शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

हम उसको अवाम के पक्ष में नहीं समझते।

जिंदगी के कुछ काम दुआओं के भरोसे नहीं चलते।
बैटरी चार्ज न हो तो मोबाईल कम्प्यूटर नहीं चलते।।
लिखने के लिए और भी गम हैं जिंदगी के ज़माने में ,
इसलिए हम कसमें वादे प्यार बफा पर नहीं लिखते !!
बड़े पद जातीय सियासत से सुर्खुरू हो रहे इन दिनों , ...
हम इसको लोकतन्त्र के हित में कदापि नही समझते !!
जाने क्यों प्रतिस्परधी दौड़ में उतावला है हर शख्स,
खुशनसीब हैं वे जो इस पचडे में ज़रा भी नहीं फसते !!


:-Shriram Tiwari

बुधवार, 5 जुलाई 2017

नंगे भूंखे को तो -सारा जहाँ हमारा है !


स्वतंत्रता के भीषण रण में ,सपने देख लड़ी आवाम।
आजादी के बाद मिलेगा ,सबको शिक्षा सबको काम।।

 काम के होंगे निश्चित घंटे ,और मेहनत के पूरे दाम।
 आजादी के बरसों बाद भी,मुल्क हुआ सबमें नाकाम।।

  जिन्दा रहने की फितरत में ,जन फिरता मारा मारा है।
  मदहोश शासकों का कुनबा ,अब लूट रहा धन सारा है।।

   कैसा राष्ट्र क्या वतन परस्ती,जब लोकतंत्र बेचारा है।
   नंगे भूंखे इंसानों का तो ,यह सारा जहाँ 'हमारा' है।।

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   धूल धुआाँ धुंध से भरा यह, राष्ट्र आँसुओं से गीला है।
   निर्धन ग्रामीणों को देखो, गौर से हरेक चेहरा पीला है।।

   बड़े बड़े नगरों को देखो भौतिक विकास का मारा है।
   भटक रही तरुणाई यहाँ फिर भी सत्ता की पौबारा है।।

  आजादी के दीवानों ने ,तब क्रांति ज्योति जलाई थी। 
  प्रजातंत्र -समाजवाद होगा, कुछ ऐंसी आस जगाई थी।।

   जात पांत भाषा मज़हब की ,सब कटटरता ठुकराई थी।
   आज़ादी के बाद अमन की ,उन सबने राह दिखाई थी।।

   अब भूँखे को रोटी मिल जाए, तो ये वतन हमारा है ।
   वर्ना नंगे भूँखे इंसानों को,यह सारा जहाँ हमारा है।।
 
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आन बान सम्मान देश का प्रतिपल होता क्षरण देश का।
सत्ता में जो डटे  हुए हैं , उन्हें नहीं भय नाम लेश का।।
कारपोरेट कल्चर का मिक्चर, सुपरमुनाफे के निवेश का।
सार्वजनिक उपक्रम को खाकर ,निजीक्षेत्र है भ्र्ष्ट देश का।।
बहुराष्ट्रीय निगमों ने फिर से, भारत जन को ललकारा है।
सुख चैन अमन साझा सबका हो, सच्चा वतन हमारा है।।
वर्ना नंगे भूँखे को कैसा वतन,कहेगा सारा जहाँ हमारा है।