश सब हवा हवाई है
श्रीराम तिवारी
