मंगलवार, 22 अगस्त 2017

गुल अपने खिलाये हुए हैं!


लम्बी लम्बी उड़ानों के हंस,क्रांतिपथ को सजा्ये हुए हैं।
छोड़ यादों का वो कारवां, आज ही होश आये हुए हैं ।।
साथी मिलते गये नए नए ,कुछ अपने भी पराये हुए हैं ।
फलसफा पेश है पुरनज़र को,लक्षय पै ही टिकाये हुए हैं ।।
प्राप्त आनन्द है इस फिजामें,मेघ नभ में भी छाये हुए हैं।
युग युग से जो प्यासे रहे वो ,क्षीर सिंधु में नहाये हुए हैं।।
अपनी चाहत के सब रंग बदरंग,खुद अपने सजाये हुए हैं।
औरों की खता कुछ नहीं है,गुल अपने ही खिलाये हुए हैं।।
जन्मों जन्मों किये धतकरम सब ,क़र्ज़ उसका चढ़ाए हुए हैं।
जख्म जितने भी हैं जिंदगी के, मर्ज़ अपने ही कमाए हुए हैं।।
खुद ही भूले हैं अपने ठिकाने,दोष गैरों पै ही लगाए हुए हैं।
वक्तने हमको ऐंसा कुछ मारा,कि नींद अपनी उड़ाए हुए हैं।।

श्रीराम तिवारी


अपना बाजिब हक चाहता हूँ।

  1. मेहनतकश सर्वहारा किसान मजदूर हूँ मैं,
    हर खासोआम से कुछ कहना चाहता हूँ !
    सदियों से सबकी सुन रहा हूँ मैं खामोश,
    अब पूरी शिद्द्त से कुछ कहना चाहता हूँ!
    वेद पुराण गीता बाइबिल कुरआन जेंदावेस्ता,
    धर्मशास्त्रों के बरक्स कुछ कहना चाहता हूँ!
    ईश्वर अवतारों पीरों पैगंबरों संतों महात्माओं,
    बाबाओं के इतर कुछ और कहना चाहता हूँ!
    समाज सुधारक नहीं हुँ, क्रांतिवीर भी नहीं मैं,
    मनुष्य हूँ सो पूंछ सकते हो कि क्या चाहता हूँ?
    न तख्तो ताज चाहिए ,न जन्नत न स्वर्ग मोक्ष,
    सब्ज बाग छोड़ , वर्तमान को जीना चाहता हूँ ।
    युगो युगों से जो बात बिसारते रहे हैं विद्वतजन,
    वो बात आज सर्मायेदारों से कहना चाहता हूँ।।
    मैं अपने हिस्से की धरती,हवा,पानी,आसमान ,
    सूरज,चाँद,तारों में अपना बाजिब हक चाहता हूँ।
    विराट अस्तित्व में मौजूद अपार सम्पदा के हरएक,
  2. कण पर प्राणीमात्र का बराबर अधिकार चाहता हूँ। 
  3. Shriram Tiwari

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

नई सुबह जरूर आएगी ।


हरएक स्याह रात के बाद ,नयी सुबह आती है।
तलाश है ज़िसकी मुझे वो मौसमे बहार आती है ।।
निहित स्वार्थ से ऊपर उठा यत्किंचित कोई कभी,
तभी धरती पर जिंदगी खुद ब खुद मुस्कराती है।
समष्टि चेतना को देकर नाम रूहानी इबादत जैसा ,
शुभ संवेदनाओं की बगिया महकने लग जाती है ।।  
तान सुरीली हो और कदमताल सधे हों जिंदगी के ,
बज उठेंगे वाद्यवृन्द व्योम में भोर खिलखिलाती है !!
हर एक स्याह रात के बाद,नयी सुबह आती है   !,,,,
Shriram Tiwari


गुरुवार, 17 अगस्त 2017

लुटिया डूबी अर्थतंत्र की,मुल्क फँसा हैरानी में !

 माल गपागप खा गए चोटटे,कसर नहीं हैवानी में।

 मंद मंद मुस्काए हुक्मराँ, गई भैंस जब पानी में।।

 सुरा सुंदरी पाए सब कुछ ,सत्ता की गुड़ धानी में।

 जनगण मन को मूर्ख बनाते,शासक गण आसानी में।।

 लोकतंत्र के चारों खम्बे, पथ विचलित नादानी में।

 लुटिया डूबी अर्थतंत्र की,मुल्क फँसा हैरानी में।।

 व्यथित किसान छीजते रहते,क़र्ज़ की खींचातानी में।

 कारपोरेट पूँजी की जय जय,होती ऐंचकतानी में।।

 निर्धन निबल लड़ें आपस में,जाति धर्म की घानी में।

 सिस्टम अविरल जुटा हुआ है,काली कारस्तानी में।।

 बलिदानों की गाथा हमने, पढ़ी थी खूब जवानी में।

 संघर्षों की सही दिशा है ,भगतसिंह की वाणी में।।

  श्रीराम तिवारी