शनिवार, 17 दिसंबर 2016

विध्वंशक अक्ल कहाँ पाई है ?



तुम्हारे उजबक फैसलों से ,आवाम घबराई है।

और खुद तुम्हारे चेहरे पर ही घबराहट छाई है।।

 गरीबों को यकीन नहीं तुम पर,हे अम्बानी मित्र  !

 वादाखिलाफी की क्या तुमने कोई कसम खायी है?

 तुम अपने ही घर में आग लगाकर  ताप रहे हो ,

पूंछ सकते हैं कि विध्वंशक अक्ल कहाँ पाई है ?

 बड़े परिश्रमी, साहसी, देशभक्त स्वाभिमानी हो,

 लेकिन तुम्हारे धतकर्मों से अमीरोंकी बन आई है।

 जर्जर है मुल्क और सदियों से बीमार भी लेकिन,

 ये कैसा इलाज कर रहे हो कि जान पै बन आई है।

 मझधार में डूबती कस्ती ,तुम्हें नोटबंदी की पडी है ,

रेल दुर्घटनाओं का चीत्कार, सुनो दुहाई है दुहाई है।

 रोजगार नहीं ,घर नहीं ,आजीविका नहीं जिनके पास,

 उन्हें ऐंड्रायड फोन एटीम कैशलेश सब हवा हवाई है

 श्रीराम तिवारी




मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

वैज्ञानिक अनुसंधान बहुत हैं।


 हर शख्स को जांचने -परखने के संसाधन  बहुत हैं।

 तूफ़ान में  दिए को भी जलाये रखने के ठिये बहुत हैं।। 

 है जहाँ पर पतनशील अधोगामी भृष्ट शासन व्यवस्था  , 

  पूँजीवादी लोकतंत्र में जनाक्रोश  के बहाने  बहुत हैं।

  सदियाँ गुजर गयीं मानव सभ्यता  को संवारने में,

  नैतिक मूल्यों  को सुरक्षित बचाने के कारण बहुत हैं।

  अमानवीय सिस्टम को ध्वस्त करने के अनेक तरीके हैं ,

  बदतर हालत से निपटने के वैज्ञानिक अनुसंधान बहुत हैं।

  रूप आकार नाक नक़्शे की ही शल्यक्रिया क्यों की जाए  ?    

   शोषण उत्पीड़न अन्याय अत्याचार के ठिकाने  बहुत हैं।

  श्रीराम तिवारी

सोमवार, 12 दिसंबर 2016


 फूल थे, रंग थे ,लम्हों की सबाहत हम थे ,

ऐंसे जिन्दा थे कि जीने की अलामत हम थे ,

अब तो खुद अपनी जरूरत भी नहीं है हमको ,

वो  दिन भी थे कि कभी उनकी जरूरत हम थे।


[एतबार साजिद की कलम से ]